रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९४ रामायणमीमांसा पञ्चदश
ब्राह्मणश्चातिथिश्चैव अनुक्तो हि शपेत माम् । इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत् ॥ (वा० रा० ३।४७।१,२ ) शङ्का करनेवालों को यह भी जानना चाहिये कि प्रक्षेप लिखनेवाले भी बुद्धिमान् होते हैं । वे भी पूर्वापर प्रसङ्ग को ध्यान में रखकर ही प्रक्षेप भी रखते हैं । “ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा ।” ( वा० रा० ३।४६।३८ ) इस वचन का कनकमुग-कथा से वैद्य और बुल्के जैसे लोगों को ही विरोध भासित हो सकता है अन्य को नहीं, क्योंकि कनकमुग को मारना भी मृगया ही है। मांस-प्राप्ति ही मृगया का फल नहीं है, किन्तु राजधर्म में चललक्ष्यसंधान, मेदः-क्षय, स्फूति आदि भी उसके फल हैं, अतः "मृगयागतं पतिं" के बल पर कनकमुग के पीछे न जाकर सामान्य मृगों के लिए ही राम गये थे, यह कथमपि सिद्ध नहीं है। रामचरितमानस के अनुसार तो राम ने खर, दूषण आदि को अपना परिचय यही दिया था कि— "हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं। तुम सम खल मृग खोजत फिरहीं ।।" (रा० मा० ३।१८।५) इतना ही नहीं, इस श्लोक से भी यह विदित होता है कि लक्ष्मण भी राम के साथ हैं। परन्तु सामान्य मृगया के लिए दोनों भाइयों के जाने की आवश्यकता नही थी। इस प्रसङ्ग में राम ने लक्ष्मण को कह दिया था कि वे सावधानी से सीता की रक्षा करें— “अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन ।” ( वा० रा० ३।४३।४९ ) । शूर्पणखा की नाक और कान काटकर रावण सहित समस्त राक्षसों को चुनौती दी जा चुकी है। खर, दूषण और त्रिशिरा १४ हजार सेना सहित मारे गये हैं। इस स्थिति में सीता को अकेले छोड़कर जाना कैसे संभव हो सकता था ? राम ने भी कहा था— “त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी ।” ( वा० रा० ३।५८।११ ) लक्ष्मण तुम्हारे प्रमाद से राक्षसों ने सीता को अवश्य खा लिया होगा। खर के वध से राक्षस दुःखी हैं। उन्होंने अवश्य सीता को मार दिया होगा। तुमने राक्षसों को बदला लेने का अवकाश दे दिया (वा० रा० ३।५८। १५,१६) । ऐसी स्थिति में सामान्य मृगयार्थ दोनों का जाना सर्वथा असंभव था । इसी तरह, “आगमिष्यति में भर्ता वन्यमादाय" का भी कनकमुग-कथा से कोई विरोध नहीं है । कोई भी सोच सकता है कि कनकमुग को लेकर या मारकर लौटते समय भोजनार्थ फल, मूल, मांसादि लेकर ही लौटेंगे । बुल्के का तर्क भी निःसार ही है, क्योंकि अगर पउमचरियं में न होने से कनकमुग की कथा आदिरामायण में भी न मानी जायगी तब तो पउमचरियं के अनुसार राम को जैनी भी मानना पड़ेगा और यह भी कहना पड़ेगा कि चौदह हजार राक्षसों और खर, दूषण तथा रावण आदि को लक्ष्मण ने ही मारा था । राम सीता की ही रक्षा में रहे । तथा च राम के द्वारा चौदह हजार राक्षसों के साथ खर, दूषण तथा रावण आदि का मारा जाना भी आदिरामायण में नहीं था। इसके अतिरिक्त आप स्वयं मानते हैं कि पउमचरियं में वाल्मीकिरामायण की लोकप्रिय रामकथा को पहले पहल जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयत्न किया गया है (दे० अनु० ५७)। कूर्मपुराण की कथा का भी यह अर्थ नहीं है कि सीता अपनी इच्छा से राम और लक्ष्मण को छोड़कर वन में टहल रही थी। किन्तु उसका इतना ही अर्थ है कि कनकमुग के पीछे राम गये थे । मारीच के मायामय रामानुकरणकारी शब्द को सुनकर सीता की प्रेरणा से लक्ष्मण को भी जाना पड़ा था। उस समय वन में सीता अकेली ही थीं। अतः यह प्रबल प्रश्न है कि किसी भी हालत में सामान्य मृगया के लिए राम और लक्ष्मण दोनों ही नहीं जा सकते थे । १४ हजार राक्षसों से