रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
इससे यह भी ध्वनि निकलती है कि सीता जटायु से परिचित थीं। राम जिस वन में विचरण कर रहे हैं वहीं अगस्त्य, सुतीक्ष्ण आदि के आश्रम हैं। परम आस्तिक वैदिक राम उन लोगों से न मिलते यह कैसे संभव हो सकता था ! वस्तुतः याकोबी या बुल्के इन कथाओं के सर्गों को इसलिए प्रक्षिप्त कहते हैं कि इनमें राम की दिव्यता और अलौकिकता का वर्णन है। शरभङ्ग और अगस्त्य के आश्रमों में देवताओं सहित इन्द्र का वर्णन है। अगस्त्य द्वारा राम के लिए दिव्य धनुष का प्रदान वर्णित है। राम के अवतारत्व का. भी वर्णन है। अकम्पन के वृत्तान्त में भी राम के अवतारत्व का वर्णन है। इसी लिए अवतारत्व-स्वीकार अभीष्ट न होने से ये सब दुष्ट कल्पनाएँ हैं। रामायण के अनुसार रावणादि राक्षसों के वधार्थ राम का अवतार हुआ है। ऋषियों और देवताओं का असुरों और राक्षसों से मुख्य विरोध है। अतः राम का देवताओं तथा ऋषियों से परामर्श ग्रहण करके कार्य करना महत्त्वपूर्ण ही है। फिर मौसरे भाई याकोबी या बुल्के का इन्हें महत्त्वपूर्ण न मानना निरी अज्ञानता ही है। इसी तरह अनसूया-सीता-संवाद को भी प्रक्षिप्त कहना प्रमाद है, यह कहा जा चुका है। विराध-वध के बाद उसके दिव्य रूप धारण करने का उल्लेख दाक्षिणात्य पाठ में न होने पर भी “अप्रति- षिद्धं परमतमनुमतं भवति” के अनुसार अप्रतिषिद्ध परमत अनुमत ही माना जाता है और वह गौडीय पाठ तथा अध्यात्मरामायण के अनुसार ठीक ही है। कल्पभेद से कभी तुम्बुरु कुबेर के शाप से विराध बना था। उसी कल्प में दुर्वासा द्वारा शापित विद्याधर विराध बनता है। ४५९ वें अनु० का खण्डन पिछले प्रसंग में किया जा चुका है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम मर्यादा- पुरुषोत्तम हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार भी राम का अवतार मर्त्यशिक्षणार्थ है, अतः राम ऋषियों के आश्रम में जाते हैं, उनका दर्शन करते हैं। वे मुनियों का पाद-स्पर्श करते हैं। ऋषि लोग राम को प्रिय अतिथि मानकर इतना आदर करते हैं कि वे उनको बिना देखे ब्रह्मलोक भी जाना नहीं चाहते— ब्रह्मलोकं न गच्छामि त्वामदृष्ट्वा प्रियातिथिम् ।” ( वा० रा० ५।२९।३ ) इस सम्बन्ध में कम्बरामायण ( ३।२ ) का वर्णन ठीक ही है कि इन्द्र शरभङ्ग को ब्रह्मलोक ले जाने के लिए आये थे, परब्रह्म विष्णुरूप राम से मिलकर ही वे मुक्ति के पद को प्राप्त हुए। “राम अगस्त्य के पास पहुँचकर उनके पैर छूते हैं” वाल्मीकिरामायण की यह बात ठीक ही है। परन्तु अगस्त्य उनको केवल एक राजा मानकर नहीं, किन्तु सर्वलोक का राजा ईश्वर मानकर उनका आतिथ्य करते हैं। लौकिक राजा एक राज्य का राजा होता है। सर्वलोक का राजा ईश्वर ही हो सकता है, वही ऋषियों का भी पूज्य हो सकता है, सामान्य राजा नहीं। “राजा सर्वस्य लोकस्य धर्मचारी महारथः । पूजनीयश्च मान्यश्च भवान् प्राप्तः प्रियातिथिः ॥” अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, भावार्थरामायण तथा तुलसीकृत रामचरितमानस में राम के ऐश्वर्य- प्रधान रूप का वर्णन है, अतः उनके अनुसार ऋषि लोग उनकी स्तुति, पूजा आदि करते हैं। ऋषि लोग उनका परमेश्वर के रूप में सम्मान करते थे। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों का यही दृष्टिकोण है। लक्ष्मण का संयम अध्यात्मरामायण के अनुसार जो बारह वर्ष तक निद्रा एवं आहार छोड़ सकता है, वही मेघनाद का वध भी कर सकता है—युद्धकाण्ड सर्ग ८ । कृत्तिवासरामायण में इसी बात का उपबृंहण है। “नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥” ( वा० रा० ४।६।२२ )
४७४ रामायणमीमांसा पञ्चदश यह श्लोक भी लक्ष्मण के संयम का सूचक है। लक्ष्मण कहते हैं कि मैं सीता के केयूरों और कुण्डलों को नहीं पहचानता, किन्तु नित्य पादवन्दना के कारण उनके नूपुरों को पहचानता हूँ, ये उन्हीं के हैं। विश्वामित्र की बला और अतिबला विद्याओं में ये गुण विद्यमान थे जिनसे श्रम, ताप और रूपविपर्यय तथा क्षुधा-पिपासा की बाधा नही होती थी— “मन्त्रग्रामं गृहाण त्वं बलामतिबलां तथा । न श्रमो न ज्वरो वा ते न रूपस्य विपर्ययः ॥ न च सुप्तं प्रमत्तं वा धर्षयिष्यन्ति नैर्ऋताः। क्षुत्पिपासे न ते राम भविष्येते नरोत्तम ॥” (वा० रा० १।२२।१३,१८) यद्यपि वाल्मीकिरामायण के अनुसार विश्वामित्र ने यह विद्या राम को ही प्रदान की थी। तिलकटीका- कार कहते हैं—“'गृहाण त्वं' में 'त्वम्' उपलक्षण है। लक्ष्मण को भी वह विद्या दी गयी है, क्योंकि क्षुधा और पिपासा के सहनारूप फल दोनों में ही परिलक्षित होते हैं। राक्षसरूपी अरियों के वधार्थ इसकी अपेक्षा भी दोनों को ही थी। “तौ तत्र हत्वा चतुरो महामृगान् वराहमृश्यं पृषतं महारुरुम् । आदाय मेध्यं त्वरितं बुभुक्षितौ वासाय काले ययतुर्वनस्पतिम् ॥” ( वा० रा० ३।५५।३२ ) “बहून् मेध्यान् मृगान् हत्वा चेरतुर्यमुनात्तटे ।” ( वा० रा० ३।५५।३२ ) इत्यादि जहाँ कहीं राम, लक्ष्मण आदि का साथ भोजन करना वर्णित है वहाँ भी 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके' ( क० उ० १।३।१ ) “अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” के अनुसार “एकः पिबति अन्यः पाययति पिबन्तौ” की तरह समझना चाहिये । जीव कर्मफल का भोक्ता है ईश्वर अभोक्ता द्रष्टा ही है तथापि जैसे एक के छत्री होने पर भी बहुत छत्रहीन यात्रियों में 'छत्रिणो यान्ति' का व्यवहार होता है वैसे ही एक के भोक्ता होने पर भी दोनों में भोक्तृत्व का व्यवहार होता है, उसी तरह राम और सीता के भोजन में ही तीनों के भोक्तृत्व का व्यवहार हो सकता है। कम्ब- रामायण की कल्पना ठीक ही है कि शृङ्गवेर में निद्रादेवी लक्ष्मण के सामने आयी तब उन्होंने कह दिया कि अयोध्या लौटकर आयेंगे, तब आना ( कम्ब रा० २।६।११ ) । द्विपदरामायण के अनुसार उन्होंने उसे उर्मिला के पास भेज दिया। अतएव लक्ष्मण के लौटने तक उर्मिला सोती ही रही । रामकेति ( सर्ग १ ) के अनुसार निद्रा लक्ष्मण की एक हितैषिणी थी। जो नींद देने आया करती थी । गुह मिलने के बाद उन्होंने उससे कहा कि तुम १४ वर्ष बाद आना । इस अवधि में भोजन भी नहीं करूँगा । तुम क्षुधा को मुझसे हटाकर स्वस्थ सबल बनाये रखो । निद्रा ने वैसा ही करने की प्रतिज्ञा की । सीताहरण के पश्चात् राम सीता के पलंग पर मूर्च्छित होकर गिर जाते हैं । लक्ष्मण चालीस दिन तक तक निद्रा और अन्न त्याग कर राम का सिर गोद में लेकर निश्चल बैठे रहे। आकाशवाणी उनके इस संयम की प्रशंसा करती है । यह भी कहती है कि राम-सीता का वियोग १२ वर्ष बाद समाप्त होगा। इन सबमें आर्षवचन ही प्रमाण हैं । अन्य कथाओं में अनेक कल्पनाएँ जुड़ गयी हैं । अनु० ४६२ में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में सीता लक्ष्मण के सम्बन्ध का कोई विशेष ध्यान नहीं रखा गया । लक्ष्मण राम और सीता दोनों की सेवा करते हुए निःसंकोच बातचीत तथा व्यवहार करते थे । लक्ष्मण राम तथा सीता दोनों ही के पैर धोते थे ।” ( वा० रा० २।५०।४९ )
अध्याय] अरण्यकाण्ड ४७५ परन्तु इसमें संकोच का प्रश्न ही नहीं था। क्योंकि लक्ष्मण सीता और राम को अपने माता-पिता मानते थे। फिर पैर धोने में क्या आपत्ति हो सकती है। वस्तुतः श्लोक का वैसा अर्थ स्पष्ट नहीं है, जैसा अज्ञानी बुल्के ने किया। श्लोक यह है— “तस्य भूमौ शयानस्य पादौ प्रक्षाल्य लक्ष्मणः । सभार्यस्य ततोऽभ्येत्य तस्थौ वृक्षमपाश्रितः ॥ वा० रा० २।५०।४९) अर्थ—भूमि पर भार्या के सहित सोये राम के दोनों पैरों का प्रक्षालन करके वहाँ से हटकर वृक्षमूल में लक्ष्मण खड़े हो गये। बुल्के यह भी कहते हैं—राम लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि वह सीता को उठाकर नाव पर रख दे— “सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ।” ( वा० रा० २।५२।७५ ) वस्तुतः भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत से अपरिचित बुल्के अनेक स्थलों पर अर्थ समझने में प्रमाद करते हैं। पीछे भी लिखा है कि रावण को मारने के बाद राम हमारे दर्शन के योग्य बनेंगे, वैसे ही यहाँ भी प्रमाद ही है। श्लोक यह है—“आरोह त्वं नरव्याघ्र स्थितां नावमिमां शनैः । सीतां चारोपयान्वक्षं परिगृह्य मनस्विनीम् ॥” श्लोकार्थ यह है कि हे नरव्याघ्र ! घाट पर स्थित इस नाव को पकड़ कर सीता को नाव पर चढ़ाओ और पश्चात् तुम चढ़ो । “उठाकर नाव पर रख दो” यह तो किसी शब्द का अर्थ नहीं है। चढ़ाने का भी यही अर्थ हैं कि चढ़ने में सहायता दे दो । “एक ही पर्णशाला का निर्माण हुआ था, अतः तीनों एक में ही रहते थे ।” यह कथन भी ठीक नहीं है। यद्यपि माता, पिता और पुत्र के समान एक पर्णशाला में भी रहने में कोई दोष नहीं है, फिर भी ऐसा कोई वचन नही है कि तीनों एक ही पर्णशाला में सोते थे। प्रत्युत सर्वदा राम और सीता के रक्षण की दृष्टि से धनुष-बाण लेकर लक्ष्मण कुछ दूर ही रहकर प्रहरी का काम करते थे। राम के सोने पर तमसातीर पर सुमन्त्र और सूत दोनों ही जागते हुए पहरा दे रहे थे— “जाग्रतोरेव तां रात्रिं सौमित्रेरुदितो रविः । सूतस्य तमसा तीरे रामस्य ब्रुवतो गुणान् ॥” ( वा० रा० २।४६।१६ ) “तं जाग्रतमदम्भेन भ्रातुरर्थाय लक्ष्मणम् । गुहः संतापसंतप्तो राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० २।५१।१ ) गुह के प्रार्थना करने पर भी कि किसी भय से नहीं, किन्तु धर्मबुद्धि से हम जागरण करते हैं। सीता के साथ राम के भूमि पर सोते हुए निद्रा और सुख कहाँ ? बुल्के भी यह कहते है “अपहरण के ठीक पहले राम की आर्त वाणी सुनकर अपने पति की सुरक्षा के विषय में चिन्तित सीता उत्तेजित होकर अपने देवर पर यह आरोप लगाती हैं कि वह अपनी भाभी पर अनुरक्त हैं, इसी लिए राम के साथ वन में चले आये हैं ।” वस्तुतः यहाँ भी बहिर्मुखता के कारण ही अन्यथा कल्पना की जाती है। तिलक आदि टीकाओं में स्पष्ट वर्णन है। व्यावहारिक दृष्टि से यह सब शोकावेश का प्रभाव था। परमार्थतः तो लोकव्यवहार के अनुसार वह नाट्यमात्र था। लक्ष्मण ने भी लोकवत् ही व्यवहार किया था ।
एवं विबोधिततत्त्वोऽपि मनुष्यनाटनेन लोकव्यवहारविल्लक्ष्मणोऽवददित्याह । बुल्के कहते हैं "सीता की इसी लाञ्छना के अनुसार स्कन्दपुराण के नागरखण्ड (अ० २) में लक्ष्मण के स्वामिद्रोह की कल्पना कर ली गयी है।" परन्तु यह प्रमाद ही है। बुल्के भारतीय अर्थवादों की स्थिति से अपरिचित ही हैं। यह ठीक है निम्नोक्त वर्णन पुराणों में है कि— पितृकूपिका तीर्थ में राम श्राद्ध करते हैं, सीता कहीं छिप जाती हैं। लक्ष्मण को विप्रों की सेवा करनी पड़ती है। श्राद्ध के बाद सीता दिखायी पड़ती हैं जिससे लक्ष्मण को क्रोध होता है। वह सांथरी के लीपने तथा पैर धोने के लिए पानी ले आना भी अस्वीकार करते हैं। बाद में कोपसंरक्त लक्ष्मण दूर से राम को देखते हैं तो उनके मनमें राम का वध करके सीता को पत्नी बना लेने का विचार उठता है। “हृत्वैवं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च। किं गच्छामि निजं स्थानं विदेशं वापि दूरतः” ॥४५॥ प्रातः राम और सीता दक्षिण के लिए प्रस्थान करते हैं। लक्ष्मण राम के वध का अवसर ढूंढ़ते हुए दिन- भर उनका पीछा करते हैं— “लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा संधाय सायकम्। अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य छिद्रं विलोकयन्” ॥४९॥ शाम को गोकर्ण पहुँचकर लक्ष्मण राम के पास जाकर अपना अपराध स्वीकार करते हैं और राम से क्षमा पाते हैं। लक्ष्मण आत्मशुद्धि के उद्देश्य से राम के हाथ से मृत्यु चाहते हैं। नहीं तो अग्नि में प्रवेश करने की सोच रहे थे। उसी समय मार्कण्डेय आ पहुँचते हैं तथा स्वामिद्रोह के लिए बालमण्डन तीर्थ में स्नान करने का परामर्श देते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड २९।१२६-१९०) में लक्ष्मण का विद्रोह और पश्चात्ताप वर्णित है, किन्तु वहाँ सीता के प्रति दुर्भाव का वर्णन नहीं है। “एहि लक्ष्मण शीघ्रं त्वं पुष्कराज्जलमानय । पादप्रक्षालनं कृत्वा शयनं कुरु सत्वरम् ॥१२६॥ विभावर्यां निवृत्तायां यास्यामो दक्षिणां दिशम् । लक्ष्मणस्त्वब्रवीद् रामं सीतयाऽऽनीयतां पयः ॥१२७॥ नाहं राम सर्वकालं दासभावं करोमि ते। इयं पुष्टा च सुभृशं पीवरी च ममाप्युत ॥१२८॥ करिष्यसि किमनया भार्यया वद साम्प्रतम् । किं वा मृतस्य ते प्रेत्य इयं यास्यति ते प्रिया ॥१२९॥ रक्षसि त्वं सदाकालं सुपुष्टां चैव सर्वदा। करोषि क्लेशवहनं सततं मां रघूद्वह ॥१३०॥ मय्यपि क्लेशिते राम परत्र जायते क्षतिः । त्वत्कृते च सदा चाहं पिपासां क्षुधया सह ॥१३१॥ सुसहामि न सन्देहः परत्र च निशामय । मृतानां पृष्ठतः कश्चित् गतो नैवेह दृश्यते ॥१३२॥
अध्याय अरण्यकाण्ड ४७७
करिष्यसे किमनया वद राघव साम्प्रतम् । श्रुत्वा स नोक्तपूर्वं तु वाक्यं लक्ष्मणभाषितम् ॥१३६॥ विमना राघवस्तस्थौ सीता चापि वरानना ॥१३७॥ श्रीराम उवाच एह्युत्तिष्ठस्व सौमित्रे व्रजामो दक्षिणां दिशम् । सौमित्रिरब्रवीद् वाक्यं नाहं यास्ये कथञ्चन ॥१३९॥ व्रज त्वमनया सार्धं भार्यया कमलेक्षण ॥१४०॥ अनारतं दिवा चाहं रात्रौ चैव परन्तप ॥१४६॥ कर्म कर्तुं न शक्नोमि व्रज सौम्य यथासुखम् ॥१४७॥ मा मानुव्रज सौमित्र एको यास्यामि काननम् । द्वितीया मे त्वियं सीता रामेणोक्तस्तु लक्ष्मणः ॥१५२॥ अथ गृह्य समुत्तस्थौ रामवाक्यं स लक्ष्मणः । मर्यादापर्वतं प्राप्तः क्षेत्रसीमां परन्तप ॥१५३॥ इन्द्रमार्गां नदीं प्राप्य जटाजूटं नियम्य च । विहस्य लक्ष्मणेत्युक्त्वा इदमर्पय मे धनुः ॥१८१॥ नापराध्यामि रामस्य कर्मणा मनसा गिरा। उभौ हस्तौ मुखे कृत्वा साश्रुकण्ठोऽब्रवीदिदम् ॥१८६॥ स्पृष्टौ ते चरणौ देव मम नान्या गतिर्भवेत् । ततः सीताब्रवीद् रामं त्यक्तः किमनुजस्त्वया । वैषम्यं त्यज्यतां बाले लक्ष्मणे लक्ष्मिवर्धने ॥१८७॥ राघवस्त्वब्रवीत्सीतां नाहं त्यक्ष्यामि लक्ष्मणम् ॥ न कदाचिदपि स्वप्ने लक्ष्मणस्येदृशं प्रिये । श्रुतपूर्वं च सुश्रोणि क्षेत्रस्यास्य विचेष्टितम् ॥१८८॥ अत्र क्षेत्रे न सौभ्रात्रं सर्वे हि स्वार्थतत्पराः । परस्परं न मन्यन्ते स्वार्थनिष्ठैकहेतवः ॥१८९॥ न शृण्वन्ति पितुः पुत्राः पुत्राणां च तथा पिता । न शिष्यो हि गुरोर्वाक्यं शिष्यस्यापि तथा गुरुः ॥ अर्थानुबन्धिनी प्रीतिर्न कश्चित्कस्यचित्प्रियः १॥”१९०॥ × × × “हत्वैनं राघवं सुप्तं सीतां पत्नीं विधाय च। किं गच्छामि निजस्थानं विदेशं वापि दूरतः ॥ लक्ष्मणोऽपि धनुः सज्यं कृत्वा सन्धाय सायकम् । अनुव्रजति पृष्ठस्थस्तस्य च्छिद्रं विलोकयन्२ ॥” × × ×
१. पद्मपुराण सृष्टिखण्ड अध्याय १९ श्लो० १२६-१९० बालमण्डनतीर्थ-माहात्म्य । २. स्कन्दपुराण नागरखण्ड अ० २० ।
४७८ रामायणमीमांसा पञ्चदश "ईदृक् क्षेत्रप्रभावोऽयं सोभ्रात्रेण विवर्जितः । पञ्चक्रोशात्मके क्षेत्रे ये वसन्त्यत्र लक्ष्मण ॥७२॥ अपि स्वल्पं न सौभ्रात्रं तेषां सञ्जायते क्वचित् ॥७३॥ तावत्स्नेहपरो मर्त्यः तावद्वदति कोमलम् । चमत्कारोद्भवं क्षेत्रं यावन्न स्पृशतेऽङ्घ्रिभिः ॥७४॥ येऽन्येपि निवसन्त्यत्र पक्षिणः पशवो मृगाः । तेऽपि सौहार्दनिर्मुक्ताः सस्पर्धा इतरेतरम् ॥७५॥ कस्यचित्केनचित्सार्धं सौहार्दं नैव विद्यते । तस्मान्नैवास्ति ते दोष ईदृक् क्षेत्रस्य संस्थितिः १ ॥"७६॥ श्रीराम ने कहा लक्ष्मण पुष्कर से जल लाओ पादप्रक्षालन कर शीघ्र ही शयन करो। रात बीत जाने पर हम सब लोग दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करेंगे । लक्ष्मण ने कहा सीता ही जल लाये । मैं सब समय दासता नहीं करूँगा । ये तो मुझसे भी अधिक पुष्ट और मोटी हैं, ऐसी पत्नी का क्या करोगे ? क्या मरने पर यह साथ जायेगी । इसके लिए मैं भी कष्ट पाता हूँ। तुम्हारे लिए भी क्षुधा-पिपासा सहता हूँ । लक्ष्मण की इस प्रकार की बातें पहले कभी नहीं सुनीं थीं । राम और सीता आश्चर्य में पड़कर विमना हो गये । फिर राम ने कहा आओ लक्ष्मण, हम लोग दक्षिण की ओर प्रस्थान करें । लक्ष्मण ने कहा हम नहीं जायेंगे । कमलेक्षण, आप इसके साथ जाओ । मैं अब दिन रात परिश्रम नहीं कर सकता । राम ने कहा अच्छा मेरे साथ मत जाओ । सीता ही जायगी । यह सुनकर लक्ष्मण उठे । मर्यादापर्वत के पास क्षेत्र की सीमा इन्द्रमार्गा नदी पर जाकर जटाजूट बाँधकर राम ने कहा लक्ष्मण लाओ मेरा धनुष दे दो । लक्ष्मण ने सोचा मैं मनसा, वाचा, कर्मणा कभी राम का अपराध नहीं करता हूँ । लक्ष्मण ने दोनों हाथों को मुख पर रखकर साश्रुकण्ठ होकर कहा मैं आपका चरणस्पर्श करके कहता हूँ मेरी आपको छोड़कर दूसरी गति नहीं है । सीता ने कहा क्या आपने अनुज को त्याग दिया । लक्षिमवर्धन लक्ष्मण बालक हैं । इनके प्रति वैषम्य त्याग दीजिये । राम ने कहा—सीते, मैं स्वप्न में भी लक्ष्मण को त्याग नहीं सकता, फिर भी अश्रुतपूर्व बात लक्ष्मण के मुख से सुनी है यह इस क्षेत्र का प्रभाव है । यहाँ सौभ्रात्र रहता ही नहीं । सभी स्वार्थतत्पर ही रहते हैं । परस्पर किसी का किसी से प्रेम नहीं होता । यहाँ पुत्र पिता की बात नहीं सुनते और पुत्रों की बात पिता भी नहीं सुनता । शिष्य गुरु को गुरु शिष्य की बात नहीं सुनते । सभी की अर्थानुबन्धिनी ही प्रीति होती है ( पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ) । स्कन्दपुराण में वहाँ लक्ष्मण सोचते हैं सोते हुए राम को मारकर सीता को पत्नी बनाकर अपने ही स्थान पर अथवा कहीं दूर चले जायेंगे और सज्य धनुष पर बाण रखकर राम का छिद्र अन्वेषण करते हुए पीछे जाते हैं । आगे चलकर श्रीराम ने बतलाया था कि इस पञ्चक्रोशात्मक क्षेत्र का यह प्रभाव है कि यहाँ सौभ्रात्र है ही नहीं । प्राणी तब तक ही स्नेहवान् रहता है, तभी तक कोमलभाषी होता है जब तक इस क्षेत्र का स्पर्श नहीं करता । यहाँ के पशु, पक्षी, मृग सभी सौहार्दमुक्त एवं परस्पर स्पर्धावान् ही होते हैं । यहाँ किसी का किसी के साथ सौहार्द नहीं होता है । अतः लक्ष्मण तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह इस प्रकार के क्षेत्र का ही प्रभाव है । जैसे शुभ क्षेत्र का शुभ प्रभाव होता है वैसे ही अशुभ क्षेत्र का अशुभ प्रभाव भी होता है, यह भी अर्थवाद ही है । किन्तु बुल्के ने स्थान के प्रभाव की चर्चा न कर सीता लक्ष्मण को दोषी दिखाने की कपटपूर्ण मनोवृत्ति से पाठकों को धोखा दिया है । १. स्कन्दपुराण नागरखण्ड अ० २० हाटकेश्वर-माहात्म्य के अन्तर्गत बालमण्डनतीर्थ-माहात्म्य में लक्ष्मण के प्रति मार्कण्डेय मुनि की उक्ति ।
अध्याय अरण्यकाण्ड ४७९ परन्तु उक्त कथाओं का तात्पर्य तीर्थों के माहात्म्य-वर्णन में ही है। कहा जा चुका है कि वेदों में कर्म और उपासना की खूब महिमा वर्णित होने पर भी समुच्चय-विधान की दृष्टि से एक-एक की निन्दा की गयी है। इस प्रकार लक्ष्मण की सीता और राम में अखण्ड भक्ति होने पर भी उनके द्वारा भी स्वामि-द्रोह हो जाने पर उसकी भी निवृत्ति बालमण्डनतीर्थ स्नान से हो सकती है। दूसरी बात यह है रामचरितमानस में सुमित्रा ने बड़ी ही तत्परता से लक्ष्मण को उपदेश किया था। राग, रोष, ईर्ष्या, मद तथा मोह इनके वश में कभी भी न होना। सब प्रकार के विकारों को छोड़कर श्रीरामजी की सेवा करना। राग रोष इरखा मद मोहू। जनि सपनेहुँ इनके बस होहू ॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करहु सेवकाई ॥ (वा० रा० १।७४।३) सेवाधर्म परम गहन है— “सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।' अति परिचय और अति सन्निधान से अवज्ञा, राग, रोष, ईर्ष्या आदि दोषों का सन्निवेश हो सकता है। इसी लिए सुमित्रा का सावधान करना उचित था। यहाँ पर और भी सावधानी बरतने का यह अर्थवाद है। अर्थात् इतने सावधान और संयमी के मन में भी क्रोध हो सकता है अतः अत्यन्त सावधान रहना उचित है। शास्त्रों में कहा गया है—माता, दुहिता और स्वसा के साथ भी कभी विवक्तासन (एकान्त) में नहीं बैठना चाहिये। बलवान् इन्द्रियसम्मूह विद्वान् को भी आकृष्ट कर लेता है— “मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥” ( मनु० २।२१५ ) इसी के अर्थवाद रूप में ब्रह्मादि बड़े-बड़े लोगों की कामवश्यता की बातें कही गयी हैं। इसी तरह पुराणों में भी लक्ष्मण के मन में क्रोध आदि का चित्रण करके अत्यन्त सावधानी बरतने का संकेत किया गया है। जिसे बुल्के ने उलटकर अपनी दूषित मनोवृत्ति से लक्ष्मण जैसे संयमी पर दोषारोप का साधन बना लिया है। पुराणों में यह भी कथा है कि पूर्वोक्त प्रकार से लक्ष्मण के मन में विकार हुआ, परन्तु कुछ दूर जाने पर वह विकार शान्त हो गया और उन्होंने बड़े दुःख के साथ राम से अपने दोषों का निवेदन कर दिया था। अन्त में राम के कुछ दूर पर स्थित किसी महर्षि से प्रश्न करने से ज्ञात हुआ कि जिस स्थल पर लक्ष्मण को मोह हुआ था, वहाँ कुछ अत्यन्त अनाचार-पूर्ण व्यक्तियों का निवास रह चुका है। उनके संस्कारों का वह प्रभाव था। ऐसे कई निकृष्ट स्थल होते हैं, जहाँ पहुँचते ही अनेक प्रकार की दुर्भावनाओं का जन्म होता है और कई स्थल ऐसे भी होते हैं जहाँ पहुँचते ही अत्यन्त उत्कृष्ट भावनाएँ जन्म लेती हैं। इसी लिए विशिष्ट देश और विशिष्ट काल का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। इससे यह भी समझा जा सकता है कि जैसे नारद, काकभुशुण्डि, गरुड़ आदि महापुरुषों में माया का प्रभाव कभी कभी पड़ा करता है। उसी तरह लक्ष्मण, यद्यपि राम के बहिश्वर प्राण ही थे— ‘नित्यं प्राणो बहिश्चरः” ( वा० रा० ३।३४।१३ )—तथापि माया का प्रभाव उनपर भी पड़ा। केवल उत्कर्ष दिखाने के लिए ही पुराणों में वैसा वर्णन है। वाल्मीकिरामायण आर्ष इतिहास है। उसके द्वारा जो लक्ष्मण का स्वरूपवर्णन है वही ऐतिहासिक तथ्य है। तदनुसार— “नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥” ( वा० रा० ४।६।२२ )
४८० रामायणमीमांसा पञ्चदश मैं सीता के केयूर और कुण्डलों को नहीं पहचानता क्योंकि मेरी दृष्टि ऊपर के अङ्गों पर गयी ही नहीं— मैं नूपुरों को पहचानता हूँ, क्योंकि नित्य ही उनके चरणों का वन्दन करता हूँ, अतः उन्हें पहचानता हूँ। खोतानी रामायण का यह कथन कि राम और लक्ष्मण दोनों का विवाह सीता से हुआ है, यह सर्वथा अशुद्ध है और वहाँ के बहुपति-प्रथा के संस्कारों का प्रभाव है। वाल्मीकिरामायण के उपर्युक्त श्लोक को प्रक्षिप्त कहना असङ्गत है, क्योंकि टीकाकारों ने इसपर व्याख्या की है। अन्य पाठों में उनका न मिलना प्रक्षेप होने में हेतु नहीं है। अवतारवाद सभी पाठों में मिलता है तब भी बुल्के आदि उसे प्रक्षिप्त ही मानते हैं। यह सब कथन भारतीय-संस्कृति-द्वेषमूलक ही है। अतएव भावार्थरामायण की यह कथा ठीक ही है, जिसमें कहा गया है कि राम किसी दिन लक्ष्मण की रक्षा में सीता को छोड़कर बाहर गये थे। सीता को नींद आ गयी । नींद में ही उनके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गये, जिससे उनका शरीर अनावृत हो गया। साधना में लीन होने के कारण लक्ष्मण ने उधर ध्यान नहीं दिया। राम ने आकर लक्ष्मण से पूछा कि स्त्री का रूप देखकर किसका मन स्थिर रह सकता है । लक्ष्मण ने उत्तर दिया "रामभक्त का ही मन इससे प्रभावित नहीं होता ।" लक्ष्मण किसी मन्दिर में रहकर १२ वर्ष तक तप करते हैं, अन्त में सीता कहती है कि मैंने स्वप्न में तुम्हें कलसापुर के राजा से युद्ध करते हुए देखा है । उसमें तुम्हारी जीत हुई थी । लक्ष्मण स्वप्न की सच्चाई की परीक्षा के लिए उस ओर चल पड़े । सीता ने महल छोड़कर लोमड़ी, अञ्जीर-वृक्ष तथा जलस्रोत बनकर उनको रोका, पर लक्ष्मण नहीं रुके । वहाँ जाकर उन्होंने युद्ध किया, फलस्वरूप उनका वध हो गया। पीछे राम ने जाकर उन्हें जिला लिया । आदिवासियों में प्रचलित उक्त रामकथा का तात्पर्य लक्ष्मण की संयमशीलता का वर्णन करने में ही है। शास्त्रसम्बन्धशून्य कथाओं में विकृतियाँ अनेक प्रकार से आ जाती हैं, यह भी इसी का उदाहरण है। सर्वथाऽपि रामायण के विविध पात्रों और घटनाओं की वास्तविकता जानने के लिए वाल्मीकिरामायण का आश्रयण उचित है। शूर्पणखा ४६३ वाँ अनुच्छेद । शूर्पणखा रावण की भगिनी तथा विद्युज्जिह्व की पत्नी थी । विद्युज्जिह्व के मरने पर वह खर के पास रहती थी । खर चाहे मातृस्वसेय ( मौसेरा भाई ) ही हो तब भी भाई ही हुआ। अतः "भ्रातरौ खरदूषणौ” ( वा० रा० ३।१७।२२ ) के अनुसार खर और दूषण को भाई कहना असङ्गत नहीं है। विद्युज्जिह्व का वध रावण की दिग्विजय-यात्रा में रावण द्वारा हुआ (वा० रा० ७।२३।१७,१८) । रामकेति के अनुसार उसका नाम वर्गासींगा था । रावण उसे लङ्का की रक्षा में नियुक्त करके कहीं गया हुआ था। उसने अपनी जिह्वा को फैला कर लङ्का को ढँक लिया था। रावण ने उसे भी शत्रु का उपद्रव समझ कर अनजान में उसे काट डाला । उस समय शूर्पणखा गर्भिणी थी। वह दर्सासींगा को जन्म देती है। वह पिता का बदला लेने के लिए शक्तिप्राप्त्यर्थ तपस्या करता है । पउमचरियं के अनुसार उसका नाम चन्द्रनखा था । उसका विवाह विद्याधरवंशीय राजकुमार खरदूषण से होता है । उसका पुत्र शम्बूक लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। राफल्स हस्तलिपि के अनुसार शम्बूकवध के बाद लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करते हैं। पउमचरियं के अनुसार लक्ष्मण उसपर अनुरक्त थे । किसी बहाने से वे राम से अलग होकर उसे ढूंढते हैं। उसे न पाकर आतुर होते हैं ( ४३, ४८ ) । यह सब भी राम की पवित्र कथा में विकृति पहुँचाने का प्रयास है। सारलादास के महाभारत वनपर्व में सीता सखी पाने की इच्छा से चाहती है कि लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करें। राम भी अनुरोध करते हैं, परन्तु लक्ष्मण अस्वीकार करते हैं और उसके नाक-कान काट लेते हैं। यह भी अंशतः वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार शूर्पणखा राम से उनकी पत्नी बनने का प्रस्ताव करती है। राम उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं। वे पुनः उसे राम के पास वापस भेजते हैं। राम की अस्वी-
कृति से वह सीता पर आक्रमण करती है। तब राम की आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण उसकी नाक और कान काट देते हैं। भागवत ( ९।१०।९ ), गरुड़पुराण ( अध्याय १४३ ), पद्मपुराण ( पातालखण्ड अध्याय ३६ ) तथा देवीभागवत ( ३।२८ ) में भी यही वृत्तान्त उल्लिखित है। नृसिंहपुराण के अनुसार उसके एक पत्र की भी चर्चा है, जिसमें वह कहती है— “अतीव निपुणा चाहं रतिकर्मणि ।” मैं रतिकर्म में अति निपुण हूँ। राम भी पत्र द्वारा ही लक्ष्मण को संकेत करते हैं कि उसके नाक-कान काट दिये जायें। साहित्यिकों के यहाँ पत्र का भी रसाङ्गरूप में सन्निवेश है। अतः यह विरुद्ध नहीं है। अतएव भावार्थरामायण ( ३।८ ) में भी उसका उल्लेख ठीक ही है। सेरीराम के अनुसार वह खरदूषण के पास जाकर कहती है मैंने लक्ष्मण का प्रेमप्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था, इसलिए उसने मेरे पुत्र का वध कर दिया है। मन्त्री के परामर्शानुसार वह सुन्दर रूप धारण कर राम को आकर्षित करने का प्रयत्न करती है। राम उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं। पर साधना में लीन लक्ष्मण उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं करते। पुनः राम के पास जाकर वह सीता का अपमान करती है तब राम पत्र द्वारा लक्ष्मण को उसके नाक-कान काटने का आदेश देते हैं। कम्बरामायण ( ३।५ ), आनन्दरामायण ( १।७।५५ ) आदि के अनुसार लक्ष्मण ने शूर्पणखा के स्तन भी काट दिये थे। किसी में बाल काटने की बात भी है। बालरामायण अङ्क ५ के अनुसार वह वनवास के पूर्व ही राम और लक्ष्मण द्वारा ठुकरायी गयी थी। जैनरामायणों में शूर्पणखा के विरूपकरण का वृत्तान्त नहीं है। वह लक्ष्मण पर मोहित होती है, असफल होने पर अपने नाखूनों से ही शरीर क्षत-विक्षत कर धूलिधूसरित होकर बाल बिखेर कर अपने भवन में विलाप करती है। पूछने पर कहती है कि शम्बूकहन्ता लक्ष्मण ने मेरा आलिङ्गन किया तथा मुझसे बलात्कार करना चाहा, किन्तु मैं छुड़ा कर भाग आयी। यह सब प्राचीन कथा में कुछ नवीनता लाने का प्रयासमात्र है, जो सर्वथा असंगत है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार विरूपित होकर वह खर के पास जाती है। वह पहले १४, पश्चात् १४ सहस्र राक्षसों को भेजता है और स्वयं भी जाता है। राक्षसों की सेना को आते देख राम लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि वे सीता को लेकर गुहा का आश्रयण करें— “तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः । गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गां पादपसङ्कुलाम् ॥” ( वा० रा० ३।२४।१२ ) बुल्के कहते हैं—"गुफा में छिप जायें" पर यह श्लोकार्थ नहीं है। राम अनेकों राक्षसों का, दूषण, त्रिशिरा तथा खर का भी वध कर देते हैं। शूर्पणखा रावण के पास जाकर यह वृत्तान्त कहती है। गौड़ीय पाठ के अनुसार गान्धर्वास्त्र के प्रभाव से राक्षस अपने साथियों को रामरूप देखकर आपस में ही एक दूसरे को मारते हैं। ब्रह्मवैवर्त में लक्ष्मण द्वारा खर और दूषण के वध की कथा है। इसका समाधान कल्पभेद से करना चाहिये। सेरीराम में भी वैसी ही कथा है। उसके अनुसार “दरकालहसीन” खरदूषण का पुत्र रावण के पास जाता है। रामनाटकों के अनुसार शूर्पणखा मन्थरा अथवा कैकेयी का रूप धारण कर राम के निर्वासन का सफल प्रयास करती है। कृत्तिवास- रामायण तथा भावार्थरामायण में सीता से मिलने वह अशोकवाटिका में आयी थी ( ५।१० )। श्यामदेश के ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा ही कनकम्ग बनी थी। आश्चर्यचूड़ामणि के अनुसार वह सीता बन जाती है। कृत्यारावण में वह पहले गौतमी पश्चात् सीता बनती है। ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा रावण का चित्र बनाने के लिए सीता को प्रेरित करती है और सीतात्याग का कारण बनती है। ब्रह्मवैवर्त के अनुसार राम से ठुकराये जाने पर राम को शाप देती है, तुम्हारी भार्या का अपहरण होगा— ६१
४८२ रामायणमीमांसा पञ्चदश “मम शापात्तथा रामो हृतभार्यो भविष्यति ।” ( ब्रह्मवै० कृष्णजन्मखण्ड ६२।४४ ) और वह पुष्कर में तपस्या करने जाती है। वहाँ वह ब्रह्मा से वरदान प्राप्त करती है। अपने शरीर को अग्नि में जला कर कुब्जा बनकर कृष्ण को प्राप्त करती हैं। जिस किसी तरह भी भगवान् में मन लगाकर प्राणी को सद्गति मिलती है। भगवान् राम तथा भगवान् कृष्ण का स्वरूप दिव्य शक्ति से विशिष्ट ब्रह्मरूप ही था । गुणकृत आवरण-शून्य होने से वे निरावरण परब्रह्मरूप ही थे, अतः काम, क्रोध, भय और स्नेह जिस किसी तरह भी भजने से कल्याणकारी होते हैं— “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।। कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” ( भाग १०।२९।१४,१५ ) जटायु ४७० वें अनु० में बुल्के यह मानते हैं कि तीनों पाठों में जटायु की राम से भेंट सीता-हरण से पहले हुई थी तथा उसने सीता की रक्षा की प्रतिज्ञा की थी। पर तब भी वे उसे प्रक्षेप मानते हैं और उसमें हेतु देते हैं कि सीता को ढूंढते हुए राम ने जटायु को देखा तो यह समझा कि यह कोई राक्षस है। इसी ने सीता को खा लिया होगा (वा० रा० ३।६७।११) । परन्तु उनकी समझ में यह नहीं आता है कि शोक-व्याकुल होने से राम को ऐसा भ्रम हुआ था कि सीता मेरी परीक्षा लेने के लिए कहीं छिप गयी है (वा० रा० ३।६१।१६,१७) ! आगे सीता स्वयं जटायु से राम के लिए सन्देश भी कहती हैं। यह सब पूर्वपरिचय का ही सङ्केत है। जटायु रावण की निन्दा कर उसे युद्ध के लिए ललकारता है और युद्ध में नखों से रावण को आहत करता है। धनुष छीनकर नष्ट कर देता है। रथ के खरों का वध कर रथ को तोड़ देता है। अन्य राक्षसों और सारथि को मार डालता है । रावण भी भूमि पर गिर जाता है—“पपात भुवि रावणः” ( वा० रा० ३।५१।१३ ) । फिर वह उठ कर आकाश में सीता को ले जाता है। जटायु उसकी बायी भुजाएँ काट डालता है, किन्तु वे फिर उत्पन्न हो जाती हैं। अन्त में वह सीता को छोड़कर जटायु के पक्ष, पाद तथा पार्श्व को काटकर गिरा देता है। सीता जटायु के पास पितृस्नेह से विलाप करती हैं— “अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता ।” ( वा० रा० ३।५१।४४ ) इससे भी प्राचीन परिचय ध्वनित होता है। आश्चर्य है कि जो बुल्के राम के विष्णु अवतार होने में विश्वास नहीं करते वे यह विश्वास कैसे कर लेते हैं कि रावण की भुजाएँ कट गयीं और फिर से नवीन भुजाएं उत्पन्न हो गयीं और यीशु के चमत्कारों में कैसे विश्वास करते हैं। रावण अपने जीवन का अन्त करने के लिए सीता को केशों से पकड़ कर आकाशमार्ग से प्रस्थान करता है। केशग्रहण के कारण चराचर वित्रस्त हो गया। घोर तम से आवृत्त हो गया। वायु निश्चल और सूर्य निष्प्रभ हो गये । श्रीब्रह्मा ने दिव्यचक्षु से रावण का विनाश देखकर अवतार-कार्य की सफलता देखी। ऋषि लोग प्रहृष्ट और प्रव्यथित हो गये। रावण का संहार देख प्रसन्न हो गये परन्तु सीता का तात्कालिक दुःख देखकर प्रव्यथित हुए ( वा० रा० ३।५२।८-११) । काश्मीरीरामायण में यह देखकर कि रावण तलवार से जटायु को मारनेवाला है सीता कहती है इसे रक्त से सने पत्थर खिलाइये वह गिर जायेगा। रावण वैसा ही करता है। किसी कथा में रावण अपनी जांघ से रक्त
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अध्याय अरण्यकाण्ड ४८३ निकाल कर रक्त से सना पत्थर खिलाता है—पाश्चात्य वृत्तान्त नं० ३। इसमें सीता का उद्देश्य यही रहा होगा कि इससे जटायु कम से कम जीवित तो रहेगा । हिन्दोनेशिया के सेरीराम के अनुसार सात दिन युद्ध करने के बाद दोनों एक दूसरे को अपना मर्मस्थान बताते हैं । पर रावण धोखा देकर अपने पैर का अँगूठा बतलाता है । सीता पक्षियों की भाषा में जटायु को मर्मस्थान न कहने का अनुरोध करती हैं, पर जटायु अपने पक्ष के अग्रभाग को मर्मस्थान बताकर मारा जाता है । सीता अपनी अँगूठी उसके मुख में रख देती है । तत्त्वसंग्रहरामायण (३।५) तथा भावार्थ- रामायण ( ३।१७ ) में भी यह कथा है । रामकेति एवं रामकियेन में सीता की अँगूठी छीन कर रावण उससे जटायु को मारता है और वह गिर जाता है । रामोपाख्यान ( महाभारत ) के अनुसार राम-लक्ष्मण कनकम्गवध के बाद वापस आते हुए जटायु से भेंट करते हैं । उनसे वह कहता है कि रावण सीता का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर चला गया । पर वाल्मीकिरामायण के अनुसार पहले वे पर्णशाला को शून्य देखते हैं । फिर सीता की खोज करते हैं । आगे युद्ध का चिह्न ( टूटा रथ ) देखकर राक्षसों द्वारा सीताहरण एवं वध की आशङ्का करते हैं । आगे बढ़कर आहत रक्ताङ्ग जटायु को देखते हैं । बुल्के इन वर्णनों में बहुत अंशों को छोड़ते जाते हैं, क्योंकि अधिकांश भागों को प्रक्षेप मान कर वे चलते हैं । जटायु राम और लक्ष्मण के सामने ही प्राण त्याग देता है । राम विधिवत् उसकी अन्त्येष्टि करते हैं । उदात्तराघव के अनुसार जटायु रक्तयुक्त चोंच से पत्तों पर लिख कर राम से रावण को मारने का अनुरोध करता है तथा किसी ऋषि के हाथ पत्र को राम के पास भेज देता है । बुल्के के अनुसार राम मृत जटायु के प्रति शुभकामना प्रकट हुए कहते हैं— “मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान् ।” ( वा० रा० ६८।३० ) परन्तु इस वचन से शुभकामना तो प्रकट नहीं होती, किन्तु साधिकार अनुज्ञा प्रकट होती है । राम कहते हैं कि मेरी आज्ञा से तुम सर्वोत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करो । ऐसी आज्ञा ईश्वर ही दे सकता है, अन्य नहीं । शुभकामना में तो प्रार्थना होती है कि ईश्वर तुम्हें सद्गति प्रदान करें । तिलकटीका में कहा गया है कि जटायु को सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई थी । इससे स्पष्ट होता है कि सङ्कल्पमात्र से कर्मों में अनधिकृत एवं साधनहीन जटायु को अनुत्तम ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले राम सर्वथा परमेश्वर हैं । एतावता जो कहते हैं कि राम का ज्ञान माया से आवृत था, उनका मुख ध्वस्त हो जाता है। शोकादि का तो नटन नाट्यमात्र ही है। अतएव पद्मपुराण में कहा गया है— “संस्कारमकरोत्तस्य रामो ब्रह्म विधानतः । स्वपदं च ददौ तस्मै सार्धप रामप्रसादतः ॥ हरेः सामान्यरूपेण प्रययौ परमं पदम् ।” जटायु का श्राद्ध, तर्पण आदि भी राम ने विधिपूर्वक किया । अतएव अध्यात्मरामायण ( २।८ ) में उसके दिव्य रूप धारण करने की बात कही गयी है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार जटायु दशरथ का सखा तथा सम्पाति का भाई था । ये दोनों विनतासुत अरुण के पुत्र थे । दोनों होड़ में सूर्य के पास पहुँच गये । सम्पाति ने अनुज को किरणों से व्याकुल देख कर उसे अपने पक्षों से ढँक लिया । इस तरह जटायु तो बच गया पर सम्पाति के पक्ष जल गये । वह विन्ध्य पर्वत पर गिर गया । सीताहरण के समय जटायु की आयु ६०००० वर्ष की थी ( वा० रा० ३।५०।२० ) । महाभारत के रामोपाख्यान में जटायु को दशरथ का सखा कहा गया है । पद्मपुराण के पातालखण्ड तथा कृत्तिवासरामायण ( १।२७ ) में कहा गया है कि कभी अयोध्या में अनावृष्टि हुई थी । नारद से उसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर शनि का दृष्टिपात जानकर दशरथ शनि से युद्ध करने गये । शनि की दृष्टि से दशरथ का रथ टूट गया, जटायु ने उसे सँभाला । दशरथ की विजय हुई । फलस्वरूप अग्नि को साक्षी करके दोनों ने मित्रता की ।
४८४ रामायणमीमांसा पञ्चदश पउमचरियं के अनुसार दण्डक ही जटायु था । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार जिसने उशना की पुत्री अरजा से बलात्कार किया था, जिसे भार्गव के शाप से इन्द्र ने समस्त राज्य के साथ भस्म कर दिया था एवं जिससे दण्डकारण्य प्रसिद्ध हुआ था । पउमचरियं के अनुसार दण्डक एक श्रमण का धैर्य देख कर श्रमणों का आदर करने लगा । किसी यात्री ने निर्ग्रन्थक मुनि का वेष धारण कर अन्तःपुर में अनधिकार प्रवेश किया । राजा ने क्रोध में आकर सब श्रमणों को यन्त्र में पेरने का आदेश दिया । एक श्रमण ने क्रोधाग्नि से समस्त शहर को भस्म कर दिया । दण्डक भटक-भटक कर मर गया तथा इस गीध के रूप में प्रकट हुआ । अन्त में मुनि ने गीध को सदुपदेश दिया । वह श्रावक धर्म में सम्मिलित हुआ । मुनि ने सीता से निवेदन किया कि वह उसकी रक्षा करें । उसके सिर की जटाएँ देखकर राम ने उसे जटायु कहा । रामायण, महाभारत तथा पुराणों की कथाओं को विकृत रूप में वर्णन करने का यह भी एक उदाहरण है । सीता की खोज ४७३ वें अनु० में सीता की खोज पर विश्लेषण है । वाल्मीकिरामायण की कथावस्तु का संक्षिप्त वर्णन है । बुल्के के अनुसार अयोमुखी-वृत्तान्त शूर्पणखा के वृत्तान्त की आवृत्ति मात्र है । पर यह कथन निरर्थक है, क्योंकि दो सामान्य घटनाओं का होना असम्भव नहीं है । कबन्ध राम और लक्ष्मण द्वारा भुजाएँ काटी जाने के बाद भूमि पर गिर गया । अनन्तर उसने दो शापों का उल्लेख किया । कबन्ध भयानक रूप धारण कर ऋषियों को सताया करता था । स्थूलशिरा ऋषि ने उसे शाप दिया कि तुम यही भयंकर रूप धारण किये रहो । विनय करने पर उन्होंने कहा—जब राम तुम्हारी भुजाएँ काटकर तुम्हारा शरीर जला देंगे तब फिर तुम शुभ रूप ग्रहण करोगे । दूसरी कथा के अनुसार वह दनु का सुन्दर पुत्र था । उग्र तप से उसने दीर्घायु होने का ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया । इन्द्र के वज्र से उसका सिर उदर में धँस गया । ब्रह्मा के वरदान को ध्यान में रखकर इन्द्र ने उसे एक योजन लम्बी भुजाएँ देकर उदर में मुख बनाकर आश्वासन दिया कि राम और लक्ष्मण द्वारा तुम्हारी भुजाएँ काटी जाने पर तुम स्वर्ग पाओगे । राम-लक्ष्मण द्वारा जलाये जाने पर चिता से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ । उसने राम को सुग्रीव के पास जाने का परामर्श दिया । रामोपाख्यान में इसी का संक्षिप्त वर्णन है । पर उसके अनुसार वह दिव्य रूप धारण करके कहता है कि मैं विश्वावसु गन्धर्व हूँ । ब्रह्मशाप से राक्षस बना था । रावण ने सीताहरण किया है । अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण के अनुसार भी वह रूप-यौवनदर्पित गन्धर्व था । अष्टावक्र का उपहास करने पर वह राक्षस हुआ । इन्द्र के वज्र से उसकी उक्त अवस्था बनी । उसने राम को शबरी के पास जाने का परामर्श दिया ( अ० रा० ३।१०।१-३ ) । मानस के अनुसार वह दुर्वासा के शाप में कबन्ध-गति को प्राप्त हुआ ( रा० मा० ३।३३ ) । इन आर्ष कथाओं का कल्पभेद से ही समाधान करना युक्त है । जैसे जय और विजय तथा शिवजी के गण तथा प्रतापभानु आदि विभिन्न कल्पों में रावण हुए थे वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये । सेरीराम में दो पक्षियों की कथा है । एक राम का उपहास करता है, दूसरा सहायक बनता है । पहले की चार पत्नियां हैं । वह कहता है कि राम अपनी एक पत्नी की भी रक्षा नहीं कर पाये । इसपर राम उसे अन्धा बना देते हैं, जिससे उसकी पत्नियां चली जाती हैं । अन्य पक्षी रावण द्वारा सीता हरण का समाचार देता है । वरदान में वह लम्बी ग्रीवा मांगता है जिससे सुगमता से भोजन प्राप्त कर सके । उसे एक बालक फँसा कर बाजार में बेचने जाता है । राम उसे अपनी अंगूठी देकर खरीद लेते हैं । राम लम्बी ग्रीवा के बदले उसे चार मादाएँ प्रदान करते हैं जो उसके लिए भोजन ले आती रहेंगी । बुल्के के अनुसार भारतीय आदिवासी वृत्तान्तों में यह कथा मिलती है । बलरामदास की रामायण के अनुसार राम ने पम्पासरोवर में चक्रवाक-चक्रवाकी को क्रीड़ा करते देखकर पास जाकर सीता का समाचार पूछा । उसने निन्दा करते हुए कहा कि तुम यह भी नहीं जानते कि इस समय बाधा
अध्याय अरण्यकाण्ड ४८५ डालना अनुचित है। राम ने शाप दिया कि तुम दोनों का मिलन कभी न होगा। आराधना करने पर राम ने शापानुग्रह किया कि दिन में ही तुम्हारा मिलन होगा। रात में तुम विरह सन्तप्त रहोगे। किसी व्याध ने दोनों को फँसा कर एक टोकरी में बन्द कर दिया। वे कहने लगे कि हमारे साथ रहने से राम का कथन असत्य हो जायगा। किन्तु रात के पूर्व ही टोकरी अपने आप खुल गयी, दोनों अलग हो गये (अरण्यकाण्ड में)। किष्किन्धाकाण्ड में माल्यवान् पर्वत पर विरही राम को देखकर बगुले ने कहा तुम कैसे महात्मा हो जो रोते हो ? राम ने सीता का समाचार पूछा तो उसने आश्वासन दिया। लङ्का का रावण सीता को ले गया है। उनको मैंने रोते देखा है। उनका अश्रुजल मुझपर पड़ा और मैं सफेद हो गया। दुर्गा मुझपर प्रसन्न होंगी और फिर सीता मिल जायगी। राम ने उसे वर दिया तो उसने कहा कि वर्षा में भोजन मिलने की कठिनाई पड़ती है। मुझे यहाँ बैठे-बैठे आहार मिलना चाहिये । राम ने कहा कि तुम्हारी मादा बरसात में भोजन ला देगी। बगुले ने कहा कि वह मुझसे छोटी है। उसका जूठन खाकर में उपहास का पात्र बन जाऊँगा । राम ने कहा पति-पत्नी एक ही हैं। बड़ा छोटा कोई नहीं। अन्त में राम ने कहा कि कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक कोई आमिष का सेवन नहीं करेगा। तुम्हारे आदर में इस व्रत का नाम बकपञ्चक रखा जायगा । बाद में कुक्कुट ने भी सहानुभूति व्यक्त करते हुए राम से कहा तुम क्यों रोते हो ? यहाँ अकेले क्यों रहते हो ? राम ने सीताहरण की सब कथा सुना दी और उसे वर दिया कि तुम्हारे सिर पर सप्तशाखा- वाला लाल मुकुट होगा । जो तुमको मारेगा वह मेरा शत्रु होगा। सम्भवतः इसी कारण उड़ीसा में कुक्कुट को राम पक्षी कहा जाता है । असमिया गीतिरामायण में पीपल वृक्ष से सीता का समाचार पूछे जाने का वृत्तान्त मिलता है। सन्ताल, बिहोर और मुण्डा जातियों में सीता की खोज के वर्णन के प्रसंग में बगुले, गिलहरी और बेरवृक्ष की कथाएँ है । किसी वृक्ष की डाल पर गिलहरी रो रही थी। रामने उससे रोने का समाचार पूछा तो उसने कहा कि उन्हीं के लिए तो मैं रो रही हूँ। रावण ने सीता-हरण किया है। राम ने पीठ थपथपाकर वर दिया कि कितनी भी ऊँचाई से गिरने पर तुम्हें चोट न लगेगी । सन्ताली कथा में बेर में चिथड़ा लटका हुआ देखकर राम ने पूछा, बेर ने बताया कि इसी रास्ते से रावण सीता को ले गया। मैंने छुड़ाने का प्रयत्न किया भी, परन्तु मुझे उनकी साड़ी के चिथड़े के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला । राम ने आशीर्वाद दिया तुमको कितना भी काटने पर तुम्हारा कोई भी नाश नहीं कर सकता । इन सब कथाओं का इतना ही सार है कि राम और उनकी कथा बहुत व्यापक है। भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न-भिन्न जातियों में, यहाँ तक कि पशु-पक्षियों में भी उनकी चर्चा रही है। शिवपुराण ( सतीखण्ड अध्याय २४-२६) में सती द्वारा सीता का रूप धारण कर राम की परीक्षा का वृत्तान्त है। रामचरितमानस, भावार्थरामायण ( ३।२० ) तथा आनन्दरामायण ( १।७।१४ ) में इसका विस्तार है । वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध आर्षग्रन्थ पर आधारित यह कथा प्रामाणिक ही है। विरही राम से नारद के मिलने और भक्ति वरदान पाने की कथा रामचरितमानस तथा रामगीतगोविन्द (४।७ ) इस परम्परा की होने से प्रामाणिक ही है। तोरवेरामायण ( ३।२ ) के अनुसार भरत को दुखी होते देखकर जाबालि राम के पास जाते हैं । राम भी भरत का समाचार न मिलने पर चिन्तित थे । जाबालि ने सान्त्वना दी और हरिश्चन्द्र की कथा सुनायी । ४७७ वें अनु० में शबरी की कथा को बुल्के प्रक्षेप मानते हैं। उनके अनुसार आधिकारिक कथावस्तु से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। पर वे यह सिद्धान्त नहीं जानते कि “वस्तुसत्त्वं प्रयोजनं नापेक्षते”—अर्थात् वस्तु-सत्ता प्रयोजन की अपेक्षा नहीं रखती है। कई वस्तुओं का हमसे कुछ प्रयोजन नहीं हैं, पर वे हैं। इसी तरह भले ही कथा का सम्बन्ध न हो तो भी वह अरण्य में राम से मिली । उसका राम से वार्तालाप हुआ । तब महर्षि उसका वर्णन क्यों न करते ? परन्तु प्रकृत प्रसङ्ग में तो जब राम वृक्षों और लताओं से भी सीता का समाचार पूछ रहें हैं तब धर्मचारिणी
शबरी या श्रमणी से क्यों न मिलते और इसकी कथा वाल्मीकिरामायण में क्यों न आती ? इसके अतिरिक्त कबन्ध ने दिव्यरूप धारण कर राम को सीता के अन्वेषण का मार्ग बताते हुए मतङ्ग के आश्रम में जाने का संकेत किया था । उसने मतङ्गाश्रम के विविध चमत्कारों का वर्णन करके कहा कि महर्षि मतङ्ग और उनके शिष्यगण तो परम धाम चले गये, पर परिचारिणी श्रमणी शबरी अब भी वहीं है । वह चिरजीविनी है । धर्मनिष्ठ है । सर्वलोकनमस्कृत देवोपम तुमको देखकर स्वर्गलोक जायगी— “तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी । श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी ॥ त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वलोकनमस्कृतम् । दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति ।।” (वा० रा० ३।७३।२६,२७) ऐसी स्थिति में उक्त सर्ग और उसकी कथाओं को प्रक्षिप्त कहना साहसमात्र है । जब राम शबरी के आश्रम पहुँचे तो उसने राम का आतिथ्य किया । राम उसकी तपश्चर्या के संबन्ध में प्रश्न करते हैं । उसने बताया कि जब आप चित्रकूट में थे तभी यहाँ के ऋषि, जिनकी सेवा में मैं थी, स्वर्ग चले गये । जाते समय उन्होंने कहा था—लक्ष्मण के साथ राम यहाँ आयेंगे; तुम उनका आतिथ्य करके दिव्य लोकों को प्राप्त करोगी । उसने यह भी कहा था कि आज मेरा जप, तप देवश्रेष्ठ आपकी पूजा से सफल हो गया । स्वर्ग भी निश्चित हो गया— “अद्य मे सफलं तपं स्वर्गाश्चैव भविष्यति । त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ ।।” ( वा० रा० ३।७४।१२ ) यहाँ शबरी ने राम को देववर—देवश्रेष्ठ विष्णु—कहा है । इसी लिए बुल्के ने इस सर्ग और कथा को ही प्रक्षेप कहने का यत्न किया है । राम, मैं आपके सौम्य चक्षुओं से पूत होकर आपकी कृपा से अक्षय लोकों को जाऊँगी— ‘तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद । गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिन्दम ।।” ( वा० रा० ३।७४।१३ ) इससे भी राम की ईश्वरता स्पष्ट होती है । इतना ही नहीं किन्तु अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि की कथाओं का मूल भी स्पष्ट है । वह कहती है कि धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जिनकी मैं परिचर्या करती थी, मुझसे कहा था कि तुम्हारे आश्रम में राम और लक्ष्मण आयेंगे । तुम उनका सत्कार करके दिव्य लोकों को प्राप्त करोगी । सो मैंने पम्पातीर समुद्भूत विविध वन्य पदार्थ आपके लिये सञ्चित कर रखे हैं ( वा० रा० ३।७४ १६-१८) । इससे यह सूचित होता है कि अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार राम के आतिथ्य के लिए पुण्य फल, मूल आदि का संग्रह करती कई दिनों से वह प्रतीक्षा कर रही थी और उत्तम उत्तम वृक्षों और लताओं के फलों, मूलों की परीक्षा करके उनका संग्रहण करती थी । इसी का उपबृंहण पद्मपुराण में हैं। राम ने कबन्ध से सुने हुए उस आश्रम के चमत्कारों को देखना चाहा । उसने सब दिखाया और बताया कि यहाँ मेरे गुरु महर्षि ने मन्त्रपूर्वक अपने नीड ( शरीरपञ्जर ) को हुत किया था । यहीं वेदी पर वे अपने कम्पयुक्त हाथों से पुष्पोपहार अर्पण करते थे । उनके तप के प्रभाव से अतुलप्रभा वेदी आज भी अपनी दिव्यश्री से दिशाओं को प्रकाशित कर रही है । उपवासश्रम से स्नान ‘अभिषेक’ के लिए जाने में असमर्थ होने से उनके लिए चिन्तन मात्र से सप्त सागर यहीं आकर उपस्थित हो गये थे । उनके द्वारा स्पृष्ट पुष्प
अध्याय अरण्यकाण्ड ४८७ अब तक भी परिम्लान नहीं हुए । फिर उसने कहा कि अब मैं आपकी अनुज्ञा से शरीर त्याग कर उन महर्षियों के पास जाना चाहती हूँ । राम ने कहा भद्रे, मैं तुम्हारे द्वारा अर्चित हुआ हूँ । यथासुख जाओ । चीर-कृष्णाजिनधारिणी शबरी राम से अनुज्ञात होकर अग्नि में अपने आप को आहुत कर ज्वलत्पावकतुल्य दिव्याभरणधारिणी, दिव्यमाल्यानु- लेपना तथा दिव्याम्बरधारिणी होकर उस दिव्यधाम में चली गयी जहाँ महर्षि विहरण करते हैं ( वा० रा० ३।७४। २८-३५ ) बुल्के कहते हैं—शरभङ्ग के प्रसंग की भाँति यहाँ भी राम को महान् अतिथि के रूप में देखा गया है, परन्तु यह भी असङ्गत ही है । पूर्वोक्त प्रसङ्गों में राम को सर्वलोकनस्कृत देववर कहा गया है और उनके ही प्रसाद से शबरी दिव्यधाम जाती है । शबरी के गुरुओं ने भी यही कहा था कि राम का आदर करके तुम अक्षय लोकों को प्राप्त करोगी । ऐसे युक्तियुक्त कारणों के रहने पर भी यह कहना कि शबरी का आधिकारिक कथा से कोई सम्बन्ध नहीं है, मात्र साहस ही है । पद्मपुराण में कहा गया— प्रत्युद्गम्य प्रणम्याथ निवेश्य कुशविष्टरे । पादप्रक्षालनं कृत्वा तत्तोयं पापनाशनम् ॥ शिरसा धार्य पीत्वा च वन्यैः पुष्पैस्तथाऽर्चयत् । फलानि च सुपक्वानि मूलानि मधुराणि च ॥ स्वयमास्वाद्य माधुर्यं परीक्ष्य परिभक्ष्य च । पश्चान्निवेदयामास राघवाभ्यां दृढव्रता ॥ फलान्यास्वाद्य काकुत्स्थस्तस्यै मुक्तिं परां ददौ । इन श्लोकों में परीक्ष्य तथा परिभक्ष्य शब्दों के आने से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि शबरी ने जूठे फल भगवान को खिलाये । क्योकि धर्मचारिणी शबरी ऐसा कदापि कर नहीं सकती । स्पष्ट अर्थ यही है कि वृक्षों के फलों को चखकर मीठा पहिचानकर उन्हीं वृक्षों के फल तोड़कर लाती थी न कि जूठे कर रखती थी । शबरी ने राम का प्रत्युत्थान तथा प्रणाम करके उन्हें कुशविष्टर पर बैठा कर पादप्रक्षालन करके पवित्र पापनाशक जल सिर पर धारण किया और उसका पान किया । वन्य पुष्पों से पूजन कर स्वयं आस्वादन करके, परीक्षण करके सुपक्व मधुर फल निवेदन किये । राघव ने मधुरफल ग्रहण कर उसे परम मुक्ति प्रदान की । अध्यात्म- रामायण के अनुसार भी विराध के परामर्श देने पर कि शबरी सीता के सम्बन्ध में सब बातें बतायेगी । राम उसके पास जाते हैं । शबरी भक्तिपूर्वक राम और लक्ष्मण का आतिथ्य करती है। इकट्ठे किये हुए फल समर्पित करती है । वह अपने गुरु की आज्ञा से राम की प्रतीक्षा करती रही है । मैं मूढ़ स्त्री दर्शन के योग्य कैसे हो सकती हूँ । राम कहते हैं—पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व जाति, नाम आदि का भक्ति में कोई महत्त्व नहीं है, भक्ति का ही महत्त्व है । राम शबरी से नवधा भक्ति का वर्णन करते हैं । राम सीता के विषय में पूछते हैं । वह रामको सर्वज्ञता का स्मरण कराकर कहती है । आप लोकाचार के अनुसार ही प्रश्न कर रहे हैं । वह बताती है कि सीता लङ्का में हैं । सुग्रीव के पास जाने का परामर्श देती है । उसमें भक्ति पर बल दिया गया है । आनन्दरामायण, पद्मपुराण, रामचरितमानस आदि में इसी प्रकार भक्ति का महत्त्व वर्णित है । पद्मपुराण परवर्त्ती नहीं है । वाल्मीकिरामायण के समान ही पुराणों का भी प्रामाण्य है । तत्त्वसंग्रहरामायण आदि में कहा गया है कि गोदावरी ने सीता के सम्बन्ध में प्रश्न करने पर उत्तर नहीं दिया तो राम ने उसे शाप दिया कि तुममें नहानेवाला चाण्डाल हो जायगा । ब्रह्मादि देवताओं के प्रार्थना करने पर अनुग्रह करके राम ने अपने चाप से गोदावरी की धारा को उस कूप से मिला दिया जिसमें शबरी नहाती थी ।
४८८ रामायणमीमांसा पञ्चदश शबरी के माहात्म्य-वर्णन में ही उक्त कथा का तात्पर्य है। कई लोगों ने लिखा है कि वे जूठे ही फल थे, जिन्हें शबरी ने राम को दिया था। वस्तुतः उसका अभिप्राय यही है कि वह खट्टे मीठे का परीक्षण करके उसी वृक्ष के या उसी ढंग के फलों का संग्रह करती है। बलरामदास के वृत्तान्त के अनुसार वह अपने पति के साथ राम से मिलती है। उसके अनुसार राम उन फलों को नहीं खाते जिनमें दांतों के निशान नहीं हैं। परन्तु इसका भी तात्पर्य शबरी की भक्ति की प्रशंसा में ही है। क्योंकि जब— “नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् नाद्याच्चैव तथान्तरा” (मनु० २।५६)—मनु के अनुसार किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भी उच्छिष्ट देना निषिद्ध है तो फिर ब्राह्मण, देवता, राजा या ईश्वर के लिए तो उच्छिष्ट अन्न या फल का प्रदान करना परम निषिद्ध ही है। अतः प्रमाणविरुद्ध आख्यायिका गुणवाद होकर भक्ति की प्रशंसा- मात्र में ही पर्यवसित होती है। भक्तमाल की प्रियादासकृत टीका में कहा गया है। ऋषियों की सेवा करने की अभिलाषा से प्रेरित होकर शबरी रात के पिछले प्रहर में उनके आश्रमों में प्रवेश करती थी। ऋषियों के स्नान करने जाने का मार्ग झाड़-बुहार कर साफ करती थी। उनके लिए लकड़ियां भी लाया करती थी। मतङ्ग के मन में जानने की इच्छा हुई कि यह सब कौन करता है। शिष्यों ने रात को जागकर उसे उपस्थित किया। उन्होंने शबरी को रामभक्ति की दीक्षा देकर उसे आश्रम में रहने की अनुमति दे दी। परलोक जाने से पूर्व मतङ्ग ने शबरी को आश्वासन दिया था कि उसे राम के दर्शन होंगे। किमी दिन अनजान में उससे एक ऋषि का स्पर्श हो गया। ऋषि उसपर क्रुद्ध हुए। ऋषि स्नान करने पहुँचे तो सरोवर कृमियों से भरा मिला। बहुत दिनों के बाद राम ने आकर उनका आतिथ्य ग्रहण किया। ऋषियों ने आकर सरोवर को स्वच्छ करने की प्रार्थना की तब राम ने सरोवर के अपवित्र होने का रहस्य प्रकट किया और बताया कि शबरी के स्पर्श से पवित्र हो जायेगा। रघुराजसिंह की रसिका- वली में भी उल्लेख है कि मुनियों के निवेदन पर— सबरी सकुचि सलिल पग डारी। तुरतहि भो निर्मल सरवारी ॥ ये सभी कथाएँ भक्ति के महिमावर्णन में ही तात्पर्य रखती हैं। शास्त्रविरुद्ध कृत्य के समर्थन में उनका तात्पर्य नहीं है, अतएव महान् भक्तों ने स्पष्ट कहा है कि श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पाञ्चरात्र विधान के विरुद्ध हरि- भक्ति उत्पात का ही मूल है— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपाञ्चरात्रविधिं विना । ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम् ॥” कहा जाता है कि मध्यभारत के कोल, भील अपने को शबरी के वंशज मानते हैं। उनके अनुसार किसी दिन वनवास के समय सबरी से सीता, राम और लक्ष्मण की भेंट हुई। तीनों भूखे थे। शबरी ने जंगली बेर खिलाकर तृप्त किया। इस कथा में भी उच्छिष्ट फल देने की बात लिखी गयी है। रामायण ककविन के अनुसार उसने विष्णु अवतार वराह की लाश खायी थी जिससे उसका मुख काला हो गया था। राम ने उसका मुख पोंछकर शुद्ध कर दिया था। रामकियेन के अनुसार वह एक अप्सरा थी। ईश्वर की सेवा में असावधानी के कारण उसे शाप हुआ था कि वह एक जलते हुए जंगल के पास तब तक निवास करे जब तक राम स्वयं आकर उसे बुझा न दें। शबरी के निवेदन पर राम ने आग बुझा दी। जिससे वह फिर अप्सरा के रूप में स्वर्ग चली गयी। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार शबरी एक धर्मचारिणी ब्राह्मणी श्रमणी थी। विभिन्न देशों के सम्पर्क से उस कथा में विकृतियाँ आ गयी हैं। रामरसिकावली के अनुसार शबरी एक मुनिपत्नी थी। किसी समय मुनि वन से साधना करके लौटे तो उसने उनका चरण धोया।
ऋषि को उसकी अशुचिता का ज्ञान होने पर उन्होंने पत्नी को वनवास दे दिया। उसका विलाप सुनकर अनुग्रह किया और कहा कि तुम वन में मुनियों की सेवा करोगी और तुम्हें राम का दर्शन होगा। कहते हैं कि उच्च तथा सम्पन्न परिवार में जन्म होने से उसे सत्सङ्ग और साधना का अवकाश नहीं मिलता था, अतः उसने नीच जाति में जन्म माँगा। इसी लिए भीलों में उसका जन्म हुआ। विवाहयोग्य होने पर घर में सैकड़ों पशुओं को इकट्ठे देखकर कारण पूछा तो विदित हुआ कि विवाह में उन सबका बलिदान होगा। अतः घबड़ा कर जानवरों को मुक्त कर वन में झोपड़ी बनाकर ऋषियों की सेवा करने लगी। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण से तो उसका शबरी नाम कहा गया है। वह शबर जाति की नहीं थी और श्रमणी अर्थात् तापसी थी—"श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी।" (वा० रा० ३।७३।२६) श्रमणी का तिलककार ने तापसी अर्थ ही किया है। वहीं उसको 'धर्मसंस्थिता' भी कहा गया है—"श्रमणीं धर्मसंस्थिताम्" (वा० रा० ३।७४।७)। उसने राम को यथाविधि अर्घ्य, पाद्य, आचमन आदि अर्पित किया—'पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद्यथाविधि।" (वा० रा० ३।७४।७)। राम ने भी उसे तपोधने कहकर संबोधित किया था—(वा० रा० ३।७४।८)। उसके तप एवं नियमों के सम्बन्ध में कुशल-प्रश्न किया था। वहाँ उसको "सिद्धा सिद्धसम्मता" भी कहा गया है। अतः उसका शबर जाति का होना और जूठे फल देना आदि प्रामाणिक न होकर प्रेमस्तुत्यर्थ ही हैं। मैंने विविध वन्य फल आपके लिए संचित किये हैं—'मया तु संचितं वन्यम्" (वा० रा० ३।७४।१७) यही वस्तुस्थिति है कि न तो वह भीलनी थी और न उसने जूठे फल खिलाये थे । सीताहरण ४८२ वें अनु० में बुल्के ने बतलाया है कि बौद्ध साहित्य में सीताहरण की चर्चा नहीं है। बोधिसत्त्व राम के द्वारा रावण का वध किया जाना बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल था। महाभारत के शान्तिपर्व में भी सीताहरण का वर्णन नहीं है। अन्यथा सभी रामकथाओं में सीता-हरण तथा रावण-युद्ध वर्णित है। सीता-हरण के कारणों के विषय में ४८३वें अनु० में कहा गया है कि सीता-हरण का मूल कारण शूर्पणखा का विरूपण ही है। विरूपित शूर्पणखा खर- सेना की पराजय देखकर लङ्का में जाती है और रावण को विशाल सेना सहित खर-दूषण का वध सुनाती है। वह सीता का सौन्दर्य वर्णन कर यह भी कहती है कि मैं सीता को तुम्हारे पास लाना चाहती थी, इसी लिए मेरा विरूपण किया गया है। उसने सीताहरण के लिए रावण को प्रोत्साहित किया। यहाँ बुल्के का यह कथन आंशिक ही सत्य है, क्योंकि रावण एक नीतिज्ञ राजा था, वह असावधान नहीं था। उसके गुप्तचरों ने विशेषतः अकम्पन ने उसे सब समाचार दे रखा था। सीता-हरण के लिए वह पहले भी गया था, परन्तु मारीच ने उसे समझाबुझाकर लौटा दिया था। अतएव दाक्षिणात्य पाठ का ३१ वाँ सर्ग प्रक्षिप्त है यह कहना सर्वथा असंगत है। वस्तुतः तो विरूपण मुख्य कारण नहीं अपितु सीता-सौन्दर्य का प्रलोभन और खरदूषण-विध्वंस ही सीता-हरण के मुख्य कारण हैं। अन्त में बुल्के के अनुसार भी जब शूर्पणखा विरूपण की कथा प्रक्षिप्त ही है तब फिर वह (विरूपण) वास्तविक सीता-हरण का कारण कैसे हो सकता है ? यहाँ बुल्के कहते हैं कि "अधिक संभव है कि (उनके तथाकथित) आदिरामायण में शूर्पणखा के विरूपण की कथा नहीं होगी, क्योंकि युद्धकाण्ड के दो स्थल इसके आधार हो सकते हैं रावण की सभा (सर्ग ९) में विभीषण ने सीताहरण के कारण के विषय में खर का ही उल्लेख किया है। विभीषण ने कहा कि राम ने रावण का क्या बिगाड़ा था कि उसने उनकी भार्या का अपहरण किया। खर ने सीमा उल्लङ्घन किया था (अतिवृत्तः), इसी लिए वह राम के द्वारा मारा गया— "किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा। आजहार जनस्थानाद्यस्य भार्यां यशस्विनः ॥
४९० रामायणमीमांसा पञ्चदश खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे । अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ॥” ( वा० रा० ६।१२६।१३,१४ ) युद्धकाण्ड के अन्तिम ( १२६ वें ) सर्ग में हनुमान् द्वारा जो संक्षिप्त रामचरित सुनाया जाता है उसमें दण्डकारण्य के तपस्वियों की रक्षा के निमित्त राम द्वारा खर, दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसों के वध का वर्णन है । केवल बाद में शूर्पणखा के विरूपण का वर्णन है । अतः यह असंभव नहीं है कि राक्षसों के वध के कारण ही रावण का विरोध उत्पन्न हुआ था । बाद में शूर्पणखा के विरूपण की कथा प्रचलित होने लगी । परवर्ती राम-कथाओं में सीता-हरण का यह कारण व्यापक रूप में प्रामाणिक माना गया है, परन्तु यह कहना उचित नहीं, क्योंकि भले ही सीता-हरण का वह मुख्य कारण नहीं जैसा कि मैंने कहा है । तथापि शूर्पणखा की कथा का अपलाप करना उचित नहीं है । विभीषण द्वारा उसकी चर्चा न होने या हनुमान् द्वारा बाद में चर्चा होना मात्र उसके प्रक्षेप होने का हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि अनुमान के आधार पर प्रत्यक्ष का अपलाप नहीं हो सकता है । जहाँ भी प्रत्यक्ष का विरोध होता है वहाँ बाध होने के कारण अनुमान- साधक हेतु हेत्वाभास ही ठहरते हैं । विभीषण ने तो शूर्पणखा की कथा कहने लायक भी नहीं समझी, क्योंकि राज- परिवार की बहन-बेटी स्वैरिणी होकर वन में राम के पास क्यों गयी ? इसी कारण रावण ने भी उसकी चर्चा नहीं की और सर्ग ११ में यही कहा है कि वह मैथिली-कामना से मोहित होने के कारण ही सुहृदों से समझाने पर भी सीता को देने के लिए प्रस्तुत नहीं था “मैथिलीकाममोहितः” ( वा० रा० ६।११।१ ) । विचित्र बात है बुल्के अकम्पन की कथा को प्रक्षेप मानते हैं । यदि शूर्पणखा की कथा प्रक्षेप है तब रावण को जनस्थान की विशाल सेना और खर, दूषण आदि के विध्वंस का पता कैसे लगा ? और खर, दूषण आदि भी राम से विरोध करने क्यों गये ? वाल्मीकि- रामायण के अनुसार तो शूर्पणखा के विरूपण से ही खर आदि की राम-विरोध में प्रवृत्ति हुई ( वा० रा० ३ । सर्ग १८, १९ ) में स्पष्ट वर्णन है कि विरूपित होकर शूर्पणखा उग्रतेजा अपने भाई खर के पास गयी और अपने विरूपण का हेतुवर्णन किया । उसको वैसी देखकर ही वह उत्तेजित हुआ और उसने १४ राक्षसों को राम को मारने के लिए भेजा । हनुमान् की दृष्टि में तपस्वियों के रक्षणार्थ ही राक्षस-वध में राम की प्रवृत्ति हुई है । प्रारम्भ में भी तपस्वियों में धनुष, बाण आदि धारण के सम्बन्ध में सीता ने जब अनौचित्य बतलाया था तब भी राम ने ऋषियों की रक्षा ही धनुष-बाण धारण का उद्देश्य कहा था :— “ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे । संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥” ( वा० रा० ३।१०।१७ ) “क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ।” ( वा० रा० ३।१०।३ ) क्षत्रिय लोग इसी लिए धनुष धारण करते हैं कि आर्तशब्द संसार में सुनायी न पड़े । “तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम् । भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः ॥” ( वा० रा० ३।१९।१ ) इन सभी को क्षेपक कह देना अत्यन्त अनभिज्ञता ही है । यह तो राम-कथा का अन्वेषण नहीं विरूपण ही है । किसी अंश को आपात हेतुओं से प्रक्षेप कह देना सरल है, परन्तु समन्वय करना तात्पर्यज्ञानसापेक्ष होता है । अतएव शूर्पणखा की कथा पउमचरियं, भावार्थरामायण, आनन्दरामायण आदि में भी है ही । शम्बूक-वध आदि भी सीता-हरण का गौण ही कारण है । मुख्य कारण सीता के प्रति उसकी कामना ही है । अतएव विविध कथाओं में सीतास्वयंवर से ही उसकी प्रवृत्ति सीता की ओर रही है । रामलिङ्गामृत के अनुसार शूर्पणखा-विरूपण के बाद नारद
रावण से सीता का सौन्दर्य-वर्णन करत हैं। तभी वह सीता-हरण में प्रवृत्त होता है। १८ वीं शती के उसी वृत्तान्त के अनुसार राम ने चित्रकूट में पहुँच कर अपने बहुत शिष्यों को पुनर्जन्म का सिद्धान्त सिखाया था। वे सिंहल में भी अपने सिद्धान्त का प्रचार चाहते थे। रावण ने इसका विरोध किया और राम को पराजित करके सीता को छीन लिया। विभीषण की सहायता से राम ने ब्रह्मा द्वारा भेजी गयी सेना से रावण को जीत लिया (पाश्चात्यवृ० न० १२)। उक्त कथाएँ वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध विकृति तथा विपर्यास के ही परिणाम हैं। रावण स्वयं भी पुनर्जन्म का सिद्धान्त माननेवाला था। वह वैदिक आहिताग्नि था। रावण ने सनत्कुमार से यह सुना था कि भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य होता है—क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः” (वा० रा० दा० प्र० २।२२), अतएव विष्णु द्वारा मारे जानेवाले लोगों को परम धाम मिलता है। मुनि के यह बतलाये जाने पर कि त्रेतायुग में नारायण रामरूप में प्रकट होंगे। वह पिता की आज्ञा से लक्ष्मीरूप सीता के साथ वनवास करेंगे; अतः रावण ने राम के हाथ से मरण की कामना से ही सीता का हरण किया था— “अपहृता सीता त्वत्तो मरणकाङ्क्षया ।” (वा० रा० दाक्षिणात्य पाठ उत्तरकाण्ड सर्ग ३७ के बाद जो प्रक्षिप्त सर्ग हैं उनमें सर्ग ५ श्लोक ४३)। रावण माता के समान ही सीता की लङ्का में रक्षा करता था--“लङ्कामानीय यत्नेन मातेव परिरक्षिता ।” (वही सर्ग ५ श्लोक ५४)। वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ ६।४१।२५ तथा पश्चिमो- त्तरीय पाठ ६।४२।२४ के अनुसार भी रावण राम के हाथों मर कर मुक्ति प्राप्त करना चाहता था— “निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।” इसकी पुष्टि रामतापनीय उपनिषद् (४।१७) से होती है। वह परवर्ती नहीं, किन्तु वेद का अंश होने से अनादि ही है। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में भी इसका समर्थन है। वस्तुस्थिति यह है कि वाल्मीकिरामायण के द्वारा अधिकांश राम के लौकिक मानवीय रूप का वर्णन है जब कि रामतापनीय आदि में उनके वास्तविक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है। शिवपुराण के अनुसार रावण ने पाताल में विष्णु से प्रार्थना की थी कि तुम्हारे हाथ से मेरी मृत्यु हो—“त्वद्धस्ताद् भगवन् मृत्युर्ममास्तु ।” इन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर रामचरितमानस में रावण के अभिप्राय का वर्णन है— “सुररञ्जन भञ्जन महिभारा। जौ भगवन्त लीन्ह अवतारा ॥ तौ मैं जाय बैरु हठि करिहूँ। प्रभु सर प्रान तजे भव तरिहूँ ॥ होइ भजन नहिं तामस देहा । मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा ॥” भृगुशाप, नारदशाप आदि अन्य कारण भी सीताहरण के हैं ही। बुल्के यह भी कहते हैं “धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे ।” (वा० रा० ३।४५।३२) के अनुसार लक्ष्मण का शाप भी सीता हरण का कारण है। भट्टिकाव्य के अनुसार शाप का रूप इस प्रकार है “शत्रुहस्तं गमिष्यसि” (५।६०) देवीभागवत तथा अध्यात्म- रामायण में भी इस शाप का निर्देश है ।” परन्तु उनका कहना सङ्गत नहीं है, क्योंकि राम और सीता के प्रति लक्ष्मण अनिष्ट की आशंका नहीं कर सकते थे। किसी के प्रति अनिष्ट की आकाङ्क्षा करना शाप होता है। किन्तु प्रकृत में तो लक्ष्मण ने सीता की विपरीत मति के अनुसार शत्रुहस्त में पड़ने की सम्भावनामात्र व्यक्त की है न कि शाप दिया है। यह अवश्य है कि परोक्षरूप से महाभागवत लक्ष्मण का अपमान अवश्य सीता के उस दुःख का कारण बना था, पर लक्ष्मण के शाप की कल्पना निरर्थक ही है। उसी शङ्का को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं समग्र वन
४९२ रामायणमीमांसा पञ्चदश देवता तुम्हारी रक्षा करें। घोर निमित्त अपशकुन दिखायी दे रहे हैं। क्या मैं राम के साथ युक्त तुम्हें फिर देख सकूँगा ? तुम्हारा कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ । "स्वस्ति तेऽस्तु" ( वा० रा० ३।४५।३३ ) "रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः । अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ।।" ( वा० रा० ३।४५।३४ ) इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण के मन में सीता के प्रति हित की आशंका है। यही हनुमान् से सन्देश कहते हुए सीता ने भी कहा था। जो विविध मालाओं और रत्नों तथा प्रिय श्रेष्ठ अङ्गना तथा विशाल पृथ्वी के दुर्लभ ऐश्वर्य का त्याग कर अपने माता-पिता को सम्मानित करके राम के साथ वनवासी हुए हैं, सुमित्रा जिनके द्वारा सुप्रजा हुई हैं वह धर्मात्मा सौमित्रि राम में पितृवत् तथा मुझमें मातृवत् व्यवहार करते हैं वे लक्ष्मण मेरा हरण नहीं जानते थे। जो लक्ष्मीवान् और वृद्धोपसेवी हैं वे बहुत नहीं बोलते, राम के परमप्रिय मेरे श्वसुर महाराज दशरथ के तुल्य मेरे रक्षक और हितकारी हैं। वे मुझसे भी अधिक राम के प्रिय हैं। वे जो भार वहन के योग्य नहीं है उस भार को भी वहन करते हैं। जिसको देखकर राम पिता के रक्षणकार्य का भी स्मरण नहीं करते उनसे मेरी ओर से कुशल प्रश्न करना । वे मृदु, नित्य पवित्र, दक्ष तथा राम के शिष्य लक्ष्मण जिस तरह मेरी दुःखानिवृत्ति के लिए प्रयत्नशील हों वैसा करना ( वा० रा० ३।३८।५४-६२ ) । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार शूर्पणखा ने भी राम से ठुकरायी जाकर यह शाप दिया था कि तुम्हारी पत्नी का हरण होगा। कृत्तिवासरामायण के अनुसार चन्द्रमा के नृत्य से विवाह का मुहूर्त टल गया था, इसलिए सीता- हरण हुआ है। कथञ्चित् कारणों में ऐसे ही और भी अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं। सीताहरण के मूलरूप पर विचार करते हुए बुल्के चिन्तामणि विनायक के अनुमान का उल्लेख करते हैं ओर कहते हैं—तथाकथित आदिरामायण में कनकमुग का कोई उल्लेख नहीं था, किन्तु वह अद्भुत रस की लोक- प्रियता के कारण बाद में रखा गया है। उनका तर्क है कि "यदि कनकमुग की घटना का वर्णन सचमुच रामायण में था तो सीता और रावण का संवाद अस्वाभाविक प्रतीत होता है। यदि सीता राम के सम्बन्ध में इतनी चिन्तित थीं कि उन्होंने लक्ष्मण को अत्यन्त कटु शब्द सुनाकर उन्हें राम की सहायता के लिए भेजा था तो उन्होंने राम के विषय में अपनी आशङ्का का उल्लेख रावण से क्यों नहीं किया ? यदि कहा जाय कि सीता रावण पर विश्वास नहीं करती थीं तो उन्होंने अपनी आत्मकथा विस्तृतरूप से क्यों सुनायी ? वास्तव में सीता-रावण-संवाद के अन्तर्गत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि धीसीता राम की प्रतीक्षा कर रही थीं जो लक्ष्मण के साथ मृगया खेलने गये थे— "ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा ।" ( वा० रा० ३।४३।३२ ) । इसके अतिरिक्त सीता रावण से कहती हैं मेरे पति मृग, वराह आदि मारकर बहुत-सा मांस लिये लौटनेवाले हैं— "आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम् । रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वादायामिषं बहु ।।" ( वा० रा० ३।४७।२३ ) बुल्के और भी कहते हैं—अनामकं जातकं ( तीसरी श० ई० ) में कनकमुग का उल्लेख नहीं है। उसके अनुसार जब राजा फल लेने चले गये थे तब एक दुष्ट नाग ने रानी का अपहरण किया था । पउमचरियं ( चौथी श० ई० ) के अनुसार खरदूषण अपनी पत्नी चन्द्रनखा से पुत्र के वध का समाचार सुनकर वन में उसे देखने गया था। लौटकर उसने रावण को इसका समाचार दे दिया था। रावण के आने में विलम्ब होने के कारण १४ सहस्र