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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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इससे यह भी ध्वनि निकलती है कि सीता जटायु से परिचित थीं। राम जिस वन में विचरण कर रहे हैं वहीं अगस्त्य, सुतीक्ष्ण आदि के आश्रम हैं। परम आस्तिक वैदिक राम उन लोगों से न मिलते यह कैसे संभव हो सकता था ! वस्तुतः याकोबी या बुल्के इन कथाओं के सर्गों को इसलिए प्रक्षिप्त कहते हैं कि इनमें राम की दिव्यता और अलौकिकता का वर्णन है। शरभङ्ग और अगस्त्य के आश्रमों में देवताओं सहित इन्द्र का वर्णन है। अगस्त्य द्वारा राम के लिए दिव्य धनुष का प्रदान वर्णित है। राम के अवतारत्व का. भी वर्णन है। अकम्पन के वृत्तान्त में भी राम के अवतारत्व का वर्णन है। इसी लिए अवतारत्व-स्वीकार अभीष्ट न होने से ये सब दुष्ट कल्पनाएँ हैं। रामायण के अनुसार रावणादि राक्षसों के वधार्थ राम का अवतार हुआ है। ऋषियों और देवताओं का असुरों और राक्षसों से मुख्य विरोध है। अतः राम का देवताओं तथा ऋषियों से परामर्श ग्रहण करके कार्य करना महत्त्वपूर्ण ही है। फिर मौसरे भाई याकोबी या बुल्के का इन्हें महत्त्वपूर्ण न मानना निरी अज्ञानता ही है। इसी तरह अनसूया-सीता-संवाद को भी प्रक्षिप्त कहना प्रमाद है, यह कहा जा चुका है। विराध-वध के बाद उसके दिव्य रूप धारण करने का उल्लेख दाक्षिणात्य पाठ में न होने पर भी “अप्रति- षिद्धं परमतमनुमतं भवति” के अनुसार अप्रतिषिद्ध परमत अनुमत ही माना जाता है और वह गौडीय पाठ तथा अध्यात्मरामायण के अनुसार ठीक ही है। कल्पभेद से कभी तुम्बुरु कुबेर के शाप से विराध बना था। उसी कल्प में दुर्वासा द्वारा शापित विद्याधर विराध बनता है। ४५९ वें अनु० का खण्डन पिछले प्रसंग में किया जा चुका है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम मर्यादा- पुरुषोत्तम हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार भी राम का अवतार मर्त्यशिक्षणार्थ है, अतः राम ऋषियों के आश्रम में जाते हैं, उनका दर्शन करते हैं। वे मुनियों का पाद-स्पर्श करते हैं। ऋषि लोग राम को प्रिय अतिथि मानकर इतना आदर करते हैं कि वे उनको बिना देखे ब्रह्मलोक भी जाना नहीं चाहते— ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।” ( वा० रा० ५।२९।३ ) इस सम्बन्ध में कम्बरामायण ( ३।२ ) का वर्णन ठीक ही है कि इन्द्र शरभङ्ग को ब्रह्मलोक ले जाने के लिए आये थे, परब्रह्म विष्णुरूप राम से मिलकर ही वे मुक्ति के पद को प्राप्त हुए। “राम अगस्त्य के पास पहुँचकर उनके पैर छूते हैं” वाल्मीकिरामायण की यह बात ठीक ही है। परन्तु अगस्त्य उनको केवल एक राजा मानकर नहीं, किन्तु सर्वलोक का राजा ईश्वर मानकर उनका आतिथ्य करते हैं। लौकिक राजा एक राज्य का राजा होता है। सर्वलोक का राजा ईश्वर ही हो सकता है, वही ऋषियों का भी पूज्य हो सकता है, सामान्य राजा नहीं। “राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः । पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः ॥” अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, भावार्थरामायण तथा तुलसीकृत रामचरितमानस में राम के ऐश्वर्य- प्रधान रूप का वर्णन है, अतः उनके अनुसार ऋषि लोग उनकी स्तुति, पूजा आदि करते हैं। ऋषि लोग उनका परमेश्वर के रूप में सम्मान करते थे। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों का यही दृष्टिकोण है। लक्ष्मण का संयम अध्यात्मरामायण के अनुसार जो बारह वर्ष तक निद्रा एवं आहार छोड़ सकता है, वही मेघनाद का वध भी कर सकता है—युद्धकाण्ड सर्ग ८ । कृत्तिवासरामायण में इसी बात का उपबृंहण है। “नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥” ( वा० रा० ४।६।२२ )