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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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४९२ रामायणमीमांसा पञ्चदश देवता तुम्हारी रक्षा करें। घोर निमित्त अपशकुन दिखायी दे रहे हैं। क्या मैं राम के साथ युक्त तुम्हें फिर देख सकूँगा ? तुम्हारा कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ । "स्वस्ति तेऽस्तु" ( वा० रा० ३।४५।३३ ) "रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः । अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ।।" ( वा० रा० ३।४५।३४ ) इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण के मन में सीता के प्रति हित की आशंका है। यही हनुमान् से सन्देश कहते हुए सीता ने भी कहा था। जो विविध मालाओं और रत्नों तथा प्रिय श्रेष्ठ अङ्गना तथा विशाल पृथ्वी के दुर्लभ ऐश्वर्य का त्याग कर अपने माता-पिता को सम्मानित करके राम के साथ वनवासी हुए हैं, सुमित्रा जिनके द्वारा सुप्रजा हुई हैं वह धर्मात्मा सौमित्रि राम में पितृवत् तथा मुझमें मातृवत् व्यवहार करते हैं वे लक्ष्मण मेरा हरण नहीं जानते थे। जो लक्ष्मीवान् और वृद्धोपसेवी हैं वे बहुत नहीं बोलते, राम के परमप्रिय मेरे श्वसुर महाराज दशरथ के तुल्य मेरे रक्षक और हितकारी हैं। वे मुझसे भी अधिक राम के प्रिय हैं। वे जो भार वहन के योग्य नहीं है उस भार को भी वहन करते हैं। जिसको देखकर राम पिता के रक्षणकार्य का भी स्मरण नहीं करते उनसे मेरी ओर से कुशल प्रश्न करना । वे मृदु, नित्य पवित्र, दक्ष तथा राम के शिष्य लक्ष्मण जिस तरह मेरी दुःखानिवृत्ति के लिए प्रयत्नशील हों वैसा करना ( वा० रा० ३।३८।५४-६२ ) । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार शूर्पणखा ने भी राम से ठुकरायी जाकर यह शाप दिया था कि तुम्हारी पत्नी का हरण होगा। कृत्तिवासरामायण के अनुसार चन्द्रमा के नृत्य से विवाह का मुहूर्त टल गया था, इसलिए सीता- हरण हुआ है। कथञ्चित् कारणों में ऐसे ही और भी अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं। सीताहरण के मूलरूप पर विचार करते हुए बुल्के चिन्तामणि विनायक के अनुमान का उल्लेख करते हैं ओर कहते हैं—तथाकथित आदिरामायण में कनकमुग का कोई उल्लेख नहीं था, किन्तु वह अद्भुत रस की लोक- प्रियता के कारण बाद में रखा गया है। उनका तर्क है कि "यदि कनकमुग की घटना का वर्णन सचमुच रामायण में था तो सीता और रावण का संवाद अस्वाभाविक प्रतीत होता है। यदि सीता राम के सम्बन्ध में इतनी चिन्तित थीं कि उन्होंने लक्ष्मण को अत्यन्त कटु शब्द सुनाकर उन्हें राम की सहायता के लिए भेजा था तो उन्होंने राम के विषय में अपनी आशङ्का का उल्लेख रावण से क्यों नहीं किया ? यदि कहा जाय कि सीता रावण पर विश्वास नहीं करती थीं तो उन्होंने अपनी आत्मकथा विस्तृतरूप से क्यों सुनायी ? वास्तव में सीता-रावण-संवाद के अन्तर्गत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि धीसीता राम की प्रतीक्षा कर रही थीं जो लक्ष्मण के साथ मृगया खेलने गये थे— "ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा ।" ( वा० रा० ३।४३।३२ ) । इसके अतिरिक्त सीता रावण से कहती हैं मेरे पति मृग, वराह आदि मारकर बहुत-सा मांस लिये लौटनेवाले हैं— "आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम् । रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वादायामिषं बहु ।।" ( वा० रा० ३।४७।२३ ) बुल्के और भी कहते हैं—अनामकं जातकं ( तीसरी श० ई० ) में कनकमुग का उल्लेख नहीं है। उसके अनुसार जब राजा फल लेने चले गये थे तब एक दुष्ट नाग ने रानी का अपहरण किया था । पउमचरियं ( चौथी श० ई० ) के अनुसार खरदूषण अपनी पत्नी चन्द्रनखा से पुत्र के वध का समाचार सुनकर वन में उसे देखने गया था। लौटकर उसने रावण को इसका समाचार दे दिया था। रावण के आने में विलम्ब होने के कारण १४ सहस्र