रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अयोध्याकाण्ड ४६७ पादुकाओं के स्वरूप में कुछ मतभेद होने पर भी पादुकाओं में कोई मतभेद नहीं है। अतः पादुकावृत्तान्त को ही प्रक्षेप कहना साहसमात्र है और मतभेद से नाजायज फायदा उठाने की दुश्चेष्टामात्र है। चित्रकूटनिवास, पर्णशाला-निर्माण आदि सभी प्रामाणिक ही हैं। काक-वृत्तान्त जयन्त काक का वृत्तान्त सुन्दरकाण्ड में हनुमान् के लिए अभिज्ञान के रूप में सुनाया था। राम के द्वारा प्रयुक्त अस्त्र से वह कहीं भी त्राण न पाकर राम की शरण में आकर प्राण बचाता है। यह घटना अयोध्याकाण्ड की ही है। अतः क्षेपक में या पुराणों में उसका वर्णन स्वाभाविक था। इसी दृष्टि से गौड़ीय पाठ ने उस सर्ग को प्रक्षिप्त नहीं माना। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण तथा रामचरितमानस में भी इसका वर्णन है। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण में भी उक्त वृत्तान्त है ही। रामकेर्ति तथा रामकियेन में काकासुर का वध वर्णित है, पर वह असुर है। अयोध्याकाण्ड के काक-वृत्तान्त का काक तो इन्द्रपुत्र जयन्त है। ४४०वें अनु० में रसिकसम्प्रदाय की रचनाओं में रासलीला का वर्णन भावराज्य का विषय है। श्रीराम परब्रह्म हैं। उनमें विविध भावनाओं से उपासक उनकी उपासना कर सकते हैं। वाल्मीकिरामायण में वर्णित मर्यादा- पुरुषोत्तम की लीलाएँ प्रकट लीलाएँ हैं। राम-वनगमन राम-वनगमन की कथा में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण एवं पुराणों का ही मुख्य प्रामाण्य है। बौद्ध और जैन कथाओं में तो उसका विकृत रूप ही है। अतएव बौद्धों के अनुसार अशोकवनिका से सीता का हरण या रावण द्वारा अयोध्या से सीता को ले जाना या राम का हिमालय प्रदेश में वनवास करना आदि काल्पनिक ही हैं। राम ईश्वरावतार थे, इसलिए नारद का आना और अवतार का उद्देश्य स्मरण कराना अध्यात्म- रामायण की कथा ठीक ही है। अनेक रामायण वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कहा है कि लक्षणज्ञ ब्राह्मणों ने मेरे लिए वनवास कह रखा है— "वस्तव्यं किल मे वने" (वा० रा० २।२९।८)। वे यह भी कहती हैं कि मैंने जितने रामायण सुने हैं। उनमें सबमें सीता राम के साथ वन जाती हैं। आनन्दरामायण के अनुसार यह भी तर्क दिया है कि स्वयंवर के समय राम को पतिस्वरूप में प्राप्त करने के लिए १४ वर्ष वनवास का व्रत किया है। बुल्के कहते हैं, "रामवनवास के अन्य कई कारण बताये गये हैं। दशरथ द्वारा प्राणियों का वध (वा० रा० २।३९।४), अन्धमुनि-पुत्र-वध (वा० रा० २।६३।११) एवं पूर्वजन्म में कौशल्या द्वारा गायों के स्तनों का काटना (वा० रा० २।५३।१९)। "मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः। प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम् ॥" (वा० रा० २।३९।४) "निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया। पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः ॥" (वा० रा० २।४३।१७) "नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः। जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥" (वा० रा० ५।५३।१९)