रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिए राज्य माँगा गया था। सीता और लक्ष्मण के साथ राम स्वेच्छा से ही वन चले गये। सबको शोकातुर देखकर कैकेयी ने ही भरत को राम को लौटा लाने के लिए भेजा था, किन्तु राम भरत का अभिषेक करके उन्हें अयोध्या लौटा देते हैं। तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार अयोध्यावासियों को दुखी देखकर कैकेयी स्वयं द्रवित हो जाती है। वह राम की आराधना करके क्षमा माँगती है। प्रतिमानाटक के अनुसार शाप के कारण पुत्रवियोग से दशरथ की मृत्यु अनिवार्य थी। कैकेयी ने राम को विकट विपत्ति से बचाने के लिए वसिष्ठादि से परामर्श करके राम को वनवास दिलाया था। १४ दिन के स्थान में भूल से १४ वर्ष मुख से निकल गया। महावीरचरित तथा अनर्घराघव के अनुसार स्वयंवर के समय शूर्पणखा मन्थरा के वेष में मिथिला पहुँच कर दशरथ को कैकेयी का जाली पत्र देती है जिसमें वर केवल राम का वनवास ही मांगा गया है। फलतः राम मिथिला से ही वन चले जाते हैं। अध्यात्मरामायण (२।२।४४-४६) के अनुसार सरस्वती की प्रेरणा से कैकेयी वैसा करती है। आनन्दरामायण तथा रामचरितमानस में भी यही बात है। रामलिङ्गामृत (सर्ग १२) के अनुसार देवेन्द्र की प्रेरणा से कैकेयी राम को वन भेजती हैं। अध्यात्मरामायण के अनुसार राम ने कहा था कि वाणी मुझसे प्रेरित होकर आपके मुख से निकली थी—
“मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद् विनिर्गता।” (२।७।६३)
किन्हीं सूक्ष्म अदृष्ट कारणों से विविध घटनाएँ घटती ही हैं। इसमें वाल्मीकिरामायण का भी कोई विरोध नहीं है।
मन्थरा मन्थरा के सम्बन्ध की भी विभिन्न कथाएँ संगत हैं। अग्निपुराण (अध्याय ६६।८) के अनुसार राम ने बाल्यावस्था में मन्थरा का पैर पकड़ कर खींचा था। इस कारण उसने कैकेयी को उकसाया था। अन्य रामकथाओं में इसी का पल्लवन किया गया है। सत्योपाख्यान के अनुसार विरोचन दैत्य की पुत्री ने देवासुरयुद्ध में देवताओं के विमानों और वाहनों को अपने पाशों से बाँध दिया था। इसपर विष्णु की आज्ञा से इन्द्र ने उसे वज्र से मारा था। उस वैर से ही उसने मन्थरा बनकर बदला चुकाया। आनन्दरामायण (९।५।३५) के अनुसार वही पूतना बनी है। कल्पान्तर में वही कुब्जा हुई थी (आ० रा० १।२।३)। भारतीय संस्कृति के अनुसार राम और कृष्ण साक्षात् परब्रह्मस्वरूप ही हैं। उनका यथाकथञ्चित् सम्बन्ध भी कल्याणकारक है, अतः उनके अनुकूल तथा प्रतिकूल सभी का कुछ विशिष्ट स्थान है। इसी दृष्टि से उनकी जन्मान्तरीय कथाओं की छानबीन की गयी है। पर जन्मान्तरीय ज्ञान ऋषियों को ही हो सकता है, अन्य को नहीं, अतः आर्ष पुराणादि ही उस सम्बन्ध में प्रमाण हैं, अन्य नहीं।