रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८८ रामायणमीमांसा पञ्चदश शबरी के माहात्म्य-वर्णन में ही उक्त कथा का तात्पर्य है। कई लोगों ने लिखा है कि वे जूठे ही फल थे, जिन्हें शबरी ने राम को दिया था। वस्तुतः उसका अभिप्राय यही है कि वह खट्टे मीठे का परीक्षण करके उसी वृक्ष के या उसी ढंग के फलों का संग्रह करती है। बलरामदास के वृत्तान्त के अनुसार वह अपने पति के साथ राम से मिलती है। उसके अनुसार राम उन फलों को नहीं खाते जिनमें दांतों के निशान नहीं हैं। परन्तु इसका भी तात्पर्य शबरी की भक्ति की प्रशंसा में ही है। क्योंकि जब— “नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् नाद्याच्चैव तथान्तरा” (मनु० २।५६)—मनु के अनुसार किसी सामान्य व्यक्ति के लिए भी उच्छिष्ट देना निषिद्ध है तो फिर ब्राह्मण, देवता, राजा या ईश्वर के लिए तो उच्छिष्ट अन्न या फल का प्रदान करना परम निषिद्ध ही है। अतः प्रमाणविरुद्ध आख्यायिका गुणवाद होकर भक्ति की प्रशंसा- मात्र में ही पर्यवसित होती है। भक्तमाल की प्रियादासकृत टीका में कहा गया है। ऋषियों की सेवा करने की अभिलाषा से प्रेरित होकर शबरी रात के पिछले प्रहर में उनके आश्रमों में प्रवेश करती थी। ऋषियों के स्नान करने जाने का मार्ग झाड़-बुहार कर साफ करती थी। उनके लिए लकड़ियां भी लाया करती थी। मतङ्ग के मन में जानने की इच्छा हुई कि यह सब कौन करता है। शिष्यों ने रात को जागकर उसे उपस्थित किया। उन्होंने शबरी को रामभक्ति की दीक्षा देकर उसे आश्रम में रहने की अनुमति दे दी। परलोक जाने से पूर्व मतङ्ग ने शबरी को आश्वासन दिया था कि उसे राम के दर्शन होंगे। किमी दिन अनजान में उससे एक ऋषि का स्पर्श हो गया। ऋषि उसपर क्रुद्ध हुए। ऋषि स्नान करने पहुँचे तो सरोवर कृमियों से भरा मिला। बहुत दिनों के बाद राम ने आकर उनका आतिथ्य ग्रहण किया। ऋषियों ने आकर सरोवर को स्वच्छ करने की प्रार्थना की तब राम ने सरोवर के अपवित्र होने का रहस्य प्रकट किया और बताया कि शबरी के स्पर्श से पवित्र हो जायेगा। रघुराजसिंह की रसिका- वली में भी उल्लेख है कि मुनियों के निवेदन पर— सबरी सकुचि सलिल पग डारी। तुरतहि भो निर्मल सरवारी ॥ ये सभी कथाएँ भक्ति के महिमावर्णन में ही तात्पर्य रखती हैं। शास्त्रविरुद्ध कृत्य के समर्थन में उनका तात्पर्य नहीं है, अतएव महान् भक्तों ने स्पष्ट कहा है कि श्रुति, स्मृति, पुराण तथा पाञ्चरात्र विधान के विरुद्ध हरि- भक्ति उत्पात का ही मूल है— “श्रुतिस्मृतिपुराणादिपाञ्चरात्रविधिं विना । ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पातायैव केवलम् ॥” कहा जाता है कि मध्यभारत के कोल, भील अपने को शबरी के वंशज मानते हैं। उनके अनुसार किसी दिन वनवास के समय सबरी से सीता, राम और लक्ष्मण की भेंट हुई। तीनों भूखे थे। शबरी ने जंगली बेर खिलाकर तृप्त किया। इस कथा में भी उच्छिष्ट फल देने की बात लिखी गयी है। रामायण ककविन के अनुसार उसने विष्णु अवतार वराह की लाश खायी थी जिससे उसका मुख काला हो गया था। राम ने उसका मुख पोंछकर शुद्ध कर दिया था। रामकियेन के अनुसार वह एक अप्सरा थी। ईश्वर की सेवा में असावधानी के कारण उसे शाप हुआ था कि वह एक जलते हुए जंगल के पास तब तक निवास करे जब तक राम स्वयं आकर उसे बुझा न दें। शबरी के निवेदन पर राम ने आग बुझा दी। जिससे वह फिर अप्सरा के रूप में स्वर्ग चली गयी। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार शबरी एक धर्मचारिणी ब्राह्मणी श्रमणी थी। विभिन्न देशों के सम्पर्क से उस कथा में विकृतियाँ आ गयी हैं। रामरसिकावली के अनुसार शबरी एक मुनिपत्नी थी। किसी समय मुनि वन से साधना करके लौटे तो उसने उनका चरण धोया।