रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० रामायणमीमांसा चतुर्दश को भी वह माया विदित थी, अतः कैकेयी ने शम्बर का माया-प्रभाव नष्ट कर दशरथ को बचाया था। तेलगू द्विपद- रामायण ( २।२ ) में ऐसा भी वृत्तान्त है कि युद्ध में दशरथ के रथ का अक्ष टूटा देखकर कैकेयी ने उसमें अपना हाथ डाल दिया ( उन्हें उसी का वरदान मिला था कि हाथ लोहसार का हो जायेगा ) । ब्रह्मपुराण ( अ० १२३ ), पद्मपुराण, अध्यात्मरामायण ( २।१।६६ ), आनन्दरामायण ( १।१।८२ ) तथा रामकियेन ( अध्याय १४ ) । भावार्थरामायण के अनुसार अन्ध मुनि के शाप के कारण दशरथ के राज्य में अनावृष्टि हो गयी थी । दशरथ इन्द्र से युद्ध करने गये । उसमें अक्ष टूट जाने पर कैकेयी ने अपनी भुजा से रथ संभाला था। इन्द्र की पराजय हुई थी । कृत्तिवासरामायण और असमिया बालकाण्ड के अनुसार एक वर शम्बरासुर के युद्ध में मिला था और दूसरा वर दशरथ के व्रण की पीब चूस लेने के कारण मिला था । पाश्चात्य वृत्तान्त नं० ३ तथा नं० १३ के अनुसार बिच्छू के डंक से पीड़ित दशरथ को स्वस्थ करने के कारण दूसरा वर मिला था । सेरीराम में भी ऐसी ही कथा है। वसुदेवहिण्डि में कामशास्त्रनिपुणता के कारण कैकेयी को एक वर मिला था । दूसरा वर, युद्ध में किसी राजा ने दशरथ को बन्दी बना लिया था, कैकेयी ने सेना का नेतृत्व कर विरोधी राजा को हराकर दशरथ को मुक्त कराया था, तब मिला था । कहना न होगा कि आर्ष वाल्मीकिरामायण और पुराणों की ही कथाएँ श्रद्धेय हैं। बहुत से लोग अपनी रचनाओं में मौलिकता और चमत्कृति लाने की दृष्टि से भी अपनी अभिनव कल्पनाओं को निविष्ट कर देते हैं । पउमचरियं के अनुसार स्वयंवर में दशरथ का रथ हाँक कर अन्य राजाओं के विरुद्ध दशरथ की सहायता करने के कारण वर मिला था । महाभारत ( ३।२६१।२१ ), रामकियेन तथा पद्मपुराण के अनुसार एक ही वरदान से भरत के लिए राज्य और राम के लिए वनवास माँगा गया था। परन्तु कई स्थलों में जातित्वात् एकवचन का प्रयोग हो जाता है, अतः दो वरदानों की बात ही प्रामाणिक है। ब्रह्मपुराण ( अध्याय १२३ ) के अनुसार देवासुरयुद्ध में कैकेयी ने अपने हाथ से दशरथ-रथ का टूटा हुआ अक्ष सम्भाला था। इसपर प्रसन्न होकर दशरथ ने तीन वर दिये थे। कल्पभेद से भी पुराणों का समन्वय किया जा सकता है । कैकेयी का दोष निवारण आदि कवि वाल्मीकि ने कैकेयी की कुटिलता का स्पष्ट शब्दों में चित्रण किया है। कहा जाता है कि राम ने कैकेयी के सम्बन्ध में यह शङ्का की थी कि वह देवी राज्य के कारण कहीं महाराज दशरथ का ही प्राण न ले ले और कहीं कौशल्या और सुमित्रा को जहर न दे दे । ( वा० रा० २।५३।७-१८ ) । युद्धकाण्ड में सीता ने भी श्रीराम का माया सिर तथा धनुष उनके सामने उपस्थित करने पर कहा था कि कलहशीला कैकेयी ने सारे कुल का उत्सादन कर डाला— "कुलमुत्सादितं सर्वं त्वया कलहशीलया" ( वा० रा० ६।३२।४ ) परन्तु ऐसी सभी बातें दुःख और शोक के आवेश का तात्कालिक परिणाम हैं। ये उनके हृद्गत भावों के सूचक नहीं हैं। भारद्वाज ठीक कहते हैं—राम के वनवास से देवताओं, दानवों तथा भावितात्मा ऋषियों का हित ही होगा। इसमें कैकेयी का कोई दोष नहीं है ( वा० रा० २।९२।३१ ) । राम ने भी भरत से कहा था—विवाह के समय महाराज ने मां कैकेयी के पिता से कैकेयी के पुत्र के लिए राज्य देने की प्रतिज्ञा की थी ( वा० रा० २।१०७।३ ) । गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों में कहा गया है कि शाप-मोहित होकर कैकेयी मन्थरा के जाल में फँस गयी थी। विमलसूरि के अनुसार भरत का वैराग्य दूर करने के