भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 552

अध्याय] अरण्यकाण्ड ४७५ परन्तु इसमें संकोच का प्रश्न ही नहीं था। क्योंकि लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता-पिता मानते थे। फिर पैर धोने में क्या आपत्ति हो सकती है। वस्तुतः श्लोक का वैसा अर्थ स्पष्ट नहीं है, जैसा अज्ञानी बुल्के ने किया। श्लोक यह है— “तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः । सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमपाश्रितः ॥ वा० रा० २।५०।४९) अर्थ—भूमि पर भार्या के सहित सोये राम के दोनों पैरों का प्रक्षालन करके वहाँ से हटकर वृक्षमूल में लक्ष्मण खड़े हो गये। बुल्के यह भी कहते हैं—राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि वह सीता को उठाकर नाव पर रख दे— “सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ।” ( वा० रा० २।५२।७५ ) वस्तुतः भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत से अपरिचित बुल्के अनेक स्थलों पर अर्थ समझने में प्रमाद करते हैं। पीछे भी लिखा है कि रावण को मारने के बाद राम हमारे दर्शन के योग्य बनेंगे, वैसे ही यहाँ भी प्रमाद ही है। श्लोक यह है—“आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः । सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ॥” श्लोकार्थ यह है कि हे नरव्याघ्र ! घाट पर स्थित इस नाव को पकड़ कर सीता को नाव पर चढ़ाओ और पश्चात् तुम चढ़ो । “उठाकर नाव पर रख दो” यह तो किसी शब्द का अर्थ नहीं है। चढ़ाने का भी यही अर्थ हैं कि चढ़ने में सहायता दे दो । “एक ही पर्णशाला का निर्माण हुआ था, अतः तीनों एक में ही रहते थे ।” यह कथन भी ठीक नहीं है। यद्यपि माता, पिता और पुत्र के समान एक पर्णशाला में भी रहने में कोई दोष नहीं है, फिर भी ऐसा कोई वचन नही है कि तीनों एक ही पर्णशाला में सोते थे। प्रत्युत सर्वदा राम और सीता के रक्षण की दृष्टि से धनुष-बाण लेकर लक्ष्मण कुछ दूर ही रहकर प्रहरी का काम करते थे। राम के सोने पर तमसातीर पर सुमन्त्र और सूत दोनों ही जागते हुए पहरा दे रहे थे— “जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः । सूतस्य तमसा तीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान् ॥” ( वा० रा० २।४६।१६ ) “तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम् । गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० २।५१।१ ) गुह के प्रार्थना करने पर भी कि किसी भय से नहीं, किन्तु धर्मबुद्धि से हम जागरण करते हैं। सीता के साथ राम के भूमि पर सोते हुए निद्रा और सुख कहाँ ? बुल्के भी यह कहते है “अपहरण के ठीक पहले राम की आर्त वाणी सुनकर अपने पति की सुरक्षा के विषय में चिन्तित सीता उत्तेजित होकर अपने देवर पर यह आरोप लगाती हैं कि वह अपनी भाभी पर अनुरक्त हैं, इसी लिए राम के साथ वन में चले आये हैं ।” वस्तुतः यहाँ भी बहिर्मुखता के कारण ही अन्यथा कल्पना की जाती है। तिलक आदि टीकाओं में स्पष्ट वर्णन है। व्यावहारिक दृष्टि से यह सब शोकावेश का प्रभाव था। परमार्थतः तो लोकव्यवहार के अनुसार वह नाट्यमात्र था। लक्ष्मण ने भी लोकवत् ही व्यवहार किया था ।

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