रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९० रामायणमीमांसा पञ्चदश खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे । अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ॥” ( वा० रा० ६।१२६।१३,१४ ) युद्धकाण्ड के अन्तिम ( १२६ वें ) सर्ग में हनुमान् द्वारा जो संक्षिप्त रामचरित सुनाया जाता है उसमें दण्डकारण्य के तपस्वियों की रक्षा के निमित्त राम द्वारा खर, दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसों के वध का वर्णन है । केवल बाद में शूर्पणखा के विरूपण का वर्णन है । अतः यह असंभव नहीं है कि राक्षसों के वध के कारण ही रावण का विरोध उत्पन्न हुआ था । बाद में शूर्पणखा के विरूपण की कथा प्रचलित होने लगी । परवर्ती राम-कथाओं में सीता-हरण का यह कारण व्यापक रूप में प्रामाणिक माना गया है, परन्तु यह कहना उचित नहीं, क्योंकि भले ही सीता-हरण का वह मुख्य कारण नहीं जैसा कि मैंने कहा है । तथापि शूर्पणखा की कथा का अपलाप करना उचित नहीं है । विभीषण द्वारा उसकी चर्चा न होने या हनुमान् द्वारा बाद में चर्चा होना मात्र उसके प्रक्षेप होने का हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि अनुमान के आधार पर प्रत्यक्ष का अपलाप नहीं हो सकता है । जहाँ भी प्रत्यक्ष का विरोध होता है वहाँ बाध होने के कारण अनुमान- साधक हेतु हेत्वाभास ही ठहरते हैं । विभीषण ने तो शूर्पणखा की कथा कहने लायक भी नहीं समझी, क्योंकि राज- परिवार की बहन-बेटी स्वैरिणी होकर वन में राम के पास क्यों गयी ? इसी कारण रावण ने भी उसकी चर्चा नहीं की और सर्ग ११ में यही कहा है कि वह मैथिली-कामना से मोहित होने के कारण ही सुहृदों से समझाने पर भी सीता को देने के लिए प्रस्तुत नहीं था “मैथिलीकाममोहितः” ( वा० रा० ६।११।१ ) । विचित्र बात है बुल्के अकम्पन की कथा को प्रक्षेप मानते हैं । यदि शूर्पणखा की कथा प्रक्षेप है तब रावण को जनस्थान की विशाल सेना और खर, दूषण आदि के विध्वंस का पता कैसे लगा ? और खर, दूषण आदि भी राम से विरोध करने क्यों गये ? वाल्मीकि- रामायण के अनुसार तो शूर्पणखा के विरूपण से ही खर आदि की राम-विरोध में प्रवृत्ति हुई ( वा० रा० ३ । सर्ग १८, १९ ) में स्पष्ट वर्णन है कि विरूपित होकर शूर्पणखा उग्रतेजा अपने भाई खर के पास गयी और अपने विरूपण का हेतुवर्णन किया । उसको वैसी देखकर ही वह उत्तेजित हुआ और उसने १४ राक्षसों को राम को मारने के लिए भेजा । हनुमान् की दृष्टि में तपस्वियों के रक्षणार्थ ही राक्षस-वध में राम की प्रवृत्ति हुई है । प्रारम्भ में भी तपस्वियों में धनुष, बाण आदि धारण के सम्बन्ध में सीता ने जब अनौचित्य बतलाया था तब भी राम ने ऋषियों की रक्षा ही धनुष-बाण धारण का उद्देश्य कहा था :— “ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे । संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥” ( वा० रा० ३।१०।१७ ) “क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ।” ( वा० रा० ३।१०।३ ) क्षत्रिय लोग इसी लिए धनुष धारण करते हैं कि आर्तशब्द संसार में सुनायी न पड़े । “तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम् । भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः ॥” ( वा० रा० ३।१९।१ ) इन सभी को क्षेपक कह देना अत्यन्त अनभिज्ञता ही है । यह तो राम-कथा का अन्वेषण नहीं विरूपण ही है । किसी अंश को आपात हेतुओं से प्रक्षेप कह देना सरल है, परन्तु समन्वय करना तात्पर्यज्ञानसापेक्ष होता है । अतएव शूर्पणखा की कथा पउमचरियं, भावार्थरामायण, आनन्दरामायण आदि में भी है ही । शम्बूक-वध आदि भी सीता-हरण का गौण ही कारण है । मुख्य कारण सीता के प्रति उसकी कामना ही है । अतएव विविध कथाओं में सीतास्वयंवर से ही उसकी प्रवृत्ति सीता की ओर रही है । रामलिङ्गामृत के अनुसार शूर्पणखा-विरूपण के बाद नारद