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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

ऋषि को उसकी अशुचिता का ज्ञान होने पर उन्होंने पत्नी को वनवास दे दिया। उसका विलाप सुनकर अनुग्रह किया और कहा कि तुम वन में मुनियों की सेवा करोगी और तुम्हें राम का दर्शन होगा। कहते हैं कि उच्च तथा सम्पन्न परिवार में जन्म होने से उसे सत्सङ्ग और साधना का अवकाश नहीं मिलता था, अतः उसने नीच जाति में जन्म माँगा। इसी लिए भीलों में उसका जन्म हुआ। विवाहयोग्य होने पर घर में सैकड़ों पशुओं को इकट्ठे देखकर कारण पूछा तो विदित हुआ कि विवाह में उन सबका बलिदान होगा। अतः घबड़ा कर जानवरों को मुक्त कर वन में झोपड़ी बनाकर ऋषियों की सेवा करने लगी। परन्तु आर्ष वाल्मीकिरामायण से तो उसका शबरी नाम कहा गया है। वह शबर जाति की नहीं थी और श्रमणी अर्थात् तापसी थी—"श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी।" (वा० रा० ३।७३।२६) श्रमणी का तिलककार ने तापसी अर्थ ही किया है। वहीं उसको 'धर्मसंस्थिता' भी कहा गया है—"श्रमणीं धर्मसंस्थिताम्" (वा० रा० ३।७४।७)। उसने राम को यथाविधि अर्घ्य, पाद्य, आचमन आदि अर्पित किया—'पाद्यमाचमनीयं च सर्वं प्रादाद्यथाविधि।" (वा० रा० ३।७४।७)। राम ने भी उसे तपोधने कहकर संबोधित किया था—(वा० रा० ३।७४।८)। उसके तप एवं नियमों के सम्बन्ध में कुशल-प्रश्न किया था। वहाँ उसको "सिद्धा सिद्धसम्मता" भी कहा गया है। अतः उसका शबर जाति का होना और जूठे फल देना आदि प्रामाणिक न होकर प्रेमस्तुत्यर्थ ही हैं। मैंने विविध वन्य फल आपके लिए संचित किये हैं—'मया तु संचितं वन्यम्" (वा० रा० ३।७४।१७) यही वस्तुस्थिति है कि न तो वह भीलनी थी और न उसने जूठे फल खिलाये थे । सीताहरण ४८२ वें अनु० में बुल्के ने बतलाया है कि बौद्ध साहित्य में सीताहरण की चर्चा नहीं है। बोधिसत्त्व राम के द्वारा रावण का वध किया जाना बौद्ध आदर्श के प्रतिकूल था। महाभारत के शान्तिपर्व में भी सीताहरण का वर्णन नहीं है। अन्यथा सभी रामकथाओं में सीता-हरण तथा रावण-युद्ध वर्णित है। सीता-हरण के कारणों के विषय में ४८३वें अनु० में कहा गया है कि सीता-हरण का मूल कारण शूर्पणखा का विरूपण ही है। विरूपित शूर्पणखा खर- सेना की पराजय देखकर लङ्का में जाती है और रावण को विशाल सेना सहित खर-दूषण का वध सुनाती है। वह सीता का सौन्दर्य वर्णन कर यह भी कहती है कि मैं सीता को तुम्हारे पास लाना चाहती थी, इसी लिए मेरा विरूपण किया गया है। उसने सीताहरण के लिए रावण को प्रोत्साहित किया। यहाँ बुल्के का यह कथन आंशिक ही सत्य है, क्योंकि रावण एक नीतिज्ञ राजा था, वह असावधान नहीं था। उसके गुप्तचरों ने विशेषतः अकम्पन ने उसे सब समाचार दे रखा था। सीता-हरण के लिए वह पहले भी गया था, परन्तु मारीच ने उसे समझाबुझाकर लौटा दिया था। अतएव दाक्षिणात्य पाठ का ३१ वाँ सर्ग प्रक्षिप्त है यह कहना सर्वथा असंगत है। वस्तुतः तो विरूपण मुख्य कारण नहीं अपितु सीता-सौन्दर्य का प्रलोभन और खरदूषण-विध्वंस ही सीता-हरण के मुख्य कारण हैं। अन्त में बुल्के के अनुसार भी जब शूर्पणखा विरूपण की कथा प्रक्षिप्त ही है तब फिर वह (विरूपण) वास्तविक सीता-हरण का कारण कैसे हो सकता है ? यहाँ बुल्के कहते हैं कि "अधिक संभव है कि (उनके तथाकथित) आदिरामायण में शूर्पणखा के विरूपण की कथा नहीं होगी, क्योंकि युद्धकाण्ड के दो स्थल इसके आधार हो सकते हैं रावण की सभा (सर्ग ९) में विभीषण ने सीताहरण के कारण के विषय में खर का ही उल्लेख किया है। विभीषण ने कहा कि राम ने रावण का क्या बिगाड़ा था कि उसने उनकी भार्या का अपहरण किया। खर ने सीमा उल्लङ्घन किया था (अतिवृत्तः), इसी लिए वह राम के द्वारा मारा गया— "किं च राक्षसराजस्य रामेणापकृतं पुरा। आजहार जनस्थानाद्यस्य भार्यां यशस्विनः ॥

४९० रामायणमीमांसा पञ्चदश खरो यद्यतिवृत्तस्तु स रामेण हतो रणे । अवश्यं प्राणिनां प्राणा रक्षितव्या यथाबलम् ॥” ( वा० रा० ६।१२६।१३,१४ ) युद्धकाण्ड के अन्तिम ( १२६ वें ) सर्ग में हनुमान् द्वारा जो संक्षिप्त रामचरित सुनाया जाता है उसमें दण्डकारण्य के तपस्वियों की रक्षा के निमित्त राम द्वारा खर, दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसों के वध का वर्णन है । केवल बाद में शूर्पणखा के विरूपण का वर्णन है । अतः यह असंभव नहीं है कि राक्षसों के वध के कारण ही रावण का विरोध उत्पन्न हुआ था । बाद में शूर्पणखा के विरूपण की कथा प्रचलित होने लगी । परवर्ती राम-कथाओं में सीता-हरण का यह कारण व्यापक रूप में प्रामाणिक माना गया है, परन्तु यह कहना उचित नहीं, क्योंकि भले ही सीता-हरण का वह मुख्य कारण नहीं जैसा कि मैंने कहा है । तथापि शूर्पणखा की कथा का अपलाप करना उचित नहीं है । विभीषण द्वारा उसकी चर्चा न होने या हनुमान् द्वारा बाद में चर्चा होना मात्र उसके प्रक्षेप होने का हेतु नहीं हो सकता, क्योंकि अनुमान के आधार पर प्रत्यक्ष का अपलाप नहीं हो सकता है । जहाँ भी प्रत्यक्ष का विरोध होता है वहाँ बाध होने के कारण अनुमान- साधक हेतु हेत्वाभास ही ठहरते हैं । विभीषण ने तो शूर्पणखा की कथा कहने लायक भी नहीं समझी, क्योंकि राज- परिवार की बहन-बेटी स्वैरिणी होकर वन में राम के पास क्यों गयी ? इसी कारण रावण ने भी उसकी चर्चा नहीं की और सर्ग ११ में यही कहा है कि वह मैथिली-कामना से मोहित होने के कारण ही सुहृदों से समझाने पर भी सीता को देने के लिए प्रस्तुत नहीं था “मैथिलीकाममोहितः” ( वा० रा० ६।११।१ ) । विचित्र बात है बुल्के अकम्पन की कथा को प्रक्षेप मानते हैं । यदि शूर्पणखा की कथा प्रक्षेप है तब रावण को जनस्थान की विशाल सेना और खर, दूषण आदि के विध्वंस का पता कैसे लगा ? और खर, दूषण आदि भी राम से विरोध करने क्यों गये ? वाल्मीकि- रामायण के अनुसार तो शूर्पणखा के विरूपण से ही खर आदि की राम-विरोध में प्रवृत्ति हुई ( वा० रा० ३ । सर्ग १८, १९ ) में स्पष्ट वर्णन है कि विरूपित होकर शूर्पणखा उग्रतेजा अपने भाई खर के पास गयी और अपने विरूपण का हेतुवर्णन किया । उसको वैसी देखकर ही वह उत्तेजित हुआ और उसने १४ राक्षसों को राम को मारने के लिए भेजा । हनुमान् की दृष्टि में तपस्वियों के रक्षणार्थ ही राक्षस-वध में राम की प्रवृत्ति हुई है । प्रारम्भ में भी तपस्वियों में धनुष, बाण आदि धारण के सम्बन्ध में सीता ने जब अनौचित्य बतलाया था तब भी राम ने ऋषियों की रक्षा ही धनुष-बाण धारण का उद्देश्य कहा था :— “ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे । संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥” ( वा० रा० ३।१०।१७ ) “क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ।” ( वा० रा० ३।१०।३ ) क्षत्रिय लोग इसी लिए धनुष धारण करते हैं कि आर्तशब्द संसार में सुनायी न पड़े । “तां तथा पतितां दृष्ट्वा विरूपां शोणितोक्षिताम् । भगिनीं क्रोधसंतप्तः खरः पप्रच्छ राक्षसः ॥” ( वा० रा० ३।१९।१ ) इन सभी को क्षेपक कह देना अत्यन्त अनभिज्ञता ही है । यह तो राम-कथा का अन्वेषण नहीं विरूपण ही है । किसी अंश को आपात हेतुओं से प्रक्षेप कह देना सरल है, परन्तु समन्वय करना तात्पर्यज्ञानसापेक्ष होता है । अतएव शूर्पणखा की कथा पउमचरियं, भावार्थरामायण, आनन्दरामायण आदि में भी है ही । शम्बूक-वध आदि भी सीता-हरण का गौण ही कारण है । मुख्य कारण सीता के प्रति उसकी कामना ही है । अतएव विविध कथाओं में सीतास्वयंवर से ही उसकी प्रवृत्ति सीता की ओर रही है । रामलिङ्गामृत के अनुसार शूर्पणखा-विरूपण के बाद नारद

रावण से सीता का सौन्दर्य-वर्णन करत हैं। तभी वह सीता-हरण में प्रवृत्त होता है। १८ वीं शती के उसी वृत्तान्त के अनुसार राम ने चित्रकूट में पहुँच कर अपने बहुत शिष्यों को पुनर्जन्म का सिद्धान्त सिखाया था। वे सिंहल में भी अपने सिद्धान्त का प्रचार चाहते थे। रावण ने इसका विरोध किया और राम को पराजित करके सीता को छीन लिया। विभीषण की सहायता से राम ने ब्रह्मा द्वारा भेजी गयी सेना से रावण को जीत लिया (पाश्चात्यवृ० न० १२)। उक्त कथाएँ वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध विकृति तथा विपर्यास के ही परिणाम हैं। रावण स्वयं भी पुनर्जन्म का सिद्धान्त माननेवाला था। वह वैदिक आहिताग्नि था। रावण ने सनत्कुमार से यह सुना था कि भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य होता है—क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः” (वा० रा० दा० प्र० २।२२), अतएव विष्णु द्वारा मारे जानेवाले लोगों को परम धाम मिलता है। मुनि के यह बतलाये जाने पर कि त्रेतायुग में नारायण रामरूप में प्रकट होंगे। वह पिता की आज्ञा से लक्ष्मीरूप सीता के साथ वनवास करेंगे; अतः रावण ने राम के हाथ से मरण की कामना से ही सीता का हरण किया था— “अपहृता सीता त्वत्तो मरणकाङ्क्षया ।” (वा० रा० दाक्षिणात्य पाठ उत्तरकाण्ड सर्ग ३७ के बाद जो प्रक्षिप्त सर्ग हैं उनमें सर्ग ५ श्लोक ४३)। रावण माता के समान ही सीता की लङ्का में रक्षा करता था--“लङ्कामानीय यत्नेन मातेव परिरक्षिता ।” (वही सर्ग ५ श्लोक ५४)। वाल्मीकिरामायण गौडीय पाठ ६।४१।२५ तथा पश्चिमो- त्तरीय पाठ ६।४२।२४ के अनुसार भी रावण राम के हाथों मर कर मुक्ति प्राप्त करना चाहता था— “निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।” इसकी पुष्टि रामतापनीय उपनिषद् (४।१७) से होती है। वह परवर्ती नहीं, किन्तु वेद का अंश होने से अनादि ही है। अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण में भी इसका समर्थन है। वस्तुस्थिति यह है कि वाल्मीकिरामायण के द्वारा अधिकांश राम के लौकिक मानवीय रूप का वर्णन है जब कि रामतापनीय आदि में उनके वास्तविक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है। शिवपुराण के अनुसार रावण ने पाताल में विष्णु से प्रार्थना की थी कि तुम्हारे हाथ से मेरी मृत्यु हो—“त्वद्धस्ताद् भगवन् मृत्युर्ममास्तु ।” इन्हीं प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर रामचरितमानस में रावण के अभिप्राय का वर्णन है— “सुररञ्जन भञ्जन महिभारा। जौ भगवन्त लीन्ह अवतारा ॥ तौ मैं जाय बैरु हठि करिहूँ। प्रभु सर प्रान तजे भव तरिहूँ ॥ होइ भजन नहिं तामस देहा । मन क्रम बचन मन्त्र दृढ़ एहा ॥” भृगुशाप, नारदशाप आदि अन्य कारण भी सीताहरण के हैं ही। बुल्के यह भी कहते हैं “धिक् त्वामद्य विनश्यन्तीं यन्मामेवं विशङ्कसे ।” (वा० रा० ३।४५।३२) के अनुसार लक्ष्मण का शाप भी सीता हरण का कारण है। भट्टिकाव्य के अनुसार शाप का रूप इस प्रकार है “शत्रुहस्तं गमिष्यसि” (५।६०) देवीभागवत तथा अध्यात्म- रामायण में भी इस शाप का निर्देश है ।” परन्तु उनका कहना सङ्गत नहीं है, क्योंकि राम और सीता के प्रति लक्ष्मण अनिष्ट की आशंका नहीं कर सकते थे। किसी के प्रति अनिष्ट की आकाङ्क्षा करना शाप होता है। किन्तु प्रकृत में तो लक्ष्मण ने सीता की विपरीत मति के अनुसार शत्रुहस्त में पड़ने की सम्भावनामात्र व्यक्त की है न कि शाप दिया है। यह अवश्य है कि परोक्षरूप से महाभागवत लक्ष्मण का अपमान अवश्य सीता के उस दुःख का कारण बना था, पर लक्ष्मण के शाप की कल्पना निरर्थक ही है। उसी शङ्का को व्यक्त करते हुए वे कहते हैं समग्र वन

४९२ रामायणमीमांसा पञ्चदश देवता तुम्हारी रक्षा करें। घोर निमित्त अपशकुन दिखायी दे रहे हैं। क्या मैं राम के साथ युक्त तुम्हें फिर देख सकूँगा ? तुम्हारा कल्याण हो, मैं जा रहा हूँ । "स्वस्ति तेऽस्तु" ( वा० रा० ३।४५।३३ ) "रक्षन्तु त्वां विशालाक्षि समग्रा वनदेवताः । अपि त्वां सह रामेण पश्येयं पुनरागतः ।।" ( वा० रा० ३।४५।३४ ) इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण के मन में सीता के प्रति हित की आशंका है। यही हनुमान् से सन्देश कहते हुए सीता ने भी कहा था। जो विविध मालाओं और रत्नों तथा प्रिय श्रेष्ठ अङ्गना तथा विशाल पृथ्वी के दुर्लभ ऐश्वर्य का त्याग कर अपने माता-पिता को सम्मानित करके राम के साथ वनवासी हुए हैं, सुमित्रा जिनके द्वारा सुप्रजा हुई हैं वह धर्मात्मा सौमित्रि राम में पितृवत् तथा मुझमें मातृवत् व्यवहार करते हैं वे लक्ष्मण मेरा हरण नहीं जानते थे। जो लक्ष्मीवान् और वृद्धोपसेवी हैं वे बहुत नहीं बोलते, राम के परमप्रिय मेरे श्वसुर महाराज दशरथ के तुल्य मेरे रक्षक और हितकारी हैं। वे मुझसे भी अधिक राम के प्रिय हैं। वे जो भार वहन के योग्य नहीं है उस भार को भी वहन करते हैं। जिसको देखकर राम पिता के रक्षणकार्य का भी स्मरण नहीं करते उनसे मेरी ओर से कुशल प्रश्न करना । वे मृदु, नित्य पवित्र, दक्ष तथा राम के शिष्य लक्ष्मण जिस तरह मेरी दुःखानिवृत्ति के लिए प्रयत्नशील हों वैसा करना ( वा० रा० ३।३८।५४-६२ ) । ब्रह्मवैवर्त के अनुसार शूर्पणखा ने भी राम से ठुकरायी जाकर यह शाप दिया था कि तुम्हारी पत्नी का हरण होगा। कृत्तिवासरामायण के अनुसार चन्द्रमा के नृत्य से विवाह का मुहूर्त टल गया था, इसलिए सीता- हरण हुआ है। कथञ्चित् कारणों में ऐसे ही और भी अनेक कारण गिनाये जा सकते हैं। सीताहरण के मूलरूप पर विचार करते हुए बुल्के चिन्तामणि विनायक के अनुमान का उल्लेख करते हैं ओर कहते हैं—तथाकथित आदिरामायण में कनकमुग का कोई उल्लेख नहीं था, किन्तु वह अद्भुत रस की लोक- प्रियता के कारण बाद में रखा गया है। उनका तर्क है कि "यदि कनकमुग की घटना का वर्णन सचमुच रामायण में था तो सीता और रावण का संवाद अस्वाभाविक प्रतीत होता है। यदि सीता राम के सम्बन्ध में इतनी चिन्तित थीं कि उन्होंने लक्ष्मण को अत्यन्त कटु शब्द सुनाकर उन्हें राम की सहायता के लिए भेजा था तो उन्होंने राम के विषय में अपनी आशङ्का का उल्लेख रावण से क्यों नहीं किया ? यदि कहा जाय कि सीता रावण पर विश्वास नहीं करती थीं तो उन्होंने अपनी आत्मकथा विस्तृतरूप से क्यों सुनायी ? वास्तव में सीता-रावण-संवाद के अन्तर्गत स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि धीसीता राम की प्रतीक्षा कर रही थीं जो लक्ष्मण के साथ मृगया खेलने गये थे— "ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा ।" ( वा० रा० ३।४३।३२ ) । इसके अतिरिक्त सीता रावण से कहती हैं मेरे पति मृग, वराह आदि मारकर बहुत-सा मांस लिये लौटनेवाले हैं— "आगमिष्यति मे भर्ता वन्यमादाय पुष्कलम् । रुरून् गोधान् वराहांश्च हत्वादायामिषं बहु ।।" ( वा० रा० ३।४७।२३ ) बुल्के और भी कहते हैं—अनामकं जातकं ( तीसरी श० ई० ) में कनकमुग का उल्लेख नहीं है। उसके अनुसार जब राजा फल लेने चले गये थे तब एक दुष्ट नाग ने रानी का अपहरण किया था । पउमचरियं ( चौथी श० ई० ) के अनुसार खरदूषण अपनी पत्नी चन्द्रनखा से पुत्र के वध का समाचार सुनकर वन में उसे देखने गया था। लौटकर उसने रावण को इसका समाचार दे दिया था। रावण के आने में विलम्ब होने के कारण १४ सहस्र

राक्षसों को लेकर वन की ओर उसने प्रस्थान किया। सेना को आते देखकर लक्ष्मण ने कहा, आप सीता की रक्षा कीजिये, मैं युद्ध करूँगा जब मैं सिंहनाद करूँ उस समय आप अवश्य जल्दी आना। लक्ष्मण युद्ध में संलग्न थे, इतने में रावण आ पहुँचा। सीता को देखकर वह आसक्त हो गया। अवलोकनी विद्या से उसने सब कुछ जान लिया था। उसने सिंहनाद किया, जिसे सुनकर राम लक्ष्मण की सहायता के लिए चले गये। रावण ने सीता को उठा कर पुष्पक विमान में रख लिया। जटायु को गिरा कर लङ्का चला गया। राम और लक्ष्मण लौटकर सीता को न पाकर मूर्च्छित होते हैं। कूर्मपुराण में भी रावण द्वारा अकेली वन में टहलती हुई सीता के अपहरण का उल्लेख मिलता है— “सीतां विशालनयनां चकमे कालनोदितः। गृहीत्वा मायया वेषं चरन्तीं विजने वने॥” (उत्तरविभाग अ० ३४)। इसी तरह सिंहली रामकथा तथा अन्य कथाओं में भी कनकमुग का उल्लेख नहीं है। वस्तुतः पाश्चात्यों एवं पाश्चात्यभावापन्न भारतीयों की दृष्टि से रामायण और महाभारत ही क्यों वेदों में भी प्रक्षेप ही प्रक्षेप दिखायी देते हैं। किसी आधुनिक लेखक के ग्रन्थ में भी ऐसे तर्काभासों के आधार पर अनेक अंश झुठलाये जा सकते हैं। परन्तु जब लेखक उन अंशों को भी अपनी कृति कह देता है तब समालोचक लाचार हो जाता है। बाइबिल, कुरान एवं किसी भी संविधान के विभिन्न अंशों को प्रक्षेप कहने के लिए वैसे ही तर्काभास मिल सकते हैं जैसे कि बुल्के आदि के हैं। और कहा जा सकता है कि अद्भुत रस लोकप्रिय है, अतः अन्धों को आँख, कुष्ठों को कञ्चन काया का दान आदि की बातें बाद में जोड़ी गयी होंगी। अतः किन्हीं ग्रन्थों में कनकमुग की कथा न मिलने से कनकमुग-कथा को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वाल्मीकिरामायण विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित अनुष्ठान तथा पूजा-पाठ का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अनेक टीकाकारों ने उसपर टीकाएँ लिखी हैं। अनेक पुराणों में भी कञ्चनमृग की कथा है, अतः रामायण की अंशभूत कनकमुग-कथा की प्रामाणिकता ही है। वस्तुतः 'विद्यमान ग्रन्थ का अभिप्राय समझने का प्रयास करना ही हमारा कर्त्तव्य है। ग्रन्थ के स्वरूप का पर्यनुयोग करने का अधिकार अस्मदादि को अथवा अन्य किसी को नहीं है'—'अभिप्रायमवगन्तुं प्रभवामः न स्वरूपं पर्यनुयोक्तुं शक्यामः।' प्रामाणिक लोगों का कहना है कि किसी प्रमाण के प्रामाण्य पर शङ्का हो तो उसका समाधान करना तो ठीक है। परन्तु सर्वत्र दोष की कल्पना करके अप्रामाण्य उपस्थापन करना उचित नहीं है। अन्यथा सभी व्यवहारों में सभी स्थलों में अप्रामाण्य की शङ्का होने से भोजन, पानादि में भी विष की कल्पना से भोजन, पानादि में भी बाधा पड़ सकती है— “उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादजातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥” (श्लो० वा० २) सीता राम के विचार में चिन्तित थीं। यह तो ४५ वें सर्ग से विदित होता है। परन्तु चिन्तित होने का यह तो अर्थ नहीं है कि वे सबसे ही उसकी चर्चा करने लगें। फिर भी किसी भी स्थिति में अतिथि का सत्कार करना गृहमेधियों का धर्म है। इस दृष्टि से द्विजातिवेष में आये हुए रावण के लिए सीता ने आसन, पाद्य, अर्घ्य तथा वन्य आँहार ग्रहण की प्रार्थना की थी। रावण से वैसे ही सीता ने आत्म-कथा कहनी नहीं प्रारम्भ कर दी थी। किन्तु जब रावण ने प्रश्न किया कि तुम कौन हो ? वन में क्यों रहते हो ? तब यह सोचकर कि यह ब्राह्मण और अतिथि है उत्तर न देने से कुपित होकर शाप दे सकता है। इसलिए सीता ने संक्षेप में अपना वृत्तान्त बतलाया था— “रावणेन तु वैदेही तदा पृष्टा जिहीर्षुणा। परिव्राजकरूपेण शशंसात्मानमात्मना ॥

४९४ रामायणमीमांसा पञ्चदश

ब्राह्मणश्चातिथिश्चैव अनुक्तो हि शपेत माम् । इति ध्यात्वा मुहूर्तं तु सीता वचनमब्रवीत् ॥ (वा० रा० ३।४७।१,२ ) शङ्का करनेवालों को यह भी जानना चाहिये कि प्रक्षेप लिखनेवाले भी बुद्धिमान् होते हैं । वे भी पूर्वापर प्रसङ्ग को ध्यान में रखकर ही प्रक्षेप भी रखते हैं । “ततः सुवेषं मृगयागतं पतिं प्रतीक्षमाणा सहलक्ष्मणं तदा ।” ( वा० रा० ३।४६।३८ ) इस वचन का कनकमुग-कथा से वैद्य और बुल्के जैसे लोगों को ही विरोध भासित हो सकता है अन्य को नहीं, क्योंकि कनकमुग को मारना भी मृगया ही है। मांस-प्राप्ति ही मृगया का फल नहीं है, किन्तु राजधर्म में चललक्ष्यसंधान, मेदः-क्षय, स्फूति आदि भी उसके फल हैं, अतः "मृगयागतं पतिं" के बल पर कनकमुग के पीछे न जाकर सामान्य मृगों के लिए ही राम गये थे, यह कथमपि सिद्ध नहीं है। रामचरितमानस के अनुसार तो राम ने खर, दूषण आदि को अपना परिचय यही दिया था कि— "हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं। तुम सम खल मृग खोजत फिरहीं ।।" (रा० मा० ३।१८।५) इतना ही नहीं, इस श्लोक से भी यह विदित होता है कि लक्ष्मण भी राम के साथ हैं। परन्तु सामान्य मृगया के लिए दोनों भाइयों के जाने की आवश्यकता नही थी। इस प्रसङ्ग में राम ने लक्ष्मण को कह दिया था कि वे सावधानी से सीता की रक्षा करें— “अप्रमत्तेन ते भाव्यमाश्रमस्थेन ।” ( वा० रा० ३।४३।४९ ) । शूर्पणखा की नाक और कान काटकर रावण सहित समस्त राक्षसों को चुनौती दी जा चुकी है। खर, दूषण और त्रिशिरा १४ हजार सेना सहित मारे गये हैं। इस स्थिति में सीता को अकेले छोड़कर जाना कैसे संभव हो सकता था ? राम ने भी कहा था— “त्वयि प्रमत्ते रक्षोभिर्भक्षिता वा तपस्विनी ।” ( वा० रा० ३।५८।११ ) लक्ष्मण तुम्हारे प्रमाद से राक्षसों ने सीता को अवश्य खा लिया होगा। खर के वध से राक्षस दुःखी हैं। उन्होंने अवश्य सीता को मार दिया होगा। तुमने राक्षसों को बदला लेने का अवकाश दे दिया (वा० रा० ३।५८। १५,१६) । ऐसी स्थिति में सामान्य मृगयार्थ दोनों का जाना सर्वथा असंभव था । इसी तरह, “आगमिष्यति में भर्ता वन्यमादाय" का भी कनकमुग-कथा से कोई विरोध नहीं है । कोई भी सोच सकता है कि कनकमुग को लेकर या मारकर लौटते समय भोजनार्थ फल, मूल, मांसादि लेकर ही लौटेंगे । बुल्के का तर्क भी निःसार ही है, क्योंकि अगर पउमचरियं में न होने से कनकमुग की कथा आदिरामायण में भी न मानी जायगी तब तो पउमचरियं के अनुसार राम को जैनी भी मानना पड़ेगा और यह भी कहना पड़ेगा कि चौदह हजार राक्षसों और खर, दूषण तथा रावण आदि को लक्ष्मण ने ही मारा था । राम सीता की ही रक्षा में रहे । तथा च राम के द्वारा चौदह हजार राक्षसों के साथ खर, दूषण तथा रावण आदि का मारा जाना भी आदिरामायण में नहीं था। इसके अतिरिक्त आप स्वयं मानते हैं कि पउमचरियं में वाल्मीकिरामायण की लोकप्रिय रामकथा को पहले पहल जैनधर्म के साँचे में ढालने का प्रयत्न किया गया है (दे० अनु० ५७)। कूर्मपुराण की कथा का भी यह अर्थ नहीं है कि सीता अपनी इच्छा से राम और लक्ष्मण को छोड़कर वन में टहल रही थी। किन्तु उसका इतना ही अर्थ है कि कनकमुग के पीछे राम गये थे । मारीच के मायामय रामानुकरणकारी शब्द को सुनकर सीता की प्रेरणा से लक्ष्मण को भी जाना पड़ा था। उस समय वन में सीता अकेली ही थीं। अतः यह प्रबल प्रश्न है कि किसी भी हालत में सामान्य मृगया के लिए राम और लक्ष्मण दोनों ही नहीं जा सकते थे । १४ हजार राक्षसों से

अध्याय अरण्यकाण्ड ४९५ युद्ध करते समय लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए नियुक्त किया ही गया था, अतः दोनों भाई सीता को छोड़कर सामान्य मृगया के लिए गये होंगे, यह कल्पना कोई भी समझदार कर ही नहीं सकता है। उसी हालत में उन्हें रावण ले गया । "चरन्तीं विजने वने" का यही सरल अर्थ है। विरोधी राक्षसों से आकीर्ण उस घोर वन में अकेले सीता के टहलने का प्रश्न ही नहीं उठ सकता था। चर धातु के गति और भक्षण दोनों अर्थ हैं। गति के अर्थ ज्ञान और गमन दोनों ही हैं। प्रतीक्षा भी ज्ञान ही है। अतः वन में राम की प्रतीक्षा करती हुई सीता को रावण ले गया था। रामचरित में रामायण मुख्य प्रमाण है, अतः पुराण के आधार पर रामायण के किसी अंश का अपमान या अपलाप नहीं किया जा सकता। अपितु रामायण के अनुसार पुराण का ही अर्थ निर्णय करना उचित है। ४९१ वें अनु० में "महाभारत के रामोपाख्यान में सीता-हरण के समय रावण के रथ का निर्देश नहीं मिलता। वाल्मीकिरामायण के एक स्थल से भी यह आभास मिलता है कि संभवतः मूल कथा में रथ का उल्लेख नहीं था। किष्किन्धाकाण्ड में सम्पाति अपने पुत्र सुपार्श्व का वृत्तान्त हनुमान् आदि वानरों को सुनाता है कि सुपार्श्व महेन्द्र की घाटी को रोकते हुए पहरा दे रहा था ( वा० रा० ४।४९।१२ ) । उसने देखा कि कोई एक सुन्दर स्त्री को लिये जा रहा है। सुपार्श्व ने उन दोनों को अपने पिता के भोजन के लिए ले जाने का निश्चय किया था, किन्तु उसने विनीत भाव से मार्ग माँगा। सुपार्श्व ने उसे जाने दिया ( श्लोक १४, १५) ।" वस्तुतः सर्वतोऽभिशङ्की प्राणी को भोजन-पान में भी विष की शङ्का बनी ही रहती है। विशेषतः जिन लोगों के यहाँ सर्वत्र झूठ का ही बोलबाला हो, वे लोग कभी यह विश्वास ही नहीं कर सकते कि ऋषि-महर्षि लोग झूठ नहीं बोलते थे। आर्ष ग्रन्थ तत्तत् देवताओं का वाङ्मयस्वरूप ही होता है। उसमें से कुछ अंशों को निकालना वाङ्मयस्वरूप का अङ्ग-विच्छेद करना है। नवीन वस्तु डाल देना कण्टक चुभाने के तुल्य है। बुल्के इतने दोष-दृष्टि-परायण हैं कि उन्हें सर्वत्र क्षेपक ही क्षेपक दिखायी देते हैं। अन्यथा ( वा० रा० ३।४९।२० ) में स्पष्ट कहा गया है कि रावण ने सीता को रथ में चढ़ाया— "अङ्केनादाय वैदेहीं रथमारोपयत्तदा ।" तथा सर्ग ५१ में भी स्पष्ट कहा गया है कि जटायु ने उसके रथ को तोड़ डाला— "मणिसोपानचित्राङ्गं बभञ्ज च महारथम्" ॥१६॥ "स भग्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः" ॥१८॥ उसके धनुष, रथ, अश्व, सारथि सभी जटायु ने छिन्न-भिन्न कर दिये एवं मार दिये थे। सर्ग ५२ में यह भी स्पष्ट है कि राम और लक्ष्मण का नाम लेकर रोती हुई सीता को लेकर आकाश-मार्ग से रावण लङ्का की ओर गया— "जगामादाय चाकाशं रावणो राक्षसेश्वरः" ॥१३॥ अब ऐसी स्थिति में यदि सुपार्श्व ने बिना रथ के ही सीता को ले जाते हुए रावण को देखा तो इसमें विरोध का प्रसङ्ग ही कहाँ है ? क्योंकि रथ तो जटायु ने खत्म ही कर दिया था। पर बुल्के तो दुनिया को धोखा देने पर ही तुले हुए थे। "तत्र कश्चिन्मया दृष्टः सूर्योदयसमप्रभाम् । स्त्रियमादाय गच्छन् वै भिन्नाञ्जनचयोपमः ॥" ( वा० रा० ४।५९।१४ )

४९६ | रामायणमीमांसा | पञ्चदश

मैंने देखा कि सूर्योदय-प्रभा के तुल्य किसी स्त्री को लिये हुए अञ्जनचयतुल्य कोई पुरुष जा रहा है । अर्थात् रथ नष्ट हो जाने से रावण अन्त में विरथ ही सीता को ले जा रहा था। यही है आजकल का अन्वेषण (रिसर्च) । महाभारत का रामोपाख्यान तो वाल्मीकिरामायण के ही आधार पर संक्षिप्त संकलनमात्र है, अतः उसके आधार पर वाल्मीकिरामायण के अंशों को प्रक्षेप मानना शुद्ध अनभिज्ञता ही है । ४९२वें अनु० में कञ्चनमृग के सम्बन्ध में चर्चा की गयी है । वह अंश भी उनका अपूर्ण है । वस्तुस्थिति यह हैं कि शूर्पणखा से पहले ही अकम्पन के मुख से जनस्थान के राक्षसों का वध, राम का पराक्रम और सीता की सुन्दरता सुनकर ही रावण सीताहरण के लिए सहायतार्थ मारीच के पास गया था। परन्तु मारीच ने रावण को राम का पराक्रम बताकर लौटा दिया था। पश्चात् विरूपित शूर्पणखा ने जाकर खर के वध का समाचार और सीता के सौन्दर्य का वर्णन किया । रावण पुनः मारीच के पास गया । मारीच फिर उससे राम के पराक्रम का वर्णन करता है और आपबीती घटनाओं का वर्णन करता है । विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के समय राम ने एक बाण मारकर मुझे शत- योजन की दूरी पर फेंक दिया था। बाद में भी दो राक्षसों के साथ दण्डक वन जाने पर राम ने साथियों को मार दिया और मैं भयभीत होकर भाग गया और अब तपोमय जीवन बिता रहा हूँ। मारीच ने स्पष्ट कहा यदि तुम नहीं मानोगे तो लङ्का का सर्वनाश हो जायेगा । इसपर रावण मारीच को वध की धमकी देता है । मारीच ने सोचा कि मैं किसी प्रकार बच नहीं सकता । वह रावण से स्पष्ट कहता है, राम दर्शनमात्र से मुझे मार कर अन्त में बन्धुबान्धव सहित तुम्हारा भी वध करेंगे । मैं राम के हाथों मरकर अवश्य कृतकृत्य होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाऊँगा— “अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः ।” ( वा० रा० ३।४१।१७ ) मारीच की स्वीकृति के बाद रावण उसे रथ पर बैठा कर जनस्थान की ओर प्रस्थान करता है । वहाँ पहुँच कर मारीच नाना मणियों से जटिल कनकम्ग का रूप धारण करता है । उधर सीता का ध्यान जाता है । वह राम और लक्ष्मण को बुलाकर कनकम्ग दिखाती हैं और उसे पाने के लिए अनुरोध करती हैं। सीता को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर राम कनकम्ग का शिकार करने जाते हैं। मारीच राम को दूर ले जाता है । अन्त में राम-बाण से आहत होकर अपना रूप धारण करता है तथा पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार राम-वाणी का अनुकरण करता हुआ हा सीता, हा लक्ष्मण कहकर महानाद करता है । राम उस मृत मायामारीच को छोड़कर आशङ्का करते हुए लौटते हैं । सीता मारीच की पुकार सुनकर लक्ष्मण से अनुरोध करती हैं कि वे भाई की सहायता के लिए शीघ्र जायें । लक्ष्मण पहले अस्वीकार करते हैं, किन्तु सीता के कटु शब्द सुनकर चले जाते हैं । रावण ब्राह्मणरूप में सीता के पास आता है । वे उसे आतिथ्य के लिए निमन्त्रित करती हैं । रावण सीता को अपना परिचय देकर उनके सामने लङ्का की महारानी बनने का प्रस्ताव रखता है । सीता का कटु उत्तर सुनकर रावण राक्षसरूप में प्रकट होकर उन्हें रथ में बैठाकर लङ्का की ओर चल देता है । सीताहरण का यही रूप देश-विदेशों की सभी रामकथाओं में प्रचलित है । किन्तु दामोदर के महानाटक ( ३।३७ ) के अनुसार राम और लक्ष्मण दोनों ही कनकम्ग शिकार के लिए जाते हैं । उदात्तराघव के अनुसार लक्ष्मण कनकम्ग के वधार्थ जाते हैं । रावण कुलपति के रूप में राम और सीता के पास आता है तथा राम की निन्दा करता है, क्योंकि उन्होंने लक्ष्मण को भेज दिया है । उसी समय एक छद्मवेषी राक्षस आकर समाचार देता है कि कनकम्ग राक्षस बनकर लक्ष्मण को ले जा रहा हैं । इसपर राम सीता को रावण की रक्षा में छोड़कर लक्ष्मण की सहायता करने जाते हैं । सेरीराम के अनुसार सीताहरण के पहले शक्ति प्राप्त करने के लिए राम यज्ञ करते हैं । उस समय गागक- नासिर नामक राक्षस काक बनकर यज्ञ-भङ्ग करने आता है । राम द्वारा उसका वध किया जाता है । तब रावण

अध्याय अरण्यकाण्ड ४९७ गागकनासिर के दो पुत्रों को मृग का रूप धारण करने का आदेश देता है एक सुवर्ण और एक रजत । ४९२ वें अनु० में ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा अपनी दो पुत्रियों के साथ लङ्का तथा किष्किन्धा की सीमा की रखवाली करती है। किसी दिन राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर उनपर आक्रमण करती है। लक्ष्मण उन दोनों का वध करते हैं तथा राम शूर्पणखा को हटने के लिए विवश करते हैं। शूर्पणखा लङ्का जाती है और स्वयं कनकम्ग बनकर सीताहरण में सहायता करती है। राम कनकम्पूग का शिकार करने जाते हैं। लक्ष्मण राम की पुकार सुनकर राम को जोखिम में समझ कर सीता को नङ्गथो रानी (पृथ्वी) को सौंप कर उस ओर चले जाते हैं। रावण सीता को ले जाने का प्रयास करता है। किन्तु पृथ्वी सीता को पैर पकड़ कर रोक लेती है। रावण का कुछ वश नहीं चलता है। राम लक्ष्मण को देखकर सीता के सम्बन्ध में चिन्ता प्रकट करते हैं। लक्ष्मण आश्वासन देते हैं कि पृथिवी रक्षा करेगी। मैं पृथिवी पर विश्वास नहीं करता, राम के इन शब्दों को जानकर पृथिवी सीता को छोड़ देती है और रावण सीता को लङ्का ले जाता है। वस्तुतः भारतीय परम्पराओं एवं वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने से यह कथा विश्वसनीय नहीं है। ४९४ वें अनु० में और परिवर्तन दिखाया गया है। राम और लक्ष्मण के चले जाने पर रावण आकर सीता को विश्वास दिलाता है कि अब अयोध्या जाना है। इसपर विश्वास करके सीता स्वयं रथ पर चढ़ती हैं। कथा का यह रूप नृसिंहपुराण (अध्याय ४९) में कहा गया है। संन्यासी के रूप में रावण कहता है, भरत आ गये हैं। आपको लेने के लिए मुझे भेजा है। राम भी मृग को फँसाकर अयोध्या जा रहे हैं। यह सुनकर सीता विमान में चढ़ जाती हैं। बृहद्धर्मपुराण के अनुसार रावण कहता है, कौशल्या आपको देखने को उत्सुक हैं (पूर्वखण्ड अध्याय १९) । दक्षिण भारत के (१६०९ ई० के) एक वृत्तान्त के अनुसार रावण एक ऋषि के वेष में रथ के साथ सीता के पास आता है। अयोध्या के नागरिकों के रूप में राक्षस उसमें बैठे हैं। रावण ने कहा- हम भरत की ओर से आये हैं। राम का राज्याभिषेक होनेवाला है। राम ने स्वयं अयोध्या के लिए प्रस्थान किया है। आश्चर्यचूड़ामणि के अनुसार लक्ष्मण के जाने के बाद रावण और उसके सारथि ने क्रमशः राम और लक्ष्मण का रूप धारण किया था। सारथि (लक्ष्मण) राम (रावण) से कहता है कि भरत का राज्य सङ्कट में है। उनकी सहायता के लिए यह रथ तपस्वियों ने भेजा है। तीनों रथ पर चढ़कर चले जाते हैं। शूर्पणखा सीता के रूप में राम के साथ बातचीत करती है। गुणभद्रकृत जैन उत्तरपुराण के अनुसार वनवास नहीं है। नगर के समीपस्थ चित्रकूट नामक उपवन से सीताहरण होता है। इसमें लक्ष्मण का उल्लेख नहीं है। मृग के लिए राम के जाने पर रावण राम के रूप में सीता के पास आकर कहता है मैंने मृग को फँसा कर बनारस भेजा है। अब घर जाने का समय आ गया है। यह सुनकर सीता पुष्पक पर बैठ जाती है। धोखा देने के लिए पुष्पक पालकी बन जाता है। स्पष्टतः इन कथाओं का तात्पर्य अद्भुतता लाने और रावणस्पर्श के बिना ही सीता का लङ्कागमन दिखाना ही है। जैसे 'विषं भुङ्क्ष्व' इस वाक्य का विषभक्षण इस वाच्यार्थ में तात्पर्य नहीं है, किन्तु शत्रुगृहभोजननिवृत्ति इस लक्ष्यार्थ में ही है, वैसे ही वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध अपने वाच्यार्थ में उक्त कथाओं का तात्पर्य न होकर सीता की रावणस्पर्शरहितता और अद्भुतरसाभिव्यक्ति में ही है, क्योंकि भारतीय परम्परा के अनुसार जिन किन्हीं अपरिचित महात्माओं एवं ऋषियों के वचनों में भी इतना विश्वास करना निषिद्ध है "न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।" अविश्वस्त में विश्वास नहीं करना चाहिये। विश्वस्त में भी अतिविश्वास करना सर्वथा असङ्गत है। उक्त कथाओं में उत्तरोत्तर जोड़ लगाया गया है। अन्त में राम और लक्ष्मण के रूप में ही रावण और उसके सारथि को चित्रित किया गया है। भरत के आने पर भी वसिष्ठ आदि के प्रयास करने पर भी जो राम पिता के आज्ञानुसार अवध नहीं गये वे कैसे अयोध्या जाने को तैयार हो जायेंगे, सीता विश्वास कैसे करती। इसके अतिरिक्त सीता जैसी पतिव्रता जो हनुमान् के लिए अग्नि को शीतल बना सकी थीं उनके सामने रावण का कृत्रिम रामस्वरूप कैसे टिक सकता था। ६३

४९८ रामायणमीमांसा पञ्चदश भासकृत प्रतिमानाटक के अनुसार दशरथ के वार्षिक श्राद्ध के लिए सीता और राम विचार कर रहे थे, उसी समय परिव्राजक के रूप में रावण आता है और वह परिचय देकर विभिन्न शास्त्रों के सम्बन्ध में अपनी जानकारी बताता है। इसमें प्राचेतसश्राद्धकल्प की बात करता है। राम श्राद्ध के सम्बन्ध में जिज्ञासा प्रकट करते हैं। तब वह कहता है। हिमालय के काञ्चनपार्श्व मृग से पितर विशेषरूप से प्रसन्न होते हैं। उसी क्षण मारीच वैसा मृग बनकर दिखायी देता है। लक्ष्मण उस समय आश्रम के कुलपति का स्वागत करते थे। अतः सीता को रावण के पास छोड़कर राम मृग के पीछे चले जाते हैं। तब रावण अपना रूप धारण कर सीता को लङ्का ले जाता है। इसमें भी अद्भुतता एवं नवीनता लाना ही उद्देश्य है। वाल्मीकिरामायण के ऐतिहासिक तथ्य के अपलाप में तात्पर्य नहीं है, क्योंकि अपरिचित शास्त्रज्ञ के सन्निधान से भी सीता को छोड़ना सम्भव नहीं था। इसी प्रकार कृत्यारावण में शूर्पणखा गौतमी तपस्विनी का रूप धारण कर सीता को दूर ले जाती है। फिर वही सीता के रूप में लक्ष्मण के पास आकर कटु शब्दों में राम की सहायता के लिए जाने को बाध्य करती है (अङ्क १)। इतने में रावण सीता के समीप आकर उन्हें यह कहकर पुष्पक पर चढ़ने को बाध्य कर देता है—यदि तुम स्वेच्छा से पुष्पक पर नहीं चढ़ोगी तो मैं आश्रम के सभी तपस्वियों का सिर काट दूँगा (अङ्क २)। बुल्के यहाँ स्वयं ही मानते हैं कि इस कथानक का सीता को लक्ष्मण पर कटु अभियोग लगाने के दोष से बचाना ही उद्देश्य है। एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार रावण स्वयं ही दो सिरवाले मृग का रूप धारण कर लेता है। सीता उसके चर्म के प्रति स्पृहा प्रकट करती है। राम उसके पीछे जाकर उसे मारते हैं। उसी क्षण रावण का जीव एक साधु के शरीर में प्रविष्ट होकर पर्णशाला के पास आकर लक्ष्मण से कहता है। तुम्हारा भाई वैरिर्यों से घिरा हुआ है। उसकी सहायता करने जाओ। सीता के अनुरोध से लक्ष्मण जाते हैं। रावण सीता को लेकर लङ्का की ओर प्रस्थान करता है। किसी की आँखों देखी घटनाओं की भी यथार्थता में मतभेद हो जाता है। वर्तमान काल में युद्धों के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों के मतभेद इसके सुन्दर उदाहरण हैं। इसी लिए वास्तविक इतिहास संवाद-दाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टरों पर निर्भर नहीं हो सकते। अतएव वाल्मीकिरामायण के आरम्भ में ही स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ब्रह्मा के आदेशानुसार महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजा प्रज्ञा प्राप्त कर उस दिव्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण घटनाओं का अपरोक्ष साक्षात्कार कर के ही वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ लिखा है। ऐसी स्थिति में वाल्मीकि- रामायण के विरुद्ध ऐसी सभी कल्पनाएँ गौणार्थ ही समझी जानी चाहिये। राम की सहायता के लिए जाते समय लक्ष्मण सीता की सहायता के लिए कुटी के चारों ओर धनुष से रेखा खींचते हैं और देवताओं की शपथ लेकर कहते हैं कि जो इसके भीतर घुसेगा उसका सिर फट जायेगा। बाद में छद्मवेषी रावण के अनुरोध से सीता उसे भोजन देने के लिए हाथ रेखा के बाहर बढ़ाती हैं और रावण उन्हें खींच लेता है। यह कथा आनन्दरामायण (१।७।९८), भावार्थरामायण (३।१५), सूरसागर (नवाँ स्कन्ध, पद ५०३ नागरीप्रचारिणी सभा संस्करण), रामचरितमानस (६।३६।२), असमिया गीतिरामायण, रामचन्द्रिका (१२-१८), खोतानीरामायण, सेरीराम, हिकायत महाराज रावण तथा पाश्चात्य वृत्तान्त (नं० १३) में पायी जाती है। एक पाश्चात्य वृत्तान्त के अनुसार जब रावण रेखा पार करना चाहता था तब अग्नि की लपटें उठकर उसे भीतर घुसने से रोक देती थीं। मधुसूदन सम्पादित महानाटक (३।६९-७२) में रावण सीता को तुलसी देना चाहता है। किन्तु सीता रेखा उल्लङ्घन अस्वीकार करती हैं। पर रावण रेखा पार कर सीता को ले जाता है। तत्त्वसंग्रह- रामायण (३।१५) में सीता अपने पति के कुशल-क्षेम के सम्बन्ध में चिन्तित हैं। किन्तु रावण उनकी हस्तरेखा देखकर ही उत्तर देने की प्रतिज्ञा करता है। अवध में प्रचलित कथा के अनुसार रावण कहता है, मैं बँधी भिक्षा नहीं ले सकता। बाहर आकर दो तभी भिक्षा लूँगा। बिर्होर नामक आदिवासियों के अनुसार लक्ष्मण जाने के पहले सीता

को अभिमन्त्रित राई देते हैं। यदि कोई आये तो राई फेंक देना। जितने दाने फेंके जायँगे उतने ही घण्टे तक वह मूच्छित रहेगा। रावण के आने पर सीता ने एक दाना फेंका, वह मूच्छित हो गया। पुनः मूच्छित होने के बाद रावण ने कहा इतना कष्ट क्यों देती हो। सब दाने एक साथ फेंक दो जिससे मर जाऊँ। सीता ने वैसा ही किया। वह भस्मीभूत हो गया। लेकिन भस्म से उठकर रावण सीता के बालों को पकड़ कर उनको ले गया। बुल्के कहते हैं कि रामभक्ति की प्रेरणा से लिखित परवर्ती रामसाहित्य में मारीच को सायुज्य मुक्ति प्राप्ति का उल्लेख है। वस्तुतः यह राम-भक्ति की प्रेरणा से लिखित रामसाहित्य के उल्लेखानुसार नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति यही थी। श्रीभागवत आदि में स्पष्ट ही है कि निरावरण ब्रह्मस्वरूप राम एवं कृष्ण के साथ द्वेष करनेवाले चैद्य आदि भी मुक्ति के भागी हुए थे। फिर मारीच को भी वैसी गति होनी स्वाभाविक ही थी। अध्यात्मरामायण ( ३।७।२० ) तथा देवीभागवत ( ९।१६।४० ) के अनुसार वह वैकुण्ठ के द्वारपालों का किङ्कर था। मरने पर वहीं लौट गया। जटायु से किसी तरह बचकर रावण सीता को ले जा रहा था। सीता ने अपना उत्तरीय और अपने कुछ आभूषण सुग्रीव आदि बन्दरों के मध्य में डाल दिये थे ( वा० रा० ३।५४।१,२ ) । लङ्का पहुँचकर रावण ने सीता को अन्तःपुर में रखकर राक्षसियों की रक्षा में छोड़ दिया और राम का पता लेने एवं मारने के लिए आठ गुप्तचरों को भेज दिया। रावण ने सीता को लङ्का का वैभव दिखलाया। उन्हें अडिग देखकर अशोकवाटिका में एक वर्ष का समय देकर भेज दिया। काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण सीता को एक वाटिका में रखकर उनकी रक्षा का भार मन्दोदरी पर छोड़ता है। मन्दोदरी अपनी पुत्री को पहचानती है। सीता अपना वृत्तान्त सुनाती है। दोनों रोती हैं। पउमचरियं के अनुसार सीता को पहले देव- रमण उद्यान में और बाद में समन्तकुसुम उद्यान में रखा गया था। गुणभद्र के अनुसार सीता को नन्दनवन (६८।३०७) में रखा गया था। पाश्चात्य वृत्तान्त न० १ के अनुसार सीता चारों ओर अग्नि से घिरी हुई थी। इसी कारण रावण सीता को महल में नहीं रख सकता था। बुल्के कहते हैं परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति रावण के व्यवहारों के लिए कई मार्ग अपनाये गये हैं। एक के अनुसार रावण को शाप था कि वह अनासक्त स्त्री का कामना से स्पर्श करेगा तो उसका सिर फट जायेगा। वस्तुतः परवर्ती साहित्यों में ही नहीं, वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड ( सर्ग १३ ) में ही ब्रह्मा के शाप का स्पष्ट उल्लेख है— “अद्यप्रभृति यामन्यां बलात्कारी गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥” आज से यदि किसी अन्य नारी को बलात् स्पर्श करेगा तो तेरा मूर्धा शतधा फट जायेगा। इसी लिए रावण ने कहा मैं उसी ब्रह्मशाप से भयभीत होकर सीता को अपने शयन पर लाने के लिए बलप्रयोग नहीं करता हूँ। यह पाठ टीकाकारों को सम्मत है, अतः इसे प्रक्षेप कहना अनुचित है। उत्तरपुराण के अनुसार आकाशगामिनी शक्ति के नाश के भय से रावण पतिव्रता सीता के स्पर्श से बचता है ( ६८।२१३) । पउमचरियं के अनुसार मन्दोदरी बलप्रयोग का परामर्श देती है तो वह कहता है मेरे व्रत के कारण यह असम्भव है। उसका विरक्त परनारी स्पर्श न करने का व्रत था। बुल्के कहते हैं कि सुन्दरकाण्ड के एक प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार ब्रह्मा की आज्ञा से इन्द्र निद्रा द्वारा राक्षसों को मोहित करके सीता के पास जाकर राम के आगमन का आश्वासन देकर उन्हें क्षुधा और तृषा मिटानेवाला पायस खिलाकर चले जाते हैं, यह कथा बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वख० अ० १६ ), देवीभागवतपुराण ( ३।३० ), आनन्द- रामायण ( १।७ ), कृत्तिवासरामायण ( ३।२३ ) आदि में भी मिलती है। बुल्के कहते हैं उपवासकृशा ( वा० रा० ५।११ ) के अनुसार वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग अवश्य प्रक्षिप्त है। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है, भले ही वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग प्रक्षिप्त हो, परन्तु देवीभागवत तथा आनन्दरामायण के अनुसार यह घटना सत्य

५०० रामायणमीमांसा पञ्चदश ही है। इसकी सत्यता में उपवासकृशा यह वचन बाधक नहीं है, क्योकि महीनों तक भोजन के बिना रहने की कल्पना की अपेक्षा यह कहीं स्वाभाविक है कि इन्द्र के द्वारा आनीत दिव्य पायस को ग्रहण कर लङ्का का फल, जल, अन्न आदि न लेकर सीता रही होंगी। स्वाभाविक रूप से अन्न, जल न लेना उपवास ही है। उससे भी कृशता होती है। लोक में अन्नादित्याग में भी उपवास पद का प्रयोग होता है। “उपवासेन शोकेन ध्यानेन च भयेन च। परिक्षीणां कृशां दीनामल्पाहारां तपोधनाम् ॥” (वा० रा० ५।१९।२० ) इसी लिए अल्पाहारा कहा गया है। अर्थात् एक बार लिये हुए पायस पर ही उनका जीवन चल रहा था। क्षीणता के और कई कारण वहीं कहे गये हैं : उपवास, शोक, चिन्ता एवं भय से सीता परिक्षीण एवं कृश थीं। मायासीता ५०१ अनु० में बुल्के कहते हैं, “वाल्मीकिरामायण में सीता-हरण का जो चित्र खींचा गया है वह बीभत्स कहा जा सकता है", परन्तु सच्ची घटना का वर्णन इतिहास में अपेक्षित होता है। रावण बाये हाथ से पद्माक्षी सीता के बालों को पकड़ कर दायें हाथ से जंघाओं को वकड़ कर रथ पर बैठाता है— “वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण च। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” ( वा० रा० ३।४९।१ ७) तिलककार के अनुसार वेदवती के अंश से दिये हुए शाप के अनुसार समूल विनाश करने की दृष्टि से सीता न तत्काल शाप से रावण को दग्ध नहीं किया। दूसरे यह भी दृष्टि थी कि ऋषियों के समक्ष राम ने राक्षसों के वध की भी प्रतिज्ञा की थी, उसकी पूर्ति अपेक्षित थी। रावण ने वाम हाथ से बालों को पकड़ कर बैठाना इसलिए भी उचित समझा था कि अनन्यपतिव्रता के स्पर्श से शाप का भी भय था— “स्ववामाङ्गासनत्वनिवारणायैवं ग्रहणमित्याहुः ।” स्ववामाङ्ग में आसन निवारण के लिए रावण ने उस प्रकार सीता का ग्रहण किया। पर फिर भी भक्ति- भावना के अनुकूल अन्य कथाकारों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया है। अतएव नृसिंहपुराण के अनुसार बिना स्पर्श किये ही सीता का रथारोहण वर्णन किया गया है। तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१५ ) में रावण पृथ्वी को खोदकर भूभाग सहित सीता को रथ पर बैठाता है। तमिलरामायण ( ३।२ ) के अनुसार एक योजन की गहराई तक पृथ्वी खोदकर पर्णशाला सहित सीता को रथ पर रखकर रावण लङ्का ले गया है। परस्त्रीस्पर्श से तुम मर जाओगे, इस शाप से डर कर उसने वैसा किया था। अध्यात्मरामायण के अनुसार— ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः । तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा ॥” ( अरण्यका० सर्ग ७ ) रावण नख से धरणी का विदारण कर, बाहु से उठाकर तथा रथ पर रखकर आकाश मार्ग से चला गया। प्रसन्नराघव में गोदावरी आदि अन्य नदियाँ सागर को सीता-हरण की कथा सुनाती हैं। सागर पूछता है— अपि नाम मम वधूटिका स्पृष्टा निशाचरेण” क्या मेरी वधूटिका ( पुत्रवधू ) का निशाचर ने स्पर्श किया था ? गोदावरी ने उत्तर दिया—'न स्पृष्टा' स्पर्श नहीं किया और कहती है, जब रावण ने सीता पर हाथ डालना चाहा तब अनसूया का दिया हुआ अङ्गराग अग्नि के रूप में सीता का आवरण बन गया। तब रावण ने वरुणमन्त्र द्वारा बादल बुलाया और उस बादल रूपी अञ्चल से ढक कर सीता को ले गया। वस्तुतस्तु मायामयी सीता का ही अपहरण रावण कर सकता था। वास्तविक सीता ने अग्नि में निवास किया था।

अध्याय अरण्यकाण्ड ५०१ यद्यपि बुल्के के अनुसार "लङ्काकाण्ड में विद्युज्जिह्न द्वारा राम का मायामय सिर दिखाया गया है (सर्ग २३)। बाद में इन्द्रजित् वानरसेना के सामने मायामयी सीता का सिर काटता है (सर्ग ८१)। इन्हीं दो कथाओं के आधार पर मायामयी सीता की कल्पना हुई होगी। इस तरह "निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम् ।" (वा० रा० ३।५४।२४)। रावण ने सीता को लङ्का में वैसे ही रखा था जैसे मय ने आसुरी माया को रखा। इसे भी इस कल्पना का आधार मान लेते हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि जब अनेक पुराणों के अनुसार वैसी ही वस्तुस्थिति थी तब कल्पना क्यों मानी जाय । इसी लिए टीकाकारों ने वाल्मीकिरामायण के उपर्युक्त पद्य से यह ध्वनि निकाली है कि वस्तुतः लङ्का में आगता सीता मायामयी ही थी । "मायामिवासुरीमित्यनेन मायारूपवेषा सीता लङ्कामागतेति ध्वनितम् ।" ( तिलक ) । वास्तविक सीता अग्नि में निवास कर रही थीं । अग्निपरीक्षा के अवसर पर अग्नि ने सीता की रक्षा करके उनके पातिव्रत्य का साक्ष्य देकर उन्हें राम को प्रदान किया था। इसे भी कल्पनामात्र मानना निर्मूल है। देवीभागवत (३।२९) के अनुसार रावण का प्रस्ताव सुनकर सीता गार्हपत्य अग्नि की ओर शरण के लिए जाती है तथा अद्भुतरामायण के अनुसार भी वास्तविक सीता का हरण न होकर काल्पनिक सीता का ही हरण हुआ था। "तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् । विश्वं यथेद्माभाति तथेयं प्रतिभाति मे ॥ (सर्ग १६।३) द्विपदरामायण (३।१८) में लक्ष्मण सीता को अग्नि के लिए सौंप कर जाते हैं। कूर्मपुराण के अनुसार रावण को देखकर सीता ने अग्नि की शरण ग्रहण की। बुल्के के अनुसार यह पुराण ९ वीं शती का है। परन्तु यह उनकी धारणा गलत है। प्रायः पाश्चात्य लेखकों को एक व्यापक भयंकर रोग होता हैं कि वे प्राचीन से प्राचीन वेदादि शास्त्रों को भी ईसा के आसपास ही रखना चाहते हैं । वेदव्यास ही इन पुराणों के निर्माता हैं। उनका काल ईसा से ३६ सौ वर्ष पूर्व है। पुराण भी अनादिसिद्ध हैं। उनका प्रतिद्वापर आविर्भावमात्र होता है । अस्तु "जगाम शरणं वह्निमावसथ्यम् । सीतामादाय रामेष्टां पावकोऽन्तरधीयत ॥" बुल्के का अर्थ है, अग्नि ने मायासीता का निर्माण कर वास्तविक सीता को ग्रहण कर उसको छिपा दिया, परन्तु यह अशुद्ध अर्थ है। व्याकरण के अनुसार इसका अर्थ यह है कि माया सीता रचकर राम की इष्टा प्रिया सीता को लेकर पावक स्वयं अन्तर्हित हो गया। इससे यह भी स्पष्ट है कि मायामयी सीता को रावण लङ्का ले गया। रावणवध के बाद राम ने मायासीता पर शङ्काएं की फलस्वरूप वह अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। तब अग्नि ने वास्तविक सीता प्रकट की और राम ने उन्हें स्वीकार किया । "गृहाण चैतां विमलां जानकीं वचनान्मम । पश्य नारायणं देवं स्वात्मानं प्रभवाप्ययम् ॥"१ ब्रह्मवैवर्त्त के अनुसार सीताहरण के पूर्व ही अग्निदेव ब्राह्मण के वेष में आकर कहते हैं, सीताहरण का समय आ गया है। सीता को मुझ में रखकर उसकी छाया अपने पास रखो । अग्निपरीक्षा के अवसर पर सीता को पुनः लौटा दूँगा। राम ने वैसा ही किया। अग्निपरीक्षा के समय वास्तविक सीता राम को समर्पण कर देने के बाद छायासीता ने पूछा कि मैं क्या करूँ ? तब अग्नि ने उन्हें पुष्कर भेज दिया। वहाँ उन्होंने तीन लाख वर्ष तप करके लक्ष्मीपद प्राप्त कर लिया। देवीभागवत में भी अग्निदेव राम के पास जाकर उनको छायासीता देते हैं। ब्रह्मवैवर्त्त (प्रकृतिखण्ड अ० १४), देवीभागवत (९।१६) तथा अध्यात्मरामायण में ये ही सब बातें रूपान्तर से कही हैं। १. कूर्मपुराण उत्तर विभाग अध्याय ३४; कलकत्ता संस्करण पृ० ६९२ ।

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५०२ रामायणमीमांसा पञ्चदश "मायासीतां बहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ।” ( युद्धकाण्ड सर्ग १२ ) मायासीता अग्नि में प्रवेश करती हैं तथा अग्निदेव राम को वास्तविक सीता प्रदान करते हैं (सर्ग १३) । उपर्युक्त प्रमाणों को बुल्के केवल कल्पनामात्र मानते हैं । परन्तु भारतीय आस्तिक समाज की दृष्टि में पुराण परम प्रमाण हैं । श्रीतुलसीदासजी ने भी अपने मानस में इसका उल्लेख किया है— "जौ लगि करौं निशाचर नासा । तुम पावक मँह करहु निवासा ।” (रा० मा० ३।२३।१) भावार्थरामायण ( ३।१६ ) के अनुसार देवताओं को आशङ्का थी कि सीता-स्पर्श करने से रावण भस्म हो जायेगा, किन्तु सभी राक्षसों के विनाश के लिए उसका भस्म हो जाना ठीक न होगा, अतः देवताओं के हितार्थ सीता अपनी छाया को लेकर प्रेषित करती है । बलरामदासरामायण ( उत्तरखण्ड ) के अनुसार नारद की शिक्षा से सीता ने वैसा किया । धर्मखण्ड ( अ० १३ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१३ ) नारद के परामर्श से राम ने माया- सीता का निर्माण करके मृत्युदेवी से कहा कि वे सीता के रूप में लङ्का में प्रवेश करें और वास्तविक सीता को राम ने अपने वक्षस्थल में रख लिया । लङ्कायुद्ध के पहले सीता अपनी माता पृथ्वी की शरण में चली गयीं । आनन्दरामायण के अनुसार सीता रजोलूप से अग्नि में, सत्त्वरूप से राम के समीप और तमोरूप से रावण के मोहनार्थ वन में रहीं । "सीते त्वं त्रिविधा भूत्वा रजोलूपा वसानले । वामाङ्गे मे सत्त्वरूपा वस च्छाया तमोगयी ॥ पञ्चवट्यां दशास्यस्य मोहनार्थं वसात्र वै ॥” ( आ० रा० ७।६७, ६८ ) ५०८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं यूनानी होमर के काव्य में हेलेन पतिता बनकर अपने अपहर्त्ता पेरिस के साथ स्वेच्छा से भाग निकलती है और युद्ध के बाद अपने पति मेनेलोस को पुनः प्राप्त होती है। यूनानी धार्मिक विकास में वही हेलेन बाद में देवी मानी गयी । फलस्वरूप भक्तों ने होमर का वृत्तान्त, इष्ट देवी की मर्यादा के प्रति- कूल समझकर, इस तरह बदल दिया कि पेरिस हेलेन की एक छाया ( एडोलोन मायामयी मूर्ति, छाया ) अपने साथ ले जाता है । इसी तरह भक्ति भावना ने दोनों देशों में एक ही उपाय का सहारा लिया है। परन्तु इन दोनों कथाओं में परस्पर प्रभाव मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। दोनों कथाओं का स्वतन्त्ररूप से विकास हुआ है। यह है बुल्के का हृदय । फिर भी जो लोग उन्हें रामायणभक्त समझते हैं उनकी बुद्धि पर तरस आना चाहिये । परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि किसी बाह्य अंश की समानता से वस्तु का अपलाप नहीं किया जा सकता है । आज देश-विदेशों में सैकड़ों कुमारियों से अवैध सन्तानें पैदा होती हैं । फिर भी यीशू क्राइष्ट की मां कुमारी मेरी को ईसाई वैसा ही नहीं मानते। पुराण तो होमर काव्य से प्राचीन हैं, अतः होमर काव्य में पुराणप्रसिद्ध मायासीता के अनुसार पर हेलन की मायामयी मूर्ति की चर्चा की गयी होगी । फिर वहाँ हेलन के स्वेच्छा से भाग निकलने के कारण दोनों में आकाश पाताल का अन्तर है । वस्तुतः जैसा कमल के पराग, मकरन्द, किञ्जल्क आदि का विश्लेषण कार्य बन्दर के हाथों में देना खतरनाक है । वैदिक संस्कृति-संस्कारों से शून्य पाश्चात्यों के द्वारा भारतीय आर्ष ग्रन्थों का विश्लेषण भी वैसा ही होता है । पुराणों ने ठीक ही कहा है कि अल्पश्रुत से वेद डरता है। यह अवश्य अर्थ का अनर्थ कर के वेद पर प्रहार करेगा । "बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ( म० भा० १।१।२६८ )

इसी तरह वेद, रामायण, महाभारत तथा पुराणों का स्वरूप और प्रामाण्य न समझनेवाले पाश्चात्य रामायण आदि के सम्बन्ध में भी अर्थ का अनर्थ करते हैं। वस्तुतः पूर्वोत्तर-मीमांसाओं तथा अन्य दर्शनों में वेदों की अपौरुषेयता, अनादिता एवं स्वतःप्रामाण्य पर पूर्णरूप से विचार किया गया है। रामायण, महाभारत तथा पुराण आदि आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों का भी प्रामाण्य कहा गया है। उस दृष्टि से वेदों, इतिहासों और पुराणों का समन्वय करके निर्धारित अर्थ ही वेदार्थ या पुराणार्थ होता है। अन्यथा तो रामायण एवं तथाकथित आदिरामायण का भी प्रामाण्य कैसे होगा ? सर्वत्र अनास्था होने से सीता और राम नाम की कोई वस्तु भी सिद्ध न हो सकेगी। यही स्थिति ईसाई, मोहमडन आदि के ग्रन्थों की भी होगी। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार यह निश्चित है कि धर्मग्लानि और अधर्माभ्युत्थान के निवारणार्थ धर्म-संस्थापनार्थ, विशेषतः अमलात्मा परमहंस महा- मुनीन्द्रों के लिए भक्तियोग विधानार्थ परब्रह्म का ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि के रूप में आविर्भाव होता है। "एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा" के अनुसार एक ही दिव्य ब्रह्मज्योति सीता-राम के रूप में व्यक्त होती है। जल और तरङ्ग, सूर्य और प्रभा, चन्द्र और चन्द्रिका तथा अमृत और मधुरता के तुल्य आनन्दसिन्धु एवं उसका माधुर्यसारसर्वस्व अभिन्न ही वस्तु है। इस दृष्टि से जलतरङ्ग एवं अमृत-माधुर्य के समान ही उनका विरह (विश्लेष) भी असम्भव है। इस दृष्टि से सीता-राम का वियोग असम्भव ही है। लक्ष्मीरूप से सीता सदा राम के वक्षःस्थल पर श्रीचिह्न के रूप में विराजमान हैं। व्यावहारिकरूप में एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम के रूप में व्यक्त है। लङ्कागमन आदि कार्यार्थ मायासीता की कल्पना स्वाभाविक ही है। जैसे वाल्मीकिरामायण के द्वारा सीता-राम का आविर्भाव उक्त है वैसे ही पुराणों द्वारा मायासीता का लङ्कागमन तथा वनवास आदि भी उक्त है। बुल्के की दृष्टि में वाल्मीकि- रामायण भी मिलावट से रहित नहीं है। इतना ही क्यों पाश्चात्यों ने तो वेदों में भी मिलावट की कल्पना की है, पर उनकी ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण ही हैं।

षोडश अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०९वें अनु० में किष्किन्धाकाण्ड की कथावस्तु का विश्लेषण किया गया है। राम द्वारा हनुमान् की शुद्ध भाषा और व्याकरण का अध्ययन दाक्षिणात्य पाठ में है, अन्य दो पाठों में नहीं है (वा० स० ४।३।२८-३८)। वालि- वध के पश्चात् सुग्रीव का पश्चात्ताप तथा राम द्वारा तारा को सान्त्वना प्रदान (सर्ग २४), प्रस्त्रवण गिरि का वर्णन, वर्षा-ऋतु का त्रिष्टुप् छन्द में वर्णन, तारा और लक्ष्मण का संवाद, लक्ष्मण को क्रुद्ध देखकर उनको शान्त करने के लिए सुग्रीव द्वारा तारा को भेजना। इसके अतिरिक्त दाक्षिणात्य पाठ २१वाँ तथा ३९वां सर्ग पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता। उक्त दोनों सर्ग गौड़ीय पाठ में विद्यमान हैं। भारतीय परम्परा में शाखाभेद से वेदों के पाठ-भेद के समान वाल्मीकिरामायण, सप्तशती आदि के भी सभी पाठ-भेद प्रामाणिक ही हैं। परन्तु बुल्के इसी कारण प्रक्षेप सिद्ध करने का भी प्रयत्न करते हैं। राम के प्रति तारा का यह शाप कि सीता थोड़े समय तक आपके पास रहकर भूतल में प्रवेश करेंगी। सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व को बुलाना जो अङ्गद को अपनी पीठ पर समुद्र के उस पार ले जाने का प्रस्ताव करता है। केसरी द्वारा दिग्गज धवल का वध, जिसके लिए उसने वरस्वरूप मरुत्-विक्रम पुत्र हनुमान् को प्राप्त किया था। उक्त वृत्तान्त गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में मिलते हैं, दाक्षिणात्य पाठ में नहीं मिलते तथापि सिद्धान्तदृष्टि से समन्वित अर्थ का ग्रहण करना उचित है। ५११वें अनु० में बुल्के कहते हैं वालिवध के दोष से राम को बचाने का मार्ग अपनाया गया है। सर्ग १७ और १८ प्रक्षेप हैं। इस अंश का खण्डन पीछे किया जा चुका है। वस्तुतः ये सर्ग प्रक्षिप्त नहीं हैं। दिग्वर्णन को भी वे प्रक्षिप्त मानते हैं: हेतु यह देते हैं कि महाभारत के रामोपाख्यान में इसका वर्णन नहीं है। सर्ग ४५ में सभी दिशाओं में वानरों का प्रस्थान वर्णित है। परन्तु उनका यह सब कथन निस्सार है। महाभारत का रामोपाख्यान कसौटी नहीं है। वह तो वाल्मीकिरामायण का संक्षेप माना गया है। भारतीय शास्त्रों में संक्षेप और विस्तार से वर्णन की पद्धति होती है। महाभारत में भी पहले संक्षेप में वर्णन किया जाता है। पश्चात् उसी अंश का विस्तृत वर्णन होता है। बुल्के का प्रामाणिक पाठ निर्धारण भी वानरीय पङ्कज-विश्लेषण से अधिक कुछ भी नहीं है। तभी तो उनकी दृष्टि में ६०० श्लोकों में १५० प्रामाणिक ठहरते हैं। उनसे भी कोई और महामति विश्लेषण करेगा तो पाँच ही श्लोक प्रामाणिक सिद्ध होंगे। परन्तु उनकी प्रामाणिकता स्वयं में ही प्रमाणशून्य है। सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि भी याकोबी के अनुसार प्रक्षिप्त हैं, परन्तु भारतीय परम्परा में वे सभी पाठ प्रामाणिक हैं। उनका पाठानुष्ठान होता है। टीकाकारों ने उनपर टीकाएँ लिखी हैं। ऋषि निशाकर और सम्पाति की कथा को भी सर्ग ६०-६३ वे प्रक्षिप्त कहते हैं। इसमें भी अनावश्यक विस्तृत वर्णन को ही हेतु कहा गया है जो कि हेत्वाभास ही सिद्ध होता है। हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को भी वे वाल्मीकिकृत नहीं मानते हैं। ये सब कल्पनाएँ वैसी ही हैं जैसे कोई अल्पज्ञ प्राणी अपने घर में बैठा हुआ कामायनी के अंशों को अस्पष्टता के कारण प्रक्षेप कहने का साहस करे। इसी तरह किष्किन्धा के अन्य सर्गों को भी परस्पर विरोधी उल्लेखों के कारण वे प्रतिभाशाली वाल्मीकि की कृति नहीं मानते हैं। जैसे ४।२४, ७।२ तथा ५९।३ में कहा गया है कि राम अथवा वानर सीता के अपहर्ता के नाम से अनभिज्ञ हैं। परन्तु ७।१९, १७।५०, २६।१७ आदि में उनके नाम तथा उनकी राजधानी लङ्का (३५।१५) का बारम्बार उल्लेख हुआ है। सर्ग ५८ में सम्पाति का कहना कि मैंने स्त्री का अपहरण करते हुए रावण को आकाश में

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अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०५ देखा था (श्लोक १५) । किन्तु अगले सर्ग में वही फिर कहता है मैंने अपने पुत्र सुपार्श्व से सीता के अपहरण के विषय में सुना था (५९।६), अतः यह सब प्रक्षेप ही है; परन्तु यह सब कथन भी अनभिज्ञताजन्य ही है। यदि उन्होंने परम्पराप्राप्त टीकाओं को देखा होता तो उनकी भ्रान्ति दूर हो जाती । तिलककार ने "तच्च न ज्ञायते रक्षः" (४।१४) पर "विशिष्येति शेषः" कहकर उसी का समाधान किया है । अर्थात् सामान्य ज्ञान होने पर भी उसकी विशेषताएँ अज्ञात हैं। यों तो "घटमहं न जानामि" कहनेवाला भी सामान्यरूप से घट को जानता ही है। तभी तो अज्ञान को घटविशेषण से विशेषित करता है। “न जाने निलयं तस्य सर्वथा पापरक्षसः । सामर्थ्यं विक्रमं वापि दुष्कुलेयस्य वा कुलम् ॥” (७२) इसकी भी तिलक टीका देखनी चाहिये । वस्तुतः पूर्वापरविरोध का परिहार किये बिना तो वेद, रामायण, धर्मशास्त्र किसी का भी अर्थ निश्चित न होगा । किसी भी संविधान में ऐसे पूर्वापर विरोध का परिहार करना अनिवार्य है। तिलककार के अनुसार सुग्रीव कहते हैं उस पाप करनेवाले राक्षस के निलय स्थान (गुप्तवास स्थान) को मैं नहीं जानता हूँ । बुल्के ने निलय का अर्थ केवल घर समझ लिया है, इसी लिए उन्हें ऐसी भ्रान्ति हुई है। किन्तु यहाँ निलीयतेऽस्मिन् जिसमें छिपा जाय इस विशेष अर्थ में 'निलय' शब्द का प्रयोग है। क्योंकि पाप करनेवाला राजधानी में रहना पसन्द नहीं कर सकता। साथ ही उसके सामर्थ्य, शौर्य और "विक्रमं पादविक्षेपं करोति यत्र" इस व्युत्पत्ति के अनुसार वासनगर को मैं नहीं जानता। दुष्कुलेय से यह ध्वनित होता है कि वह राक्षसकुलप्रसूत है इतना विदित है। टीकाकार आगे स्वयं लिखते हैं कि अतः हनुमान् आदि को भेजते समय सुग्रीव ने लङ्का की चर्चा करके यह कहा था कि इन्द्रतुल्य दुरात्मा रावण का वही देश है— “स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः । राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्राक्षसमद्युतेः ॥” (वा० रा० ४।४१।२५) पर इसका पूर्व से विरोध नहीं होगा, क्योंकि इतना जानतमात्र से उसका वध सम्भव नहीं है। अतः इतनी जानकारी निष्फल ही है। आज भी सामान्य ज्ञान होने पर भी संग्राम के लिए विशेष जानकारी अपेक्षित होती है। इसी लिए गुप्तचरों द्वारा शत्रु के विभिन्न रहस्यस्थानों, विशिष्ट बलों तथा शस्त्रास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जाता है। यही समाधान अन्य अंशों का भी है। (७।१९) आदि में रावण आदि के नाम का निर्देश और अज्ञान दोनों का यही समन्वय है । इसी तरह टीकाकारों ने ५८ एवं ५९ वें सर्ग के विरोधाभास का भी परिहार किया है । सर्ग ५८ वें में सम्पाति ने बताया है कि सर्वाभरणभूषिता रूपसंपन्ना तरुणी रावण द्वारा हरण की जाती हुई मैंने देखी थी। वहीं और भी कहा गया है—वह राम नाम और लक्ष्मण नाम बराबर पुकार रही थी एवं गात्रविधूनन करती हुई भूषणों को फेंक रही थी । राम नाम के कीर्तन से मैं उसे सीता समझता हूँ (वा० रा० ४।५८।१४-२३ ) । किन्तु सर्ग ५९ श्लो० ६ से अपनी बात को प्रमाणान्तर से प्रत्यायित करने के लिए उसने सुपार्श्व के द्वारा सुनी हुई कथा का वर्णन किया। उस कथा में ऋषियों ने सुपार्श्व को बताया था दाशरथि राम की पत्नी जनकात्मजा का रावण ने हरण किया है। स्वयं उसने राम राम की पुकार से उस तरुणी को राम-पत्नी समझा। परन्तु सुपार्श्व द्वारा उसे विदित हुआ कि ऋषियों ने उसे राम-पत्नी बताया है । टीकाकार ने कहा है—"प्रतिसंहृक्तान् त्यक्तप्रायो- पवेशनान् सीताश्रुतिसमाहितान् सीताविषयवृत्तान्तश्रवणे सावधानान् पुनराश्वासयन्नन्यसाक्षिकतावचनेन भूयः स्वोक्तार्थं प्रत्याययन् अर्थात् सम्पाति का वचन सुनकर वानरों ने प्रायोपवेशन त्याग दिया और सीता के वृत्तान्त का ६४

५०६ रामायणमीमांसा षोडश

श्रवण करने के लिए सावधान हो गये तब सम्पाति ने उन्हें पुनः आश्वस्त करते हुए, अपनी बातों के सम्बन्ध में अन्य की साक्षिता दिखलाते हुए स्वोक्त अर्थ में विश्वास उत्पन्न कराते हुए सुपार्श्ववर्णित वृत्तान्त सुनाया— “स हरीन् प्रतिसंमृक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान् । पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० ४।५९।५ ) इस तरह विचार करने पर यहाँ असमन्वय का प्रश्न ही नहीं है । संगति का लक्षण, उसके भेद, विरोधा- भास एवं विरोध-परिहार सम्बन्धी भारतीय परम्परा न जानने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को भारतीय शास्त्रों में पद पद पर भ्रान्ति होती है। भारतीय विचारपद्धति न समझने के कारण ही पाश्चात्य लोग वेदों में भी असंगति दिखलाने का साहस करते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है— “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।२ ) “प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।३ ) तथा “मनो ब्रह्मेति । विज्ञानं ब्रह्मेति । आनन्दो ब्रह्मेति ( तै० उ० ३।४, ५, ६ ) । इन वचनों को देखकर वे कहते हैं वैदिक बहुत शीघ्रता से अपनी कही बातों को भूल जाते हैं। पहले वायु के लिए कहा “नमस्ते वायो त्वमेव ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि” ( तै० उ० १।१ ) और फिर अन्न, प्राण आदि को कह दिया, परन्तु यह वेद का दोष नहीं उनकी शक्ति, लक्षणा आदि विविध वृत्तियों को न जानने से अनभिज्ञों को भ्रान्ति होती है । “भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ।” ( भा० पु० १०।८७।३६ ) वेदस्तुति में कहा गया है भगवन्, आपकी वेदरूप वाणी विविध वृत्तियों द्वारा उक्थजड़ों को भ्रम में डाल देती है । ५१२ वें अनु० में बुल्के किष्किन्धाकाण्ड के विकास पर विचार करते हैं । वस्तुतः विकास का भी अर्थ वही है जो उनकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं था उस अंश का विस्तार ही विकास है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव राम-लक्ष्मण को देखकर तथा उनको वाली द्वारा प्रेषित समझकर भयभीत होकर हनुमान् को उनके निकट भेजता है । हनुमान् भिक्षुरूप धारण कर राम और लक्ष्मण के पास आते हैं और अपना परिचय देकर कहते हैं कि सुग्रीव आपसे मैत्री करना चाहते हैं। राम ने सुग्रीव की सहायता करने का वचन दिया । पश्चात् हनुमान् लक्ष्मण से सीता-हरण का वृत्तान्त सुनकर सुग्रीव की सहायता का आश्वासन देते हैं। तथा अपने वानर रूप में प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को अपने कन्धे पर चढ़ाकर दोनों को पर्वत के शिखर पर सुग्रीव के पास पहुँचाते हैं ( सर्ग २-४ ) । बंगाली राम-कथाओं में “शिवरामेश्वर-युद्ध” का भी वर्णन है । लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने जाते हैं । वहाँ के द्वारपाल हनुमान् से युद्ध करते हैं । देर होने पर राम स्वयं जाते हैं । इतने में शिवजी भी आ जाते हैं। दोनों युद्ध करते हैं। अन्त में शिव राम के लिए सहायतार्थ हनुमान् को समर्पित करते हैं। हनुमान् राम के भक्त हो गये। उत्तर भारत के एकवृत्तान्त के अनुसार राम के लिए फल तोड़ते हुए लक्ष्मण रुद्रावतार हनुमान् से युद्ध करते हैं। लक्ष्मण राम के भाई हैं, यह सुनकर हनुमान् राम की शरण लेते हैं और राम तथा लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाते हैं । ( पा० वृ० नं० १३ ) । संताली राम-कथा के अनुसार हनुमान् तरबूजों की रखवाली करते हैं। लक्ष्मण उनमें से कुछ लेना चाहते हैं । जिसमें दोनों की भिड़न्त हो गयी। अन्त में हनुमान् ने दोनों को फल खिलाया । मूल ग्रन्थ का सीधा सम्बन्ध न होने से दन्तकथाओं का सम्बन्ध जुड़ जाने का ही यह परिणाम है। भावार्थरामायण के अनुसार राम की शक्ति देखने के लिए हाथ में साल वृक्ष लेकर राम और लक्ष्मण के पास पहुँचकर हनुमान् ने धमकी के साथ पूछा तुम लोग कौन हो ? राम ने बाण चलाकर हनुमान् को परास्त किया। तब हनुमान् ने वायु का सुझाव मान कर राम से क्षमा माँगी ।

अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०७ रामकियेन के अनुसार जन्म से ही हनुमान् के कानों में कुण्डल थे । आकाशवाणी में यह बताया गया था कि जो व्यक्ति बालक के इन कुण्डलों को देखेगा वही उसका स्वामी होगा (पिता होगा) । हनुमान् किसी वृक्ष पर चढ़कर फल खा रहे थे । हनुमान् ने पेड़ के नीचे लक्ष्मण की गोद में सिर रख कर सोते हुए राम को देखा । लक्ष्मण का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हनुमान् उनपर पत्ते और फल फेंकने लगे । अन्त में नीचे उतर कर लक्ष्मण से युद्ध किया । लक्ष्मण के तीन बाण छीनकर पत्तों में छिप गये । लक्ष्मण ने राम को जगाया । राम ने उस वानर के कानों में कुण्डलों को देखा और हनुमान् को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया । सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार हनुमान् राम से युद्ध करते हैं । अन्त में राम को पहचान कर उनके भक्त बन जाते हैं । रामकेर्ति (सर्ग ५) के अनुसार हनुमान् वायुपुत्र थे । रंगनाथरामायण (४।३) के अनुसार हनुमान् तपस्या द्वारा ब्रह्मा से वरदान पाते हैं और पूछते हैं कि मेरे मोक्ष और कार्यसिद्धि के लिए मेरा आराध्य कौन होगा ? ब्रह्मा ने कहा जो तुम्हारे आभूषणों को देख सकेगा वही तुम्हारा प्रभु होगा । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२।१३५) में उल्लेख है कि राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे । राम ने एक वानर देखा जो हेम के समान पिङ्गल और मणिकुण्डल पहने था । कम्बरामायण (४।२।३५) तथा बालरामदासरामायण में भी कुण्डलों की चर्चा है । भावार्थरामायण (४।१) के अनुसार अञ्जना ने हनुमान् से कहा था कि जो तुम्हारी लंगोटी देख सकेगा वहीं तुम्हारा स्वामी होगा । उसके अनुसार लंगोटी पहने ही हनुमान् का जन्म हुआ था । वस्तुतः हनुमान् की राम में अनन्यभक्ति और राम का उनके प्रति वात्सल्यभाव तथा हनुमान् की अखण्डब्रह्मचर्यनिष्ठा की अभिव्यञ्जना के लिए उक्त कथाओं का प्राकट्य है । बिहौररामकथा में हनुमान् ने अपनी माता के गर्भ से राम को पहिचान लिया था और जन्मते ही वह उनके साथ चल दिये । अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने हनुमान् को अपने विष्णुरूप का दर्शन कराया । सेरीराम के एक पाठ के अनुसार लक्ष्मण राम के लिए पानी लाये । राम ने पानी पीकर उसे (सुग्रीव के आँसुओं से) नम- कीन पाया । कारण का पता लगाने पर सुग्रीव से भेंट होती है । रामकेर्ति (सर्ग ५) में भी यहीं कथा मिलती है । सेरीराम के शेळाबेर पाठ के अनुसार लक्ष्मण द्वारा लाये गये पानी को पीकर राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर चार दिन तक सोते रहे । सुग्रीव पेड़ से लक्ष्मण का यह भ्रातृ-प्रेम देख कर रोने लगा । सुग्रीव के एक आँसू ने राम की छाती पर पड़कर उन्हें जगाया । राम ने इसे लक्ष्मण का आँसू समझकर उन्हें घर लौटने का आदेश दे दिया । इसपर लक्ष्मण की प्रार्थना से पेड़ के पत्ते छोटे हो गये तथा सुग्रीव दिखायी पड़ने लगा । तब राम-सुग्रीव की मैत्री हुई । सेरतकाण्ड तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार वाली ने सुग्रीव को दूर फेंक दिया था । वह अधमरा होकर वृक्ष की शाखाओं पर पड़ा था । राम ने उसी वृक्ष के नीचे विश्राम किया और सुग्रीव के आँसू राम पर पड़े । इन सभी कथाओं का तात्पर्य वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध ही लगा लेना उचित है । सुग्रीव अत्यन्त आर्त था । भगवान् राम के साथ सम्बन्ध होने से वह कृतार्थ हो गया । यही इन कथाओं का सार है । अनु० ५१३ में बुल्के कहते हैं आदिरामायण में वाली और सुग्रीव की जन्म-कथा नहीं थी । परन्तु यह समझना उनकी भूल है । दाक्षिणात्य बालकाण्ड (१७।१०) में वाली और सुग्रीव को क्रमशः इन्द्र एवं सूर्य का पुत्र कहा गया है । उसको प्रक्षेप कहना भी निराधार है । अन्य पाठों के अनुसार युद्धकाण्ड (सर्ग ४) में शुक रावण को उनका वृत्तान्त सुनाता है । महाभारत में प्रायः प्रत्येक पात्र के सम्बन्ध में विस्तृत कथा मिलती है । तदनुसार रामायण में भी सभी पात्रों की विस्तृत न सही प्रत्येक प्रधान पात्र का कुछ तो वर्णन उचित ही था । दाक्षिणात्य पाठ की कथा का सार यही है कि ब्रह्मा के अश्रु से ऋक्षरजा बानर की उत्पत्ति हुई । वह सरोवर में अपनी छाया को ही अपना प्रतिद्वन्द्वी समझ कर उसमें कूद पड़ता है और एक सुन्दर स्त्री हो जाता है । तब उसी समय वहाँ इन्द्र और सूर्य आते हैं और उसपर मोहित होते हैं । इन्द्र का तेज उसके बालों पर गिरा उससे वाली एवं सूर्य का तेज

५०८ रामायणमीमांसा षोडश उसकी ग्रीवा पर गिरा उससे सुग्रीव की उत्पत्ति हुई। इन्द्र ने अपने पुत्र को एक अक्षयगुणपूर्ण सुवर्णमाला दी। सूर्य ने अपने पुत्र की सेवा में हनुमान् को नियुक्त कर दिया। ऋक्षरजा पुनः अपना वानररूप पाकर अपने पुत्रों के साथ ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा ने एक देवदूत के साथ उसे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित किष्किन्धा भेज दिया। देवदूत ने ऋक्षरजा का वानरराजपद पर अभिषेक कर दिया। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७) के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्गों की कथाओं के अनुसार किसी दिन प्रजापति के वाम नेत्र में एक रजकण पड़ गया। उसे बाँये हाथ से दूर फेंकने से उसमें से एक स्त्री उत्पन्न हुई। पश्चात् सूर्य ने उसका आलिङ्गन किया और वरदान दिया कि तुम्हें एक वीर पुत्र उत्पन्न होगा। किसी समय इन्द्र भी उसे देखकर आकृष्ट हुए। उन्होंने उसको अपने हाथ से स्पर्श करके आशीर्वाद दिया कि तुमसे वाली ओर सुग्रीव दो कामरूपी यमल वानर उत्पन्न होंगे। किष्किन्धा में राज्य करेंगे। भावार्थरामायण में बताया गया है कि किसी दिन कैलास के एक सरोवर में शिवपार्वती क्रीड़ा कर रहे थे। अचानक कुछ मुनि आ गये, जिससे दोनों अन्तर्धान हो गये। पार्वती ने शाप दिया कि जो इस सरोवर में स्नान करेगा वह नारी के रूप में इससे निकलेगा। उस शाप से अनभिज्ञ होने के कारण ऋक्षरजा स्नान करके स्त्री हो गया। बलरामदासरामायण के अनुसार मदनिका अप्सरा के इन्द्र-सभा में अकस्मात् हँसने के कारण इन्द्र ने उसे शाप दिया कि तू वानरमुखी होकर मानसरोवर के निकट पृथ्वी पर निवास करेगी और कश्यप से पुत्र उत्पन्न कर मुक्ति प्राप्त करेगी, अतः मदनिका वहाँ रहने लगी। किसी दिन उर्वशी का सौन्दर्य देखकर कश्यप के तेज का पतन होता है। वह उसे जल में फेंक देते हैं। उसे पीकर मदनिका गर्भवती हो गयी। वह एक ऐसा पुत्र पैदा करती है जिसका शरीर मनुष्य का और मुख वानर का है। एक शबरी उस शिशु का पालन करती है। ब्रह्मा उसे ऋक्षपति नाम देकर आरण्य के राजपद पर अभिषिक्त करते हैं। ब्रह्मा ऋक्षपति को पार्वती-वन के पश्चिमी भाग में प्रवेश करने से मना करते हैं। किन्तु वह निषेधोल्लङ्घन करके उसमें प्रविष्ट होते ही नारी बन गया। इसका कारण यही था किसी दिन पार्वती ने अतृप्ति से वैसा शाप दिया था। अनन्तर वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही नारी भावापन्न ऋक्षपति से बाली और सुग्रीव का जन्म होता है। ब्रह्मा के आदेशानुसार वह दोनों पुत्रों को दण्डकारण्य में छोड़ देता है। गौतमपत्नी अहल्या दोनों को गौतम नदी के तटपर पाकर दोनों का धर्मपुत्र के रूप में पालन करती है। जब वे तीन वर्ष के होते हैं तब किष्किन्धा का राजा खडगद मृगया के अवसर पर गौतम से मिलकर बताता है कि अञ्जना नामक पुत्री को छोड़कर मेरे कोई सन्तान नहीं है। ऋषि वाली और सुग्रीव को राजा के हाथ में सौंप देते हैं। खडगद वाली को राजा एवं सुग्रीव को युवराज बना देते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार गरुड़ का भ्राता अरुण दो स्त्रियों को सूर्य का रथ हाँकते देखकर हँस पड़ा। सूर्य ने अरुण को रथ हाँकने के लिए कहा। अरुण ने स्वीकार कर लिया। वहीं अप्सराओं का नाच देखकर वह स्त्री बन गया। इन्द्र एवं सूर्य से उसे एक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। अरुण ने दोनों को अगस्त्य की सेवा में सौंप दिया। तपस्या में संलग्न अगस्त्य पर पानी छिड़कने से अगस्त्य के शाप से दोनों वानर बन गये। पउमचरियं की रामकथाओं के अनुसार आदिरजा तथा इन्द्रमाली की वाली, सुग्रीव तथा श्रीप्रभा तीन सन्तानें थीं। सारलादासमहाभारत वनपर्व के अनुसार गौतम अपनी पत्नी का जीव लेकर स्नानार्थ जाया करते थे। किसी दिन इन्द्र और सूर्य दोनों उस निर्जीव शरीर पर आसक्त हो गये। इन्द्र के प्रवेश से सजीव अहल्या से सूर्य का सम्बन्ध हुआ और सूर्य के प्रवेश से सजीव उसी शरीर से इन्द्र का सम्बन्ध हुआ, उससे श्यामशील और जवशील दो पुत्र उत्पन्न हुए। अञ्जना ने इसका भेद गौतम को बतला दिया था। परीक्षा लेने के लिए गौतम ने