रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७८ रामायणमीमांसा पञ्चदश "ईदृक् क्षेत्रप्रभावोऽयं सोभ्रात्रेण विवर्जितः । पञ्चक्रोशात्मके क्षेत्रे ये वसन्त्यत्र लक्ष्मण ॥७२॥ अपि स्वल्पं न सौभ्रात्रं तेषां सञ्जायते क्वचित् ॥७३॥ तावत्स्नेहपरो मर्त्यः तावद्वदति कोमलम् । चमत्कारोद्भवं क्षेत्रं यावन्न स्पृशतेऽङ्घ्रिभिः ॥७४॥ येऽन्येपि निवसन्त्यत्र पक्षिणः पशवो मृगाः । तेऽपि सौहार्दनिर्मुक्ताः सस्पर्धा इतरेतरम् ॥७५॥ कस्यचित्केनचित्सार्धं सौहार्दं नैव विद्यते । तस्मान्नैवास्ति ते दोष ईदृक् क्षेत्रस्य संस्थितिः १ ॥"७६॥ श्रीराम ने कहा लक्ष्मण पुष्कर से जल लाओ पादप्रक्षालन कर शीघ्र ही शयन करो। रात बीत जाने पर हम सब लोग दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान करेंगे । लक्ष्मण ने कहा सीता ही जल लाये । मैं सब समय दासता नहीं करूँगा । ये तो मुझसे भी अधिक पुष्ट और मोटी हैं, ऐसी पत्नी का क्या करोगे ? क्या मरने पर यह साथ जायेगी । इसके लिए मैं भी कष्ट पाता हूँ। तुम्हारे लिए भी क्षुधा-पिपासा सहता हूँ । लक्ष्मण की इस प्रकार की बातें पहले कभी नहीं सुनीं थीं । राम और सीता आश्चर्य में पड़कर विमना हो गये । फिर राम ने कहा आओ लक्ष्मण, हम लोग दक्षिण की ओर प्रस्थान करें । लक्ष्मण ने कहा हम नहीं जायेंगे । कमलेक्षण, आप इसके साथ जाओ । मैं अब दिन रात परिश्रम नहीं कर सकता । राम ने कहा अच्छा मेरे साथ मत जाओ । सीता ही जायगी । यह सुनकर लक्ष्मण उठे । मर्यादापर्वत के पास क्षेत्र की सीमा इन्द्रमार्गा नदी पर जाकर जटाजूट बाँधकर राम ने कहा लक्ष्मण लाओ मेरा धनुष दे दो । लक्ष्मण ने सोचा मैं मनसा, वाचा, कर्मणा कभी राम का अपराध नहीं करता हूँ । लक्ष्मण ने दोनों हाथों को मुख पर रखकर साश्रुकण्ठ होकर कहा मैं आपका चरणस्पर्श करके कहता हूँ मेरी आपको छोड़कर दूसरी गति नहीं है । सीता ने कहा क्या आपने अनुज को त्याग दिया । लक्षिमवर्धन लक्ष्मण बालक हैं । इनके प्रति वैषम्य त्याग दीजिये । राम ने कहा—सीते, मैं स्वप्न में भी लक्ष्मण को त्याग नहीं सकता, फिर भी अश्रुतपूर्व बात लक्ष्मण के मुख से सुनी है यह इस क्षेत्र का प्रभाव है । यहाँ सौभ्रात्र रहता ही नहीं । सभी स्वार्थतत्पर ही रहते हैं । परस्पर किसी का किसी से प्रेम नहीं होता । यहाँ पुत्र पिता की बात नहीं सुनते और पुत्रों की बात पिता भी नहीं सुनता । शिष्य गुरु को गुरु शिष्य की बात नहीं सुनते । सभी की अर्थानुबन्धिनी ही प्रीति होती है ( पद्मपुराण सृष्टिखण्ड ) । स्कन्दपुराण में वहाँ लक्ष्मण सोचते हैं सोते हुए राम को मारकर सीता को पत्नी बनाकर अपने ही स्थान पर अथवा कहीं दूर चले जायेंगे और सज्य धनुष पर बाण रखकर राम का छिद्र अन्वेषण करते हुए पीछे जाते हैं । आगे चलकर श्रीराम ने बतलाया था कि इस पञ्चक्रोशात्मक क्षेत्र का यह प्रभाव है कि यहाँ सौभ्रात्र है ही नहीं । प्राणी तब तक ही स्नेहवान् रहता है, तभी तक कोमलभाषी होता है जब तक इस क्षेत्र का स्पर्श नहीं करता । यहाँ के पशु, पक्षी, मृग सभी सौहार्दमुक्त एवं परस्पर स्पर्धावान् ही होते हैं । यहाँ किसी का किसी के साथ सौहार्द नहीं होता है । अतः लक्ष्मण तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह इस प्रकार के क्षेत्र का ही प्रभाव है । जैसे शुभ क्षेत्र का शुभ प्रभाव होता है वैसे ही अशुभ क्षेत्र का अशुभ प्रभाव भी होता है, यह भी अर्थवाद ही है । किन्तु बुल्के ने स्थान के प्रभाव की चर्चा न कर सीता लक्ष्मण को दोषी दिखाने की कपटपूर्ण मनोवृत्ति से पाठकों को धोखा दिया है । १. स्कन्दपुराण नागरखण्ड अ० २० हाटकेश्वर-माहात्म्य के अन्तर्गत बालमण्डनतीर्थ-माहात्म्य में लक्ष्मण के प्रति मार्कण्डेय मुनि की उक्ति ।