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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 558

कृति से वह सीता पर आक्रमण करती है। तब राम की आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण उसकी नाक और कान काट देते हैं। भागवत ( ९।१०।९ ), गरुड़पुराण ( अध्याय १४३ ), पद्मपुराण ( पातालखण्ड अध्याय ३६ ) तथा देवीभागवत ( ३।२८ ) में भी यही वृत्तान्त उल्लिखित है। नृसिंहपुराण के अनुसार उसके एक पत्र की भी चर्चा है, जिसमें वह कहती है— “अतीव निपुणा चाहं रतिकर्मणि ।” मैं रतिकर्म में अति निपुण हूँ। राम भी पत्र द्वारा ही लक्ष्मण को संकेत करते हैं कि उसके नाक-कान काट दिये जायें। साहित्यिकों के यहाँ पत्र का भी रसाङ्गरूप में सन्निवेश है। अतः यह विरुद्ध नहीं है। अतएव भावार्थरामायण ( ३।८ ) में भी उसका उल्लेख ठीक ही है। सेरीराम के अनुसार वह खरदूषण के पास जाकर कहती है मैंने लक्ष्मण का प्रेमप्रस्ताव अस्वीकार कर दिया था, इसलिए उसने मेरे पुत्र का वध कर दिया है। मन्त्री के परामर्शानुसार वह सुन्दर रूप धारण कर राम को आकर्षित करने का प्रयत्न करती है। राम उसे लक्ष्मण के पास भेजते हैं। पर साधना में लीन लक्ष्मण उसकी ओर दृष्टिपात भी नहीं करते। पुनः राम के पास जाकर वह सीता का अपमान करती है तब राम पत्र द्वारा लक्ष्मण को उसके नाक-कान काटने का आदेश देते हैं। कम्बरामायण ( ३।५ ), आनन्दरामायण ( १।७।५५ ) आदि के अनुसार लक्ष्मण ने शूर्पणखा के स्तन भी काट दिये थे। किसी में बाल काटने की बात भी है। बालरामायण अङ्क ५ के अनुसार वह वनवास के पूर्व ही राम और लक्ष्मण द्वारा ठुकरायी गयी थी। जैनरामायणों में शूर्पणखा के विरूपकरण का वृत्तान्त नहीं है। वह लक्ष्मण पर मोहित होती है, असफल होने पर अपने नाखूनों से ही शरीर क्षत-विक्षत कर धूलिधूसरित होकर बाल बिखेर कर अपने भवन में विलाप करती है। पूछने पर कहती है कि शम्बूकहन्ता लक्ष्मण ने मेरा आलिङ्गन किया तथा मुझसे बलात्कार करना चाहा, किन्तु मैं छुड़ा कर भाग आयी। यह सब प्राचीन कथा में कुछ नवीनता लाने का प्रयासमात्र है, जो सर्वथा असंगत है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार विरूपित होकर वह खर के पास जाती है। वह पहले १४, पश्चात् १४ सहस्र राक्षसों को भेजता है और स्वयं भी जाता है। राक्षसों की सेना को आते देख राम लक्ष्मण को आदेश देते हैं कि वे सीता को लेकर गुहा का आश्रयण करें— “तस्माद् गृहीत्वा वैदेहीं शरपाणिर्धनुर्धरः । गुहामाश्रय शैलस्य दुर्गां पादपसङ्कुलाम् ॥” ( वा० रा० ३।२४।१२ ) बुल्के कहते हैं—"गुफा में छिप जायें" पर यह श्लोकार्थ नहीं है। राम अनेकों राक्षसों का, दूषण, त्रिशिरा तथा खर का भी वध कर देते हैं। शूर्पणखा रावण के पास जाकर यह वृत्तान्त कहती है। गौड़ीय पाठ के अनुसार गान्धर्वास्त्र के प्रभाव से राक्षस अपने साथियों को रामरूप देखकर आपस में ही एक दूसरे को मारते हैं। ब्रह्मवैवर्त में लक्ष्मण द्वारा खर और दूषण के वध की कथा है। इसका समाधान कल्पभेद से करना चाहिये। सेरीराम में भी वैसी ही कथा है। उसके अनुसार “दरकालहसीन” खरदूषण का पुत्र रावण के पास जाता है। रामनाटकों के अनुसार शूर्पणखा मन्थरा अथवा कैकेयी का रूप धारण कर राम के निर्वासन का सफल प्रयास करती है। कृत्तिवास- रामायण तथा भावार्थरामायण में सीता से मिलने वह अशोकवाटिका में आयी थी ( ५।१० )। श्यामदेश के ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा ही कनकम्ग बनी थी। आश्चर्यचूड़ामणि के अनुसार वह सीता बन जाती है। कृत्यारावण में वह पहले गौतमी पश्चात् सीता बनती है। ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा रावण का चित्र बनाने के लिए सीता को प्रेरित करती है और सीतात्याग का कारण बनती है। ब्रह्मवैवर्त के अनुसार राम से ठुकराये जाने पर राम को शाप देती है, तुम्हारी भार्या का अपहरण होगा— ६१