रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंराक्षसों को लेकर वन की ओर उसने प्रस्थान किया। सेना को आते देखकर लक्ष्मण ने कहा, आप सीता की रक्षा कीजिये, मैं युद्ध करूँगा जब मैं सिंहनाद करूँ उस समय आप अवश्य जल्दी आना। लक्ष्मण युद्ध में संलग्न थे, इतने में रावण आ पहुँचा। सीता को देखकर वह आसक्त हो गया। अवलोकनी विद्या से उसने सब कुछ जान लिया था। उसने सिंहनाद किया, जिसे सुनकर राम लक्ष्मण की सहायता के लिए चले गये। रावण ने सीता को उठा कर पुष्पक विमान में रख लिया। जटायु को गिरा कर लङ्का चला गया। राम और लक्ष्मण लौटकर सीता को न पाकर मूर्च्छित होते हैं। कूर्मपुराण में भी रावण द्वारा अकेली वन में टहलती हुई सीता के अपहरण का उल्लेख मिलता है— “सीतां विशालनयनां चकमे कालनोदितः। गृहीत्वा मायया वेषं चरन्तीं विजने वने॥” (उत्तरविभाग अ० ३४)। इसी तरह सिंहली रामकथा तथा अन्य कथाओं में भी कनकमुग का उल्लेख नहीं है। वस्तुतः पाश्चात्यों एवं पाश्चात्यभावापन्न भारतीयों की दृष्टि से रामायण और महाभारत ही क्यों वेदों में भी प्रक्षेप ही प्रक्षेप दिखायी देते हैं। किसी आधुनिक लेखक के ग्रन्थ में भी ऐसे तर्काभासों के आधार पर अनेक अंश झुठलाये जा सकते हैं। परन्तु जब लेखक उन अंशों को भी अपनी कृति कह देता है तब समालोचक लाचार हो जाता है। बाइबिल, कुरान एवं किसी भी संविधान के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप कहने के लिए वैसे ही तर्काभास मिल सकते हैं जैसे कि बुल्के आदि के हैं। और कहा जा सकता है कि अद्भुत रस लोकप्रिय है, अतः अन्धों को आँख, कुष्ठों को कञ्चन काया का दान आदि की बातें बाद में जोड़ी गयी होंगी। अतः किन्हीं ग्रन्थों में कनकमुग की कथा न मिलने से कनकमुग-कथा को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वाल्मीकिरामायण विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित अनुष्ठान तथा पूजा-पाठ का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अनेक टीकाकारों ने उसपर टीकाएँ लिखी हैं। अनेक पुराणों में भी कञ्चनमृग की कथा है, अतः रामायण की अंशभूत कनकमुग-कथा की प्रामाणिकता ही है। वस्तुतः 'विद्यमान ग्रन्थ का अभिप्राय समझने का प्रयास करना ही हमारा कर्त्तव्य है। ग्रन्थ के स्वरूप का पर्यनुयोग करने का अधिकार अस्मदादि को अथवा अन्य किसी को नहीं है'—'अभिप्रायमवगन्तुं प्रभवामः न स्वरूपं पर्यनुयोक्तुं शक्यामः।' प्रामाणिक लोगों का कहना है कि किसी प्रमाण के प्रामाण्य पर शङ्का हो तो उसका समाधान करना तो ठीक है। परन्तु सर्वत्र दोष की कल्पना करके अप्रामाण्य उपस्थापन करना उचित नहीं है। अन्यथा सभी व्यवहारों में सभी स्थलों में अप्रामाण्य की शङ्का होने से भोजन, पानादि में भी विष की कल्पना से भोजन, पानादि में भी बाधा पड़ सकती है— “उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥” (श्लो० वा० २) सीता राम के विचार में चिन्तित थीं। यह तो ४५ वें सर्ग से विदित होता है। परन्तु चिन्तित होने का यह तो अर्थ नहीं है कि वे सबसे ही उसकी चर्चा करने लगें। फिर भी किसी भी स्थिति में अतिथि का सत्कार करना गृहमेधियों का धर्म है। इस दृष्टि से द्विजातिवेष में आये हुए रावण के लिए सीता ने आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा वन्य आँहार ग्रहण की प्रार्थना की थी। रावण से वैसे ही सीता ने आत्म-कथा कहनी नहीं प्रारम्भ कर दी थी। किन्तु जब रावण ने प्रश्न किया कि तुम कौन हो ? वन में क्यों रहते हो ? तब यह सोचकर कि यह ब्राह्मण और अतिथि है उत्तर न देने से कुपित होकर शाप दे सकता है। इसलिए सीता ने संक्षेप में अपना वृत्तान्त बतलाया था— “रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा। परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना ॥