रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 546, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अयोध्याकाण्ड ४६९ दशरथ राम और लक्ष्मण दोनों पुत्रों को बन में भेज देते हैं। अनामकं जातकं के अनुसार मामा के आक्रमण की तैयारियाँ सुनकर स्वेच्छा से राम वन जाते हैं। पउमचरियं के अनुसार भी भरत को राज्य देने का समाचार सुनकर वे स्वेच्छा से वन जाते हैं। तिब्बती रामायण के अनुसार जब पिता 'किसको राज्य दें?' इस सम्बन्ध में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये तब राम आश्रम में जाकर तपस्या करने लगे। सेरीरामरामायण के अनुसार मन्थरा को पीटने के कारण राम की बदनामी हो गयी थी। सीता-स्वयंवर के समय भरत को राज्य दिये जाने का समाचार सुनकर राम राजधानी न लौटकर सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन चले गये। सेरीराम के अन्य पाठ के अनुसार सीता, राम और लक्ष्मण घर लौट आते हैं। भरत की माता भरत के लिए राज्य माँग लेती है और दशरथ के सोते समय ही राम को राज्य से वञ्चित होने का समाचार सुनाती है। राम प्रसन्न होकर ऋषि बनने के लिए वन चले जाते हैं। सिंहली रामकथा के अनुसार शनि की अशुभ दशा से बचने के लिए राम राजधानी छोड़कर सात वर्ष वन में रहते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार ताड़का-वध के प्रायश्चित्तस्वरूप राम तपस्या करने के लिए बन चले जाते हैं। किसी अन्य वृत्तान्त के अनुसार एक ब्राह्मण के शाप से राम का ईश्वरीय ज्ञान लुप्त हो गया था। बाद में कैकेयी की प्रार्थना से राम स्वेच्छा से ही वन में प्रवेश करते हैं। वस्तुतः मूल प्रमाण से जो लोग जितने दूर हुए हैं उन लोगों की रामकथाओं में उतनी ही अधिक विकृतियाँ हुई हैं। भारतीय रामायणों, पुराणों, महाभारत तथा संहिताओं की रामकथाओं तथा दूरत्व के दोषों के कारण या दुरभिसन्धि के कारण ये विकृतियाँ आ गयी हैं उनका समन्वय निरर्थक एवं असम्भव ही हैं। यही कहा जा सकता है कि जिस किसी तरह भी राम-सम्बन्ध होना अच्छा ही है। 'भाव कुभाव अनख आलसहूँ। नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ।' (रा० मा० १।२७।१) फिर भी रामायण तथा रामतत्त्व का याथात्म्य समझने के लिए वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, महाभारत तथा पुराणों का ही आश्रयण अपेक्षित है। उसके बिना मूल आदर्श से वञ्चित रह जाने की अधिक सम्भावना है। कैकेयी को वर-प्राप्ति ४४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार देवासुरसंग्राम में शम्बरासुर से युद्ध करते हुए दशरथ आहत होकर कैकेयी द्वारा रणभूमि से हटाये जाते हैं। इसके लिए दशरथ उन्हें दो वर प्रदान करते हैं। इनमें से वह एक से भरत के लिए राज्य और दूसरे से राम के लिए वनवास माँगती है- "तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा । असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥ अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः । तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥ तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने । स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम् ॥ गृह्णीयाम्...............।" (वा० रा० २।९।१५-१७) वाल्मीकिरामायण पश्चिमोत्तरीय पाठ में कहा गया है कि एक ब्राह्मण को प्रसन्न कर कैकेयी ने विद्याबल पाया था। जिससे वह पति को बचाने में सफल हो सकी थी। शम्बर युद्ध में माया का सहारा लेता था, पर कैकेयी