रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय अरण्यकाण्ड ४८७ अब तक भी परिम्लान नहीं हुए । फिर उसने कहा कि अब मैं आपकी अनुज्ञा से शरीर त्याग कर उन महर्षियों के पास जाना चाहती हूँ । राम ने कहा भद्रे, मैं तुम्हारे द्वारा अर्चित हुआ हूँ । यथासुख जाओ । चीर-कृष्णाजिनधारिणी शबरी राम से अनुज्ञात होकर अग्नि में अपने आप को आहुत कर ज्वलत्पावकतुल्य दिव्याभरणधारिणी, दिव्यमाल्यानु- लेपना तथा दिव्याम्बरधारिणी होकर उस दिव्यधाम में चली गयी जहाँ महर्षि विहरण करते हैं ( वा० रा० ३।७४। २८-३५ ) बुल्के कहते हैं—शरभङ्ग के प्रसंग की भाँति यहाँ भी राम को महान् अतिथि के रूप में देखा गया है, परन्तु यह भी असङ्गत ही है । पूर्वोक्त प्रसङ्गों में राम को सर्वलोकनस्कृत देववर कहा गया है और उनके ही प्रसाद से शबरी दिव्यधाम जाती है । शबरी के गुरुओं ने भी यही कहा था कि राम का आदर करके तुम अक्षय लोकों को प्राप्त करोगी । ऐसे युक्तियुक्त कारणों के रहने पर भी यह कहना कि शबरी का आधिकारिक कथा से कोई सम्बन्ध नहीं है, मात्र साहस ही है । पद्मपुराण में कहा गया— प्रत्युद्गम्य प्रणम्याथ निवेश्य कुशविष्टरे । पादप्रक्षालनं कृत्वा तत्तोयं पापनाशनम् ॥ शिरसा धार्य पीत्वा च वन्यैः पुष्पैस्तथाऽर्चयत् । फलानि च सुपक्वानि मूलानि मधुराणि च ॥ स्वयमास्वाद्य माधुर्यं परीक्ष्य परिभक्ष्य च । पश्चान्निवेदयामास राघवाभ्यां दृढव्रता ॥ फलान्यास्वाद्य काकुत्स्थस्तस्यै मुक्तिं परां ददौ । इन श्लोकों में परीक्ष्य तथा परिभक्ष्य शब्दों के आने से यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि शबरी ने जूठे फल भगवान को खिलाये । क्योकि धर्मचारिणी शबरी ऐसा कदापि कर नहीं सकती । स्पष्ट अर्थ यही है कि वृक्षों के फलों को चखकर मीठा पहिचानकर उन्हीं वृक्षों के फल तोड़कर लाती थी न कि जूठे कर रखती थी । शबरी ने राम का प्रत्युत्थान तथा प्रणाम करके उन्हें कुशविष्टर पर बैठा कर पादप्रक्षालन करके पवित्र पापनाशक जल सिर पर धारण किया और उसका पान किया । वन्य पुष्पों से पूजन कर स्वयं आस्वादन करके, परीक्षण करके सुपक्व मधुर फल निवेदन किये । राघव ने मधुरफल ग्रहण कर उसे परम मुक्ति प्रदान की । अध्यात्म- रामायण के अनुसार भी विराध के परामर्श देने पर कि शबरी सीता के सम्बन्ध में सब बातें बतायेगी । राम उसके पास जाते हैं । शबरी भक्तिपूर्वक राम और लक्ष्मण का आतिथ्य करती है। इकट्ठे किये हुए फल समर्पित करती है । वह अपने गुरु की आज्ञा से राम की प्रतीक्षा करती रही है । मैं मूढ़ स्त्री दर्शन के योग्य कैसे हो सकती हूँ । राम कहते हैं—पुरुषत्व तथा स्त्रीत्व जाति, नाम आदि का भक्ति में कोई महत्त्व नहीं है, भक्ति का ही महत्त्व है । राम शबरी से नवधा भक्ति का वर्णन करते हैं । राम सीता के विषय में पूछते हैं । वह रामको सर्वज्ञता का स्मरण कराकर कहती है । आप लोकाचार के अनुसार ही प्रश्न कर रहे हैं । वह बताती है कि सीता लङ्का में हैं । सुग्रीव के पास जाने का परामर्श देती है । उसमें भक्ति पर बल दिया गया है । आनन्दरामायण, पद्मपुराण, रामचरितमानस आदि में इसी प्रकार भक्ति का महत्त्व वर्णित है । पद्मपुराण परवर्त्ती नहीं है । वाल्मीकिरामायण के समान ही पुराणों का भी प्रामाण्य है । तत्त्वसंग्रहरामायण आदि में कहा गया है कि गोदावरी ने सीता के सम्बन्ध में प्रश्न करने पर उत्तर नहीं दिया तो राम ने उसे शाप दिया कि तुममें नहानेवाला चाण्डाल हो जायगा । ब्रह्मादि देवताओं के प्रार्थना करने पर अनुग्रह करके राम ने अपने चाप से गोदावरी की धारा को उस कूप से मिला दिया जिसमें शबरी नहाती थी ।