भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 576

को अभिमन्त्रित राई देते हैं। यदि कोई आये तो राई फेंक देना। जितने दाने फेंके जायँगे उतने ही घण्टे तक वह मूच्छित रहेगा। रावण के आने पर सीता ने एक दाना फेंका, वह मूच्छित हो गया। पुनः मूच्छित होने के बाद रावण ने कहा इतना कष्ट क्यों देती हो। सब दाने एक साथ फेंक दो जिससे मर जाऊँ। सीता ने वैसा ही किया। वह भस्मीभूत हो गया। लेकिन भस्म से उठकर रावण सीता के बालों को पकड़ कर उनको ले गया। बुल्के कहते हैं कि रामभक्ति की प्रेरणा से लिखित परवर्ती रामसाहित्य में मारीच को सायुज्य मुक्ति प्राप्ति का उल्लेख है। वस्तुतः यह राम-भक्ति की प्रेरणा से लिखित रामसाहित्य के उल्लेखानुसार नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति यही थी। श्रीभागवत आदि में स्पष्ट ही है कि निरावरण ब्रह्मस्वरूप राम एवं कृष्ण के साथ द्वेष करनेवाले चैद्य आदि भी मुक्ति के भागी हुए थे। फिर मारीच को भी वैसी गति होनी स्वाभाविक ही थी। अध्यात्मरामायण ( ३।७।२० ) तथा देवीभागवत ( ९।१६।४० ) के अनुसार वह वैकुण्ठ के द्वारपालों का किङ्कर था। मरने पर वहीं लौट गया। जटायु से किसी तरह बचकर रावण सीता को ले जा रहा था। सीता ने अपना उत्तरीय और अपने कुछ आभूषण सुग्रीव आदि बन्दरों के मध्य में डाल दिये थे ( वा० रा० ३।५४।१,२ ) । लङ्का पहुँचकर रावण ने सीता को अन्तःपुर में रखकर राक्षसियों की रक्षा में छोड़ दिया और राम का पता लेने एवं मारने के लिए आठ गुप्तचरों को भेज दिया। रावण ने सीता को लङ्का का वैभव दिखलाया। उन्हें अडिग देखकर अशोकवाटिका में एक वर्ष का समय देकर भेज दिया। काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण सीता को एक वाटिका में रखकर उनकी रक्षा का भार मन्दोदरी पर छोड़ता है। मन्दोदरी अपनी पुत्री को पहचानती है। सीता अपना वृत्तान्त सुनाती है। दोनों रोती हैं। पउमचरियं के अनुसार सीता को पहले देव- रमण उद्यान में और बाद में समन्तकुसुम उद्यान में रखा गया था। गुणभद्र के अनुसार सीता को नन्दनवन (६८।३०७) में रखा गया था। पाश्चात्य वृत्तान्त न० १ के अनुसार सीता चारों ओर अग्नि से घिरी हुई थी। इसी कारण रावण सीता को महल में नहीं रख सकता था। बुल्के कहते हैं परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति रावण के व्यवहारों के लिए कई मार्ग अपनाये गये हैं। एक के अनुसार रावण को शाप था कि वह अनासक्त स्त्री का कामना से स्पर्श करेगा तो उसका सिर फट जायेगा। वस्तुतः परवर्ती साहित्यों में ही नहीं, वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड ( सर्ग १३ ) में ही ब्रह्मा के शाप का स्पष्ट उल्लेख है— “अद्यप्रभृति यामन्यां बलात्कारी गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥” आज से यदि किसी अन्य नारी को बलात् स्पर्श करेगा तो तेरा मूर्धा शतधा फट जायेगा। इसी लिए रावण ने कहा मैं उसी ब्रह्मशाप से भयभीत होकर सीता को अपने शयन पर लाने के लिए बलप्रयोग नहीं करता हूँ। यह पाठ टीकाकारों को सम्मत है, अतः इसे प्रक्षेप कहना अनुचित है। उत्तरपुराण के अनुसार आकाशगामिनी शक्ति के नाश के भय से रावण पतिव्रता सीता के स्पर्श से बचता है ( ६८।२१३) । पउमचरियं के अनुसार मन्दोदरी बलप्रयोग का परामर्श देती है तो वह कहता है मेरे व्रत के कारण यह असम्भव है। उसका विरक्त परनारी स्पर्श न करने का व्रत था। बुल्के कहते हैं कि सुन्दरकाण्ड के एक प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार ब्रह्मा की आज्ञा से इन्द्र निद्रा द्वारा राक्षसों को मोहित करके सीता के पास जाकर राम के आगमन का आश्वासन देकर उन्हें क्षुधा और तृषा मिटानेवाला पायस खिलाकर चले जाते हैं, यह कथा बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वख० अ० १६ ), देवीभागवतपुराण ( ३।३० ), आनन्द- रामायण ( १।७ ), कृत्तिवासरामायण ( ३।२३ ) आदि में भी मिलती है। बुल्के कहते हैं उपवासकृशा ( वा० रा० ५।११ ) के अनुसार वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग अवश्य प्रक्षिप्त है। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है, भले ही वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग प्रक्षिप्त हो, परन्तु देवीभागवत तथा आनन्दरामायण के अनुसार यह घटना सत्य