रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदश अध्याय अरण्यकाण्ड अरण्यकाण्ड में ३१ वें सर्ग के सम्बन्ध में भी ऋषियों के स्वागत को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं। इसके अनुसार अकम्पन रावण के पास जाकर खर के वध का समाचार सुनाता है। सीता के सौन्दर्य की प्रशंसा कर उनको हर लेने का परामर्श देता है। रावण इसके लिए मारीच के पास जाकर सहायता माँगता है। मारीच राम की वीरता की प्रशंसा करके सीता-हरण रोक देता है। वाल्मीकिरामायण के गौड़ीय व पश्चिमोत्तरीय पाठ में यह सर्ग नहीं है। उनके अनुसार शूर्पणखा ही सीता के सौन्दर्य की प्रशंसा करती है। इसी तरह ६० वें सर्ग में राम वृक्षों एवं पशुओं को सम्बोधित करके सीता का पता पूछते हैं—यह गौड़ीय पाठ में बुल्के के अनुसार ६२ वें तथा ६३ वें सर्ग में वर्णित राम का विलाप ६० वें सर्ग की पुनरावृत्ति है। अयोमुखीवध-वृत्तान्त भी दाक्षिणात्य पाठ में ही है। इन्द्र द्वारा सीता के पास पायस लाने का वृत्तान्त दाक्षिणात्य पाठ सर्ग ५६ में प्रक्षिप्त है, परन्तु वह अन्य पाठों में प्रक्षिप्त नहीं है। याकोबी के अनुसार “आदिरामायण में चित्रकूट के लिए प्रस्थान करने के बाद अरण्यकाण्ड के ११ वें सर्ग का आरम्भ मिलता है। “अग्रतः प्रययौ रामः सीता मध्ये सुशोभना। पृष्ठतस्तु धनुष्पाणिर्लक्ष्मणोऽनुजगाम ह॥” अनन्तर पञ्चवटी में आगमन का वर्णन था (१५ वां सर्ग)। उनके अनुसार विराध-वध, शरभङ्ग, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्य के आश्रमों में गमन, सीताहरण से पहले जटायु से भेंट ये सब वृत्तान्त आदिवाल्मीकिरामायण में नहीं थे, क्योंकि आधिकारिक कथावस्तु के दृष्टिकोण से उनका महत्त्व नहीं है। भरत के प्रस्थान के पश्चात् शूर्पणखा आगमन तक की ११-१२ वर्ष की अवधि का कुछ वर्णन करने के उद्देश्य से उपर्युक्त वृत्तान्त रखे गये होंगे।” बुल्के की दृष्टि में भी उनका यह अनुमान न्यायसङ्गत है। ऐसी भी रामकथाएँ हैं जिनमें सीताहरण के पश्चात् ही राम जटायु से मिलते हैं तथा रामायण से भी ऐसी ही ध्वनि निकलती है। परन्तु यह ठीक नहीं है। केवल अनुमानमात्र के आधार पर प्रामाणिक परम्पराप्राप्त पाठों का अपलाप नहीं किया जा सकता। पाठ के अनुसार घटनाओं का अस्तित्व जानना उचित है। अनुमान के अनुसार विद्यमान पाठों का अपलाप नहीं किया जा सकता। पाठभेद के आधार पर भी ऐसी कल्पना करना पाठभेद का दुरुपयोग करना ही है। कहा जाता है— “अनेन सीता वैदेही भक्षिता नात्र संशयः। गृध्ररूपमिदं व्यक्तं रक्षो भ्रमति काननम्॥” (वा० रा० ३।६७।११) इस वचन से यही ध्वनि निकलती है कि जटायु को राम पहले से नहीं जानते थे, परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि यह तो शोकव्याकुल राम का भ्रममात्र था। पिछले प्रसंग से विदित होता है कि सीता जटायु से परिचित थीं। अतएव सीता ने कहा था जटायो ! राम और लक्ष्मण के लिए मेरे हरण का सारा वृत्तान्त कह देना— “रामाय तु यथातथ्यं जटायो हरणं मम। लक्ष्मणाय च तत्सर्वमाख्यातव्यमशेषतः॥” (वा० रा० ३।४९।४०)