भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 556

अध्याय अरण्यकाण्ड ४७९ परन्तु उक्त कथाओं का तात्पर्य तीर्थों के माहात्म्य-वर्णन में ही है। कहा जा चुका है कि वेदों में कर्म और उपासना की खूब महिमा वर्णित होने पर भी समुच्चय-विधान की दृष्टि से एक-एक की निन्दा की गयी है। इस प्रकार लक्ष्मण की सीता और राम में अखण्ड भक्ति होने पर भी उनके द्वारा भी स्वामि-द्रोह हो जाने पर उसकी भी निवृत्ति बालमण्डनतीर्थ स्नान से हो सकती है। दूसरी बात यह है रामचरितमानस में सुमित्रा ने बड़ी ही तत्परता से लक्ष्मण को उपदेश किया था। राग, रोष, ईर्ष्या, मद तथा मोह इनके वश में कभी भी न होना। सब प्रकार के विकारों को छोड़कर श्रीरामजी की सेवा करना। राग रोष इरखा मद मोहू। जनि सपनेहुँ इनके बस होहू ॥ सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करहु सेवकाई ॥ (वा० रा० १।७४।३) सेवाधर्म परम गहन है— “सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः ।' अति परिचय और अति सन्निधान से अवज्ञा, राग, रोष, ईर्ष्या आदि दोषों का सन्निवेश हो सकता है। इसी लिए सुमित्रा का सावधान करना उचित था। यहाँ पर और भी सावधानी बरतने का यह अर्थवाद है। अर्थात् इतने सावधान और संयमी के मन में भी क्रोध हो सकता है अतः अत्यन्त सावधान रहना उचित है। शास्त्रों में कहा गया है—माता, दुहिता और स्वसा के साथ भी कभी विवक्तासन (एकान्त) में नहीं बैठना चाहिये। बलवान् इन्द्रियसम्मूह विद्वान् को भी आकृष्ट कर लेता है— “मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥” ( मनु० २।२१५ ) इसी के अर्थवाद रूप में ब्रह्मादि बड़े-बड़े लोगों की कामवश्यता की बातें कही गयी हैं। इसी तरह पुराणों में भी लक्ष्मण के मन में क्रोध आदि का चित्रण करके अत्यन्त सावधानी बरतने का संकेत किया गया है। जिसे बुल्के ने उलटकर अपनी दूषित मनोवृत्ति से लक्ष्मण जैसे संयमी पर दोषारोप का साधन बना लिया है। पुराणों में यह भी कथा है कि पूर्वोक्त प्रकार से लक्ष्मण के मन में विकार हुआ, परन्तु कुछ दूर जाने पर वह विकार शान्त हो गया और उन्होंने बड़े दुःख के साथ राम से अपने दोषों का निवेदन कर दिया था। अन्त में राम के कुछ दूर पर स्थित किसी महर्षि से प्रश्न करने से ज्ञात हुआ कि जिस स्थल पर लक्ष्मण को मोह हुआ था, वहाँ कुछ अत्यन्त अनाचार-पूर्ण व्यक्तियों का निवास रह चुका है। उनके संस्कारों का वह प्रभाव था। ऐसे कई निकृष्ट स्थल होते हैं, जहाँ पहुँचते ही अनेक प्रकार की दुर्भावनाओं का जन्म होता है और कई स्थल ऐसे भी होते हैं जहाँ पहुँचते ही अत्यन्त उत्कृष्ट भावनाएँ जन्म लेती हैं। इसी लिए विशिष्ट देश और विशिष्ट काल का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। इससे यह भी समझा जा सकता है कि जैसे नारद, काकभुशुण्डि, गरुड़ आदि महापुरुषों में माया का प्रभाव कभी कभी पड़ा करता है। उसी तरह लक्ष्मण, यद्यपि राम के बहिश्वर प्राण ही थे— ‘नित्यं प्राणो बहिश्चरः” ( वा० रा० ३।३४।१३ )—तथापि माया का प्रभाव उनपर भी पड़ा। केवल उत्कर्ष दिखाने के लिए ही पुराणों में वैसा वर्णन है। वाल्मीकिरामायण आर्ष इतिहास है। उसके द्वारा जो लक्ष्मण का स्वरूपवर्णन है वही ऐतिहासिक तथ्य है। तदनुसार— “नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले । नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥” ( वा० रा० ४।६।२२ )

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