भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 559

४८२ रामायणमीमांसा पञ्चदश “मम शापात्तथा रामो हृतभार्यो भविष्यति ।” ( ब्रह्मवै० कृष्णजन्मखण्ड ६२।४४ ) और वह पुष्कर में तपस्या करने जाती है। वहाँ वह ब्रह्मा से वरदान प्राप्त करती है। अपने शरीर को अग्नि में जला कर कुब्जा बनकर कृष्ण को प्राप्त करती हैं। जिस किसी तरह भी भगवान् में मन लगाकर प्राणी को सद्गति मिलती है। भगवान् राम तथा भगवान् कृष्ण का स्वरूप दिव्य शक्ति से विशिष्ट ब्रह्मरूप ही था । गुणकृत आवरण-शून्य होने से वे निरावरण परब्रह्मरूप ही थे, अतः काम, क्रोध, भय और स्नेह जिस किसी तरह भी भजने से कल्याणकारी होते हैं— “नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतः प्रभोः । अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।। कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च । नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥” ( भाग १०।२९।१४,१५ ) जटायु ४७० वें अनु० में बुल्के यह मानते हैं कि तीनों पाठों में जटायु की राम से भेंट सीता-हरण से पहले हुई थी तथा उसने सीता की रक्षा की प्रतिज्ञा की थी। पर तब भी वे उसे प्रक्षेप मानते हैं और उसमें हेतु देते हैं कि सीता को ढूंढते हुए राम ने जटायु को देखा तो यह समझा कि यह कोई राक्षस है। इसी ने सीता को खा लिया होगा (वा० रा० ३।६७।११) । परन्तु उनकी समझ में यह नहीं आता है कि शोक-व्याकुल होने से राम को ऐसा भ्रम हुआ था कि सीता मेरी परीक्षा लेने के लिए कहीं छिप गयी है (वा० रा० ३।६१।१६,१७) ! आगे सीता स्वयं जटायु से राम के लिए सन्देश भी कहती हैं। यह सब पूर्वपरिचय का ही सङ्केत है। जटायु रावण की निन्दा कर उसे युद्ध के लिए ललकारता है और युद्ध में नखों से रावण को आहत करता है। धनुष छीनकर नष्ट कर देता है। रथ के खरों का वध कर रथ को तोड़ देता है। अन्य राक्षसों और सारथि को मार डालता है । रावण भी भूमि पर गिर जाता है—“पपात भुवि रावणः” ( वा० रा० ३।५१।१३ ) । फिर वह उठ कर आकाश में सीता को ले जाता है। जटायु उसकी बायी भुजाएँ काट डालता है, किन्तु वे फिर उत्पन्न हो जाती हैं। अन्त में वह सीता को छोड़कर जटायु के पक्ष, पाद तथा पार्श्व को काटकर गिरा देता है। सीता जटायु के पास पितृस्नेह से विलाप करती हैं— “अभ्यधावत वैदेही स्वबन्धुमिव दुःखिता ।” ( वा० रा० ३।५१।४४ ) इससे भी प्राचीन परिचय ध्वनित होता है। आश्चर्य है कि जो बुल्के राम के विष्णु अवतार होने में विश्वास नहीं करते वे यह विश्वास कैसे कर लेते हैं कि रावण की भुजाएँ कट गयीं और फिर से नवीन भुजाएं उत्पन्न हो गयीं और यीशु के चमत्कारों में कैसे विश्वास करते हैं। रावण अपने जीवन का अन्त करने के लिए सीता को केशों से पकड़ कर आकाशमार्ग से प्रस्थान करता है। केशग्रहण के कारण चराचर वित्रस्त हो गया। घोर तम से आवृत्त हो गया। वायु निश्चल और सूर्य निष्प्रभ हो गये । श्रीब्रह्मा ने दिव्यचक्षु से रावण का विनाश देखकर अवतार-कार्य की सफलता देखी। ऋषि लोग प्रहृष्ट और प्रव्यथित हो गये। रावण का संहार देख प्रसन्न हो गये परन्तु सीता का तात्कालिक दुःख देखकर प्रव्यथित हुए ( वा० रा० ३।५२।८-११) । काश्मीरीरामायण में यह देखकर कि रावण तलवार से जटायु को मारनेवाला है सीता कहती है इसे रक्त से सने पत्थर खिलाइये वह गिर जायेगा। रावण वैसा ही करता है। किसी कथा में रावण अपनी जांघ से रक्त