भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 560

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अध्याय अरण्यकाण्ड ४८३ निकाल कर रक्त से सना पत्थर खिलाता है—पाश्चात्य वृत्तान्त नं० ३। इसमें सीता का उद्देश्य यही रहा होगा कि इससे जटायु कम से कम जीवित तो रहेगा । हिन्दोनेशिया के सेरीराम के अनुसार सात दिन युद्ध करने के बाद दोनों एक दूसरे को अपना मर्मस्थान बताते हैं । पर रावण धोखा देकर अपने पैर का अँगूठा बतलाता है । सीता पक्षियों की भाषा में जटायु को मर्मस्थान न कहने का अनुरोध करती हैं, पर जटायु अपने पक्ष के अग्रभाग को मर्मस्थान बताकर मारा जाता है । सीता अपनी अँगूठी उसके मुख में रख देती है । तत्त्वसंग्रहरामायण (३।५) तथा भावार्थ- रामायण ( ३।१७ ) में भी यह कथा है । रामकेति एवं रामकियेन में सीता की अँगूठी छीन कर रावण उससे जटायु को मारता है और वह गिर जाता है । रामोपाख्यान ( महाभारत ) के अनुसार राम-लक्ष्मण कनकम्गवध के बाद वापस आते हुए जटायु से भेंट करते हैं । उनसे वह कहता है कि रावण सीता का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर चला गया । पर वाल्मीकिरामायण के अनुसार पहले वे पर्णशाला को शून्य देखते हैं । फिर सीता की खोज करते हैं । आगे युद्ध का चिह्न ( टूटा रथ ) देखकर राक्षसों द्वारा सीताहरण एवं वध की आशङ्का करते हैं । आगे बढ़कर आहत रक्ताङ्ग जटायु को देखते हैं । बुल्के इन वर्णनों में बहुत अंशों को छोड़ते जाते हैं, क्योंकि अधिकांश भागों को प्रक्षेप मान कर वे चलते हैं । जटायु राम और लक्ष्मण के सामने ही प्राण त्याग देता है । राम विधिवत् उसकी अन्त्येष्टि करते हैं । उदात्तराघव के अनुसार जटायु रक्तयुक्त चोंच से पत्तों पर लिख कर राम से रावण को मारने का अनुरोध करता है तथा किसी ऋषि के हाथ पत्र को राम के पास भेज देता है । बुल्के के अनुसार राम मृत जटायु के प्रति शुभकामना प्रकट हुए कहते हैं— “मया त्वं समनुज्ञातो गच्छ लोकाननुत्तमान् ।” ( वा० रा० ६८।३० ) परन्तु इस वचन से शुभकामना तो प्रकट नहीं होती, किन्तु साधिकार अनुज्ञा प्रकट होती है । राम कहते हैं कि मेरी आज्ञा से तुम सर्वोत्कृष्ट लोकों को प्राप्त करो । ऐसी आज्ञा ईश्वर ही दे सकता है, अन्य नहीं । शुभकामना में तो प्रार्थना होती है कि ईश्वर तुम्हें सद्गति प्रदान करें । तिलकटीका में कहा गया है कि जटायु को सायुज्य मुक्ति प्राप्त हुई थी । इससे स्पष्ट होता है कि सङ्कल्पमात्र से कर्मों में अनधिकृत एवं साधनहीन जटायु को अनुत्तम ब्रह्मलोक प्रदान करनेवाले राम सर्वथा परमेश्वर हैं । एतावता जो कहते हैं कि राम का ज्ञान माया से आवृत था, उनका मुख ध्वस्त हो जाता है। शोकादि का तो नटन नाट्यमात्र ही है। अतएव पद्मपुराण में कहा गया है— “संस्कारमकरोत्तस्य रामो ब्रह्म विधानतः । स्वपदं च ददौ तस्मै सार्धप रामप्रसादतः ॥ हरेः सामान्यरूपेण प्रययौ परमं पदम् ।” जटायु का श्राद्ध, तर्पण आदि भी राम ने विधिपूर्वक किया । अतएव अध्यात्मरामायण ( २।८ ) में उसके दिव्य रूप धारण करने की बात कही गयी है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार जटायु दशरथ का सखा तथा सम्पाति का भाई था । ये दोनों विनतासुत अरुण के पुत्र थे । दोनों होड़ में सूर्य के पास पहुँच गये । सम्पाति ने अनुज को किरणों से व्याकुल देख कर उसे अपने पक्षों से ढँक लिया । इस तरह जटायु तो बच गया पर सम्पाति के पक्ष जल गये । वह विन्ध्य पर्वत पर गिर गया । सीताहरण के समय जटायु की आयु ६०००० वर्ष की थी ( वा० रा० ३।५०।२० ) । महाभारत के रामोपाख्यान में जटायु को दशरथ का सखा कहा गया है । पद्मपुराण के पातालखण्ड तथा कृत्तिवासरामायण ( १।२७ ) में कहा गया है कि कभी अयोध्या में अनावृष्टि हुई थी । नारद से उसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर शनि का दृष्टिपात जानकर दशरथ शनि से युद्ध करने गये । शनि की दृष्टि से दशरथ का रथ टूट गया, जटायु ने उसे सँभाला । दशरथ की विजय हुई । फलस्वरूप अग्नि को साक्षी करके दोनों ने मित्रता की ।