रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६६ रामायणमीमांसा चतुर्दश
दुर्गावरकृत असमिया गीतिरामायण में भी इस प्रसङ्ग का वर्णन है। उसमें सीता चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, फल्गु तथा ब्राह्मणों को शाप देती हैं। बालरामदासरामायण के अनुसार राम स्वयं फल्गु को अन्तःसलिला बन जाने का शाप देते हैं। प्रार्थना करने पर वर्षा ऋतु में प्रकट होने का अनुग्रह करते हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में वर्णित श्राद्ध का ही भिन्न-भिन्न पुराणों एवं रामायणों में पल्लवन किया गया है। दशरथजी के नरकयातना भोगने और क्षुधातुर होने आदि का वर्णन गुणवादी अर्थवाद ही समझना चाहिए । उसका तात्पर्य गौतमी नदी पर श्राद्ध एवं गयाश्राद्ध तथा फल्गुश्राद्ध के माहात्म्य-वर्णन में है। "नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्" निन्दा का तात्पर्य निन्द्य की निन्दा में न होकर विधित्सित अर्थ की स्तुति में ही होता है। श्रीराम का नाम स्मरण करने से भी प्राणियों की मुक्ति हो जाती है फिर राम के परमानुरागी दशरथ के लिए नरक-यातना की कल्पना भी कैसे की जा सकती है। रामचरितमानस में कहा गया है— "राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम । तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाम ॥" ( रा० मा० २।१५५ ) "जिअन मरन फलु दशरथ पावा । अण्ड अनेक अमल जसु छावा ॥ जिअत रामविधुवदन निहारा। रामविरह करि मरन सँवारा ॥" ( रा० मा० १।१५४।१ ) ऐसे ही देवी-भागवत में परीक्षित् के अन्तरिक्ष-मरण के कारण दुर्गति का वर्णन भी निन्दार्थवाद ही है । प्रमाणान्तर विरुद्ध अर्थवाद का स्वार्थ ग्राह्य न होकर केवल स्तुति में ही उसका तात्पर्य होता है। उदाहरणार्थ शुक्लयजुःसंहिता के ४० वें अध्याय में विद्या और अविद्या ( कर्म और उपासना ) दोनों की ही निन्दा की गयी है । "अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ततो भूय इव तमो य उ विद्यायां रताः।" ( ईशा० उ० ७ ) वे लोग अन्धन्तम में प्रवेश करते हैं जो कर्म में लगे हैं और उससे भी अधिक घोर तम में वे प्रवेश करते हैं जो कि उपासना में लगे हैं। परन्तु ये दोनों ही बातें "कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः ।" इन श्रुति-वचनों से विरुद्ध हैं; क्योंकि इनमें कर्म से पितृलोक और विद्या से देवलोक की प्राप्ति कही गयी है। अतः ऊपर के वचनों का तात्पर्य विद्या और अविद्या दोनों के समुच्चयानुष्ठान में ही है, किसी की निन्दा में नहीं। ठीक इसी तरह रामनाम का स्मरण राम-भक्ति परम मोक्ष का कारण है, यह श्रुति, स्मृति और पुराणों से सिद्ध है। ऐसी स्थिति में परम राम-भक्त दशरथ की नरक-प्राप्ति सर्वथा विरुद्ध ही है। अतः वैसे वचनों का तात्पर्य गौतमी तथा गया आदि क्षेत्रों एवं वहाँ के श्राद्धादि कर्मों के माहात्म्य-वर्णन में ही है अर्थात् दशरथ जैसे परम सम्मान्य पुरुषों की सद्गति यहीं हुई थी । पादुकाओं का वृत्तान्त इसे ( पादुकाओं के वृत्तान्त को ) भी बुल्के बाद में जोड़ा हुआ समझते हैं। वे कहते हैं कि "दाक्षिणात्य पाठ ( वा० रा० १।११२।२१ ) के अनुसार भरत राम की हेमविभूषित पादुकाएँ ले जाने की प्रार्थना करते हैं— "अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते । एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥" ( वा० रा० २।११२।२१ ) पर गौड़ीय पाठ के अनुसार भरत के प्रस्थान के समय शरभङ्ग राम को कुशपादुकाओं का एक जोड़ा भेजते हैं। वसिष्ठ के अनुरोध से राम उन्हें प्रदान करते हैं। माधवकन्दली और बलरामदासरामायण में भी कुशपादुकाओं की ही चर्चा है। पश्चिमोत्तरीय पाठ में वसिष्ठ के कहने पर राम अपनी पादुकाएँ भरत को देते हैं। दशरथजातक के अनुसार भी अमात्य लोग राम की पादुकाओं के सामने राजकार्य करते हैं। अन्याय होते ही पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती हैं एवं ठीक निर्णय होने पर शान्त हो जाती हैं।