रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७४ रामायणमीमांसा पञ्चदश यह श्लोक भी लक्ष्मण के संयम का सूचक है। लक्ष्मण कहते हैं कि मैं सीता के केयूरों और कुण्डलों को नहीं पहचानता, किन्तु नित्य पादवन्दना के कारण उनके नूपुरों को पहचानता हूँ, ये उन्हीं के हैं। विश्वामित्र की बला और अतिबला विद्याओं में ये गुण विद्यमान थे जिनसे श्रम, ताप और रूपविपर्यय तथा क्षुधा-पिपासा की बाधा नही होती थी— “मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा । न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः ॥ न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः। क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्येते नरोत्तम ॥” (वा० रा० १।२२।१३,१८) यद्यपि वाल्मीकिरामायण के अनुसार विश्वामित्र ने यह विद्या राम को ही प्रदान की थी। तिलकटीका- कार कहते हैं—“'गृहाण त्वं' में 'त्वम्' उपलक्षण है। लक्ष्मण को भी वह विद्या दी गयी है, क्योंकि क्षुधा और पिपासा के सहनारूप फल दोनों में ही परिलक्षित होते हैं। राक्षसरूपी अरियों के वधार्थ इसकी अपेक्षा भी दोनों को ही थी। “तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् । आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥” ( वा० रा० ३।५५।३२ ) “बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनात्तटे ।” ( वा० रा० ३।५५।३२ ) इत्यादि जहाँ कहीं राम, लक्ष्मण आदि का साथ भोजन करना वर्णित है वहाँ भी 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके' ( क० उ० १।३।१ ) “अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” के अनुसार “एकः पिबति अन्यः पाययति पिबन्तौ” की तरह समझना चाहिये । जीव कर्मफल का भोक्ता है ईश्वर अभोक्ता द्रष्टा ही है तथापि जैसे एक के छत्री होने पर भी बहुत छत्रहीन यात्रियों में 'छत्रिणो यान्ति' का व्यवहार होता है वैसे ही एक के भोक्ता होने पर भी दोनों में भोक्तृत्व का व्यवहार होता है, उसी तरह राम और सीता के भोजन में ही तीनों के भोक्तृत्व का व्यवहार हो सकता है। कम्ब- रामायण की कल्पना ठीक ही है कि शृङ्गवेर में निद्रादेवी लक्ष्मण के सामने आयी तब उन्होंने कह दिया कि अयोध्या लौटकर आयेंगे, तब आना ( कम्ब रा० २।६।११ ) । द्विपदरामायण के अनुसार उन्होंने उसे उर्मिला के पास भेज दिया। अतएव लक्ष्मण के लौटने तक उर्मिला सोती ही रही । रामकेति ( सर्ग १ ) के अनुसार निद्रा लक्ष्मण की एक हितैषिणी थी। जो नींद देने आया करती थी । गुह मिलने के बाद उन्होंने उससे कहा कि तुम १४ वर्ष बाद आना । इस अवधि में भोजन भी नहीं करूँगा । तुम क्षुधा को मुझसे हटाकर स्वस्थ सबल बनाये रखो । निद्रा ने वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की । सीताहरण के पश्चात् राम सीता के पलंग पर मूर्च्छित होकर गिर जाते हैं । लक्ष्मण चालीस दिन तक तक निद्रा और अन्न त्याग कर राम का सिर गोद में लेकर निश्चल बैठे रहे। आकाशवाणी उनके इस संयम की प्रशंसा करती है । यह भी कहती है कि राम-सीता का वियोग १२ वर्ष बाद समाप्त होगा। इन सबमें आर्षवचन ही प्रमाण हैं । अन्य कथाओं में अनेक कल्पनाएँ जुड़ गयी हैं । अनु० ४६२ में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में सीता लक्ष्मण के सम्बन्ध का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा गया । लक्ष्मण राम और सीता दोनों की सेवा करते हुए निःसंकोच बातचीत तथा व्यवहार करते थे । लक्ष्मण राम तथा सीता दोनों ही के पैर धोते थे ।” ( वा० रा० २।५०।४९ )