भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 557

४८० रामायणमीमांसा पञ्चदश मैं सीता के केयूर और कुण्डलों को नहीं पहचानता क्योंकि मेरी दृष्टि ऊपर के अङ्गों पर गयी ही नहीं— मैं नूपुरों को पहचानता हूँ, क्योंकि नित्य ही उनके चरणों का वन्दन करता हूँ, अतः उन्हें पहचानता हूँ। खोतानी रामायण का यह कथन कि राम और लक्ष्मण दोनों का विवाह सीता से हुआ है, यह सर्वथा अशुद्ध है और वहाँ के बहुपति-प्रथा के संस्कारों का प्रभाव है। वाल्मीकिरामायण के उपर्युक्त श्लोक को प्रक्षिप्त कहना असङ्गत है, क्योंकि टीकाकारों ने इसपर व्याख्या की है। अन्य पाठों में उनका न मिलना प्रक्षेप होने में हेतु नहीं है। अवतारवाद सभी पाठों में मिलता है तब भी बुल्के आदि उसे प्रक्षिप्त ही मानते हैं। यह सब कथन भारतीय-संस्कृति-द्वेषमूलक ही है। अतएव भावार्थरामायण की यह कथा ठीक ही है, जिसमें कहा गया है कि राम किसी दिन लक्ष्मण की रक्षा में सीता को छोड़कर बाहर गये थे। सीता को नींद आ गयी । नींद में ही उनके कपड़े अस्त-व्यस्त हो गये, जिससे उनका शरीर अनावृत हो गया। साधना में लीन होने के कारण लक्ष्मण ने उधर ध्यान नहीं दिया। राम ने आकर लक्ष्मण से पूछा कि स्त्री का रूप देखकर किसका मन स्थिर रह सकता है । लक्ष्मण ने उत्तर दिया "रामभक्त का ही मन इससे प्रभावित नहीं होता ।" लक्ष्मण किसी मन्दिर में रहकर १२ वर्ष तक तप करते हैं, अन्त में सीता कहती है कि मैंने स्वप्न में तुम्हें कलसापुर के राजा से युद्ध करते हुए देखा है । उसमें तुम्हारी जीत हुई थी । लक्ष्मण स्वप्न की सच्चाई की परीक्षा के लिए उस ओर चल पड़े । सीता ने महल छोड़कर लोमड़ी, अञ्जीर-वृक्ष तथा जलस्रोत बनकर उनको रोका, पर लक्ष्मण नहीं रुके । वहाँ जाकर उन्होंने युद्ध किया, फलस्वरूप उनका वध हो गया। पीछे राम ने जाकर उन्हें जिला लिया । आदिवासियों में प्रचलित उक्त रामकथा का तात्पर्य लक्ष्मण की संयमशीलता का वर्णन करने में ही है। शास्त्रसम्बन्धशून्य कथाओं में विकृतियाँ अनेक प्रकार से आ जाती हैं, यह भी इसी का उदाहरण है। सर्वथाऽपि रामायण के विविध पात्रों और घटनाओं की वास्तविकता जानने के लिए वाल्मीकिरामायण का आश्रयण उचित है। शूर्पणखा ४६३ वाँ अनुच्छेद । शूर्पणखा रावण की भगिनी तथा विद्युज्जिह्व की पत्नी थी । विद्युज्जिह्व के मरने पर वह खर के पास रहती थी । खर चाहे मातृस्वसेय ( मौसेरा भाई ) ही हो तब भी भाई ही हुआ। अतः "भ्रातरौ खरदूषणौ” ( वा० रा० ३।१७।२२ ) के अनुसार खर और दूषण को भाई कहना असङ्गत नहीं है। विद्युज्जिह्व का वध रावण की दिग्विजय-यात्रा में रावण द्वारा हुआ (वा० रा० ७।२३।१७,१८) । रामकेति के अनुसार उसका नाम वर्गासींगा था । रावण उसे लङ्का की रक्षा में नियुक्त करके कहीं गया हुआ था। उसने अपनी जिह्वा को फैला कर लङ्का को ढँक लिया था। रावण ने उसे भी शत्रु का उपद्रव समझ कर अनजान में उसे काट डाला । उस समय शूर्पणखा गर्भिणी थी। वह दर्सासींगा को जन्म देती है। वह पिता का बदला लेने के लिए शक्तिप्राप्त्यर्थ तपस्या करता है । पउमचरियं के अनुसार उसका नाम चन्द्रनखा था । उसका विवाह विद्याधरवंशीय राजकुमार खरदूषण से होता है । उसका पुत्र शम्बूक लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। राफल्स हस्तलिपि के अनुसार शम्बूकवध के बाद लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करते हैं। पउमचरियं के अनुसार लक्ष्मण उसपर अनुरक्त थे । किसी बहाने से वे राम से अलग होकर उसे ढूंढते हैं। उसे न पाकर आतुर होते हैं ( ४३, ४८ ) । यह सब भी राम की पवित्र कथा में विकृति पहुँचाने का प्रयास है। सारलादास के महाभारत वनपर्व में सीता सखी पाने की इच्छा से चाहती है कि लक्ष्मण शूर्पणखा से विवाह करें। राम भी अनुरोध करते हैं, परन्तु लक्ष्मण अस्वीकार करते हैं और उसके नाक-कान काट लेते हैं। यह भी अंशतः वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार शूर्पणखा राम से उनकी पत्नी बनने का प्रस्ताव करती है। राम उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं। वे पुनः उसे राम के पास वापस भेजते हैं। राम की अस्वी-