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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 566

ऋषि को उसकी अशुचिता का ज्ञान होने पर उन्होंने पत्नी को वनवास दे दिया। उसका विलाप सुनकर अनुग्रह किया और कहा कि तुम वन में मुनियों की सेवा करोगी और तुम्हें राम का दर्शन होगा। कहते हैं कि उच्च तथा सम्पन्न परिवार में जन्म होने से उसे सत्सङ्ग और साधना का अवकाश नहीं मिलता था, अतः उसने नीच जाति में जन्म माँगा। इसी लिए भीलों में उसका जन्म हुआ। विवाहयोग्य होने पर घर में सैकड़ों पशुओं को इकट्ठे देखकर कारण पूछा तो विदित हुआ कि विवाह में उन सबका बलिदान होगा। अतः घबड़ा कर जानवरों को मुक्त कर वन में झोपड़ी बनाकर ऋषियों की सेवा करने लगी। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण से तो उसका शबरी नाम कहा गया है। वह शबर जाति की नहीं थी और श्रमणी अर्थात् तापसी थी—"श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी।" (वा० रा० ३।७३।२६) श्रमणी का तिलककार ने तापसी अर्थ ही किया है। वहीं उसको 'धर्मसंस्थिता' भी कहा गया है—"श्रमणीं धर्मसंस्थिताम्" (वा० रा० ३।७४।७)। उसने राम को यथाविधि अर्घ्य, पाद्य, आचमन आदि अर्पित किया—'पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद्यथाविधि।" (वा० रा० ३।७४।७)। राम ने भी उसे तपोधने कहकर संबोधित किया था—(वा० रा० ३।७४।८)। उसके तप एवं नियमों के सम्बन्ध में कुशल-प्रश्न किया था। वहाँ उसको "सिद्धा सिद्धसम्मता" भी कहा गया है। अतः उसका शबर जाति का होना और जूठे फल देना आदि प्रामाणिक न होकर प्रेमस्तुत्यर्थ ही हैं। मैंने विविध वन्य फल आपके लिए संचित किये हैं—'मया तु संचितं वन्यम्" (वा० रा० ३।७४।१७) यही वस्तुस्थिति है कि न तो वह भीलनी थी और न उसने जूठे फल खिलाये थे । सीताहरण ४८२ वें अनु० में बुल्के ने बतलाया है कि बौद्ध साहित्य में सीताहरण की चर्चा नहीं है। बोधिसत्त्व राम के द्वारा रावण का वध किया जाना बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल था। महाभारत के शान्तिपर्व में भी सीताहरण का वर्णन नहीं है। अन्यथा सभी रामकथाओं में सीता-हरण तथा रावण-युद्ध वर्णित है। सीता-हरण के कारणों के विषय में ४८३वें अनु० में कहा गया है कि सीता-हरण का मूल कारण शूर्पणखा का विरूपण ही है। विरूपित शूर्पणखा खर- सेना की पराजय देखकर लङ्का में जाती है और रावण को विशाल सेना सहित खर-दूषण का वध सुनाती है। वह सीता का सौन्दर्य वर्णन कर यह भी कहती है कि मैं सीता को तुम्हारे पास लाना चाहती थी, इसी लिए मेरा विरूपण किया गया है। उसने सीताहरण के लिए रावण को प्रोत्साहित किया। यहाँ बुल्के का यह कथन आंशिक ही सत्य है, क्योंकि रावण एक नीतिज्ञ राजा था, वह असावधान नहीं था। उसके गुप्तचरों ने विशेषतः अकम्पन ने उसे सब समाचार दे रखा था। सीता-हरण के लिए वह पहले भी गया था, परन्तु मारीच ने उसे समझाबुझाकर लौटा दिया था। अतएव दाक्षिणात्य पाठ का ३१ वाँ सर्ग प्रक्षिप्त है यह कहना सर्वथा असंगत है। वस्तुतः तो विरूपण मुख्य कारण नहीं अपितु सीता-सौन्दर्य का प्रलोभन और खरदूषण-विध्वंस ही सीता-हरण के मुख्य कारण हैं। अन्त में बुल्के के अनुसार भी जब शूर्पणखा विरूपण की कथा प्रक्षिप्त ही है तब फिर वह (विरूपण) वास्तविक सीता-हरण का कारण कैसे हो सकता है ? यहाँ बुल्के कहते हैं कि "अधिक संभव है कि (उनके तथाकथित) आदिरामायण में शूर्पणखा के विरूपण की कथा नहीं होगी, क्योंकि युद्धकाण्ड के दो स्थल इसके आधार हो सकते हैं रावण की सभा (सर्ग ९) में विभीषण ने सीताहरण के कारण के विषय में खर का ही उल्लेख किया है। विभीषण ने कहा कि राम ने रावण का क्या बिगाड़ा था कि उसने उनकी भार्या का अपहरण किया। खर ने सीमा उल्लङ्घन किया था (अतिवृत्तः), इसी लिए वह राम के द्वारा मारा गया— "किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा। आजहार जनस्थानाद्यस्य भार्यां यशस्विनः ॥