रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 553, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंएवं विबोधिततत्त्वोऽपि मनुष्यनाटनेन लोकव्यवहारविल्लक्ष्मणोऽवददित्याह । बुल्के कहते हैं "सीता की इसी लाञ्छना के अनुसार स्कन्दपुराण के नागरखण्ड (अ० २) में लक्ष्मण के स्वामिद्रोह की कल्पना कर ली गयी है।" परन्तु यह प्रमाद ही है। बुल्के भारतीय अर्थवादों की स्थिति से अपरिचित ही हैं। यह ठीक है निम्नोक्त वर्णन पुराणों में है कि— पितृकूपिका तीर्थ में राम श्राद्ध करते हैं, सीता कहीं छिप जाती हैं। लक्ष्मण को विप्रों की सेवा करनी पड़ती है। श्राद्ध के बाद सीता दिखायी पड़ती हैं जिससे लक्ष्मण को क्रोध होता है। वह सांथरी के लीपने तथा पैर धोने के लिए पानी ले आना भी अस्वीकार करते हैं। बाद में कोपसंरक्त लक्ष्मण दूर से राम को देखते हैं तो उनके मनमें राम का वध करके सीता को पत्नी बना लेने का विचार उठता है। “हृत्वैवं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च। किं गच्छामि निजं स्थानं विदेशं वापि दूरतः” ॥४५॥ प्रातः राम और सीता दक्षिण के लिए प्रस्थान करते हैं। लक्ष्मण राम के वध का अवसर ढूंढ़ते हुए दिन- भर उनका पीछा करते हैं— “लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा संधाय सायकम्। अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य छिद्रं विलोकयन्” ॥४९॥ शाम को गोकर्ण पहुँचकर लक्ष्मण राम के पास जाकर अपना अपराध स्वीकार करते हैं और राम से क्षमा पाते हैं। लक्ष्मण आत्मशुद्धि के उद्देश्य से राम के हाथ से मृत्यु चाहते हैं। नहीं तो अग्नि में प्रवेश करने की सोच रहे थे। उसी समय मार्कण्डेय आ पहुँचते हैं तथा स्वामिद्रोह के लिए बालमण्डन तीर्थ में स्नान करने का परामर्श देते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड २९।१२६-१९०) में लक्ष्मण का विद्रोह और पश्चात्ताप वर्णित है, किन्तु वहाँ सीता के प्रति दुर्भाव का वर्णन नहीं है। “एहि लक्ष्मण शीघ्रं त्वं पुष्कराज्जलमानय । पादप्रक्षालनं कृत्वा शयनं कुरु सत्वरम् ॥१२६॥ विभावर्यां निवृत्तायां यास्यामो दक्षिणां दिशम् । लक्ष्मणस्त्वब्रवीद् रामं सीतयाऽऽनीयतां पयः ॥१२७॥ नाहं राम सर्वकालं दासभावं करोमि ते। इयं पुष्टा च सुभृशं पीवरी च ममाप्युत ॥१२८॥ करिष्यसि किमनया भार्यया वद साम्प्रतम् । किं वा मृतस्य ते प्रेत्य इयं यास्यति ते प्रिया ॥१२९॥ रक्षसि त्वं सदाकालं सुपुष्टां चैव सर्वदा। करोषि क्लेशवहनं सततं मां रघूद्वह ॥१३०॥ मय्यपि क्लेशिते राम परत्र जायते क्षतिः । त्वत्कृते च सदा चाहं पिपासां क्षुधया सह ॥१३१॥ सुसहामि न सन्देहः परत्र च निशामय । मृतानां पृष्ठतः कश्चित् गतो नैवेह दृश्यते ॥१३२॥