रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
को अभिमन्त्रित राई देते हैं। यदि कोई आये तो राई फेंक देना। जितने दाने फेंके जायँगे उतने ही घण्टे तक वह मूच्छित रहेगा। रावण के आने पर सीता ने एक दाना फेंका, वह मूच्छित हो गया। पुनः मूच्छित होने के बाद रावण ने कहा इतना कष्ट क्यों देती हो। सब दाने एक साथ फेंक दो जिससे मर जाऊँ। सीता ने वैसा ही किया। वह भस्मीभूत हो गया। लेकिन भस्म से उठकर रावण सीता के बालों को पकड़ कर उनको ले गया। बुल्के कहते हैं कि रामभक्ति की प्रेरणा से लिखित परवर्ती रामसाहित्य में मारीच को सायुज्य मुक्ति प्राप्ति का उल्लेख है। वस्तुतः यह राम-भक्ति की प्रेरणा से लिखित रामसाहित्य के उल्लेखानुसार नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति यही थी। श्रीभागवत आदि में स्पष्ट ही है कि निरावरण ब्रह्मस्वरूप राम एवं कृष्ण के साथ द्वेष करनेवाले चैद्य आदि भी मुक्ति के भागी हुए थे। फिर मारीच को भी वैसी गति होनी स्वाभाविक ही थी। अध्यात्मरामायण ( ३।७।२० ) तथा देवीभागवत ( ९।१६।४० ) के अनुसार वह वैकुण्ठ के द्वारपालों का किङ्कर था। मरने पर वहीं लौट गया। जटायु से किसी तरह बचकर रावण सीता को ले जा रहा था। सीता ने अपना उत्तरीय और अपने कुछ आभूषण सुग्रीव आदि बन्दरों के मध्य में डाल दिये थे ( वा० रा० ३।५४।१,२ ) । लङ्का पहुँचकर रावण ने सीता को अन्तःपुर में रखकर राक्षसियों की रक्षा में छोड़ दिया और राम का पता लेने एवं मारने के लिए आठ गुप्तचरों को भेज दिया। रावण ने सीता को लङ्का का वैभव दिखलाया। उन्हें अडिग देखकर अशोकवाटिका में एक वर्ष का समय देकर भेज दिया। काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण सीता को एक वाटिका में रखकर उनकी रक्षा का भार मन्दोदरी पर छोड़ता है। मन्दोदरी अपनी पुत्री को पहचानती है। सीता अपना वृत्तान्त सुनाती है। दोनों रोती हैं। पउमचरियं के अनुसार सीता को पहले देव- रमण उद्यान में और बाद में समन्तकुसुम उद्यान में रखा गया था। गुणभद्र के अनुसार सीता को नन्दनवन (६८।३०७) में रखा गया था। पाश्चात्य वृत्तान्त न० १ के अनुसार सीता चारों ओर अग्नि से घिरी हुई थी। इसी कारण रावण सीता को महल में नहीं रख सकता था। बुल्के कहते हैं परवर्ती साहित्यों में सीता के प्रति रावण के व्यवहारों के लिए कई मार्ग अपनाये गये हैं। एक के अनुसार रावण को शाप था कि वह अनासक्त स्त्री का कामना से स्पर्श करेगा तो उसका सिर फट जायेगा। वस्तुतः परवर्ती साहित्यों में ही नहीं, वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड ( सर्ग १३ ) में ही ब्रह्मा के शाप का स्पष्ट उल्लेख है— “अद्यप्रभृति यामन्यां बलात्कारी गमिष्यसि । तदा ते शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशयः ॥” आज से यदि किसी अन्य नारी को बलात् स्पर्श करेगा तो तेरा मूर्धा शतधा फट जायेगा। इसी लिए रावण ने कहा मैं उसी ब्रह्मशाप से भयभीत होकर सीता को अपने शयन पर लाने के लिए बलप्रयोग नहीं करता हूँ। यह पाठ टीकाकारों को सम्मत है, अतः इसे प्रक्षेप कहना अनुचित है। उत्तरपुराण के अनुसार आकाशगामिनी शक्ति के नाश के भय से रावण पतिव्रता सीता के स्पर्श से बचता है ( ६८।२१३) । पउमचरियं के अनुसार मन्दोदरी बलप्रयोग का परामर्श देती है तो वह कहता है मेरे व्रत के कारण यह असम्भव है। उसका विरक्त परनारी स्पर्श न करने का व्रत था। बुल्के कहते हैं कि सुन्दरकाण्ड के एक प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार ब्रह्मा की आज्ञा से इन्द्र निद्रा द्वारा राक्षसों को मोहित करके सीता के पास जाकर राम के आगमन का आश्वासन देकर उन्हें क्षुधा और तृषा मिटानेवाला पायस खिलाकर चले जाते हैं, यह कथा बृहद्धर्मपुराण ( पूर्वख० अ० १६ ), देवीभागवतपुराण ( ३।३० ), आनन्द- रामायण ( १।७ ), कृत्तिवासरामायण ( ३।२३ ) आदि में भी मिलती है। बुल्के कहते हैं उपवासकृशा ( वा० रा० ५।११ ) के अनुसार वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग अवश्य प्रक्षिप्त है। परन्तु उनका यह कथन ठीक नहीं है, भले ही वाल्मीकिरामायण में उक्त सर्ग प्रक्षिप्त हो, परन्तु देवीभागवत तथा आनन्दरामायण के अनुसार यह घटना सत्य
५०० रामायणमीमांसा पञ्चदश ही है। इसकी सत्यता में उपवासकृशा यह वचन बाधक नहीं है, क्योकि महीनों तक भोजन के बिना रहने की कल्पना की अपेक्षा यह कहीं स्वाभाविक है कि इन्द्र के द्वारा आनीत दिव्य पायस को ग्रहण कर लङ्का का फल, जल, अन्न आदि न लेकर सीता रही होंगी। स्वाभाविक रूप से अन्न, जल न लेना उपवास ही है। उससे भी कृशता होती है। लोक में अन्नादित्याग में भी उपवास पद का प्रयोग होता है। “उपवासेन शोकेन ध्यानेन च भयेन च। परिक्षीणां कृशां दीनामल्पाहारां तपोधनाम् ॥” (वा० रा० ५।१९।२० ) इसी लिए अल्पाहारा कहा गया है। अर्थात् एक बार लिये हुए पायस पर ही उनका जीवन चल रहा था। क्षीणता के और कई कारण वहीं कहे गये हैं : उपवास, शोक, चिन्ता एवं भय से सीता परिक्षीण एवं कृश थीं। मायासीता ५०१ अनु० में बुल्के कहते हैं, “वाल्मीकिरामायण में सीता-हरण का जो चित्र खींचा गया है वह बीभत्स कहा जा सकता है", परन्तु सच्ची घटना का वर्णन इतिहास में अपेक्षित होता है। रावण बाये हाथ से पद्माक्षी सीता के बालों को पकड़ कर दायें हाथ से जंघाओं को वकड़ कर रथ पर बैठाता है— “वामेन सीतां पद्माक्षीं मूर्धजेषु करेण च। ऊर्वोस्तु दक्षिणेनैव परिजग्राह पाणिना ॥” ( वा० रा० ३।४९।१ ७) तिलककार के अनुसार वेदवती के अंश से दिये हुए शाप के अनुसार समूल विनाश करने की दृष्टि से सीता न तत्काल शाप से रावण को दग्ध नहीं किया। दूसरे यह भी दृष्टि थी कि ऋषियों के समक्ष राम ने राक्षसों के वध की भी प्रतिज्ञा की थी, उसकी पूर्ति अपेक्षित थी। रावण ने वाम हाथ से बालों को पकड़ कर बैठाना इसलिए भी उचित समझा था कि अनन्यपतिव्रता के स्पर्श से शाप का भी भय था— “स्ववामाङ्गासनत्वनिवारणायैवं ग्रहणमित्याहुः ।” स्ववामाङ्ग में आसन निवारण के लिए रावण ने उस प्रकार सीता का ग्रहण किया। पर फिर भी भक्ति- भावना के अनुकूल अन्य कथाकारों ने उसे बचाने का प्रयत्न किया है। अतएव नृसिंहपुराण के अनुसार बिना स्पर्श किये ही सीता का रथारोहण वर्णन किया गया है। तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१५ ) में रावण पृथ्वी को खोदकर भूभाग सहित सीता को रथ पर बैठाता है। तमिलरामायण ( ३।२ ) के अनुसार एक योजन की गहराई तक पृथ्वी खोदकर पर्णशाला सहित सीता को रथ पर रखकर रावण लङ्का ले गया है। परस्त्रीस्पर्श से तुम मर जाओगे, इस शाप से डर कर उसने वैसा किया था। अध्यात्मरामायण के अनुसार— ततो विदार्य धरणीं नखैरुद्धृत्य बाहुभिः । तोलयित्वा रथे क्षिप्त्वा ययौ क्षिप्रं विहायसा ॥” ( अरण्यका० सर्ग ७ ) रावण नख से धरणी का विदारण कर, बाहु से उठाकर तथा रथ पर रखकर आकाश मार्ग से चला गया। प्रसन्नराघव में गोदावरी आदि अन्य नदियाँ सागर को सीता-हरण की कथा सुनाती हैं। सागर पूछता है— अपि नाम मम वधूटिका स्पृष्टा निशाचरेण” क्या मेरी वधूटिका ( पुत्रवधू ) का निशाचर ने स्पर्श किया था ? गोदावरी ने उत्तर दिया—'न स्पृष्टा' स्पर्श नहीं किया और कहती है, जब रावण ने सीता पर हाथ डालना चाहा तब अनसूया का दिया हुआ अङ्गराग अग्नि के रूप में सीता का आवरण बन गया। तब रावण ने वरुणमन्त्र द्वारा बादल बुलाया और उस बादल रूपी अञ्चल से ढक कर सीता को ले गया। वस्तुतस्तु मायामयी सीता का ही अपहरण रावण कर सकता था। वास्तविक सीता ने अग्नि में निवास किया था।
अध्याय अरण्यकाण्ड ५०१ यद्यपि बुल्के के अनुसार "लङ्काकाण्ड में विद्युज्जिह्न द्वारा राम का मायामय सिर दिखाया गया है (सर्ग २३)। बाद में इन्द्रजित् वानरसेना के सामने मायामयी सीता का सिर काटता है (सर्ग ८१)। इन्हीं दो कथाओं के आधार पर मायामयी सीता की कल्पना हुई होगी। इस तरह "निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम् ।" (वा० रा० ३।५४।२४)। रावण ने सीता को लङ्का में वैसे ही रखा था जैसे मय ने आसुरी माया को रखा। इसे भी इस कल्पना का आधार मान लेते हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि जब अनेक पुराणों के अनुसार वैसी ही वस्तुस्थिति थी तब कल्पना क्यों मानी जाय । इसी लिए टीकाकारों ने वाल्मीकिरामायण के उपर्युक्त पद्य से यह ध्वनि निकाली है कि वस्तुतः लङ्का में आगता सीता मायामयी ही थी । "मायामिवासुरीमित्यनेन मायारूपवेषा सीता लङ्कामागतेति ध्वनितम् ।" ( तिलक ) । वास्तविक सीता अग्नि में निवास कर रही थीं । अग्निपरीक्षा के अवसर पर अग्नि ने सीता की रक्षा करके उनके पातिव्रत्य का साक्ष्य देकर उन्हें राम को प्रदान किया था। इसे भी कल्पनामात्र मानना निर्मूल है। देवीभागवत (३।२९) के अनुसार रावण का प्रस्ताव सुनकर सीता गार्हपत्य अग्नि की ओर शरण के लिए जाती है तथा अद्भुतरामायण के अनुसार भी वास्तविक सीता का हरण न होकर काल्पनिक सीता का ही हरण हुआ था। "तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् । विश्वं यथेद्माभाति तथेयं प्रतिभाति मे ॥ (सर्ग १६।३) द्विपदरामायण (३।१८) में लक्ष्मण सीता को अग्नि के लिए सौंप कर जाते हैं। कूर्मपुराण के अनुसार रावण को देखकर सीता ने अग्नि की शरण ग्रहण की। बुल्के के अनुसार यह पुराण ९ वीं शती का है। परन्तु यह उनकी धारणा गलत है। प्रायः पाश्चात्य लेखकों को एक व्यापक भयंकर रोग होता हैं कि वे प्राचीन से प्राचीन वेदादि शास्त्रों को भी ईसा के आसपास ही रखना चाहते हैं । वेदव्यास ही इन पुराणों के निर्माता हैं। उनका काल ईसा से ३६ सौ वर्ष पूर्व है। पुराण भी अनादिसिद्ध हैं। उनका प्रतिद्वापर आविर्भावमात्र होता है । अस्तु "जगाम शरणं वह्निमावसथ्यम् । सीतामादाय रामेष्टां पावकोऽन्तरधीयत ॥" बुल्के का अर्थ है, अग्नि ने मायासीता का निर्माण कर वास्तविक सीता को ग्रहण कर उसको छिपा दिया, परन्तु यह अशुद्ध अर्थ है। व्याकरण के अनुसार इसका अर्थ यह है कि माया सीता रचकर राम की इष्टा प्रिया सीता को लेकर पावक स्वयं अन्तर्हित हो गया। इससे यह भी स्पष्ट है कि मायामयी सीता को रावण लङ्का ले गया। रावणवध के बाद राम ने मायासीता पर शङ्काएं की फलस्वरूप वह अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। तब अग्नि ने वास्तविक सीता प्रकट की और राम ने उन्हें स्वीकार किया । "गृहाण चैतां विमलां जानकीं वचनान्मम । पश्य नारायणं देवं स्वात्मानं प्रभवाप्ययम् ॥"१ ब्रह्मवैवर्त्त के अनुसार सीताहरण के पूर्व ही अग्निदेव ब्राह्मण के वेष में आकर कहते हैं, सीताहरण का समय आ गया है। सीता को मुझ में रखकर उसकी छाया अपने पास रखो । अग्निपरीक्षा के अवसर पर सीता को पुनः लौटा दूँगा। राम ने वैसा ही किया। अग्निपरीक्षा के समय वास्तविक सीता राम को समर्पण कर देने के बाद छायासीता ने पूछा कि मैं क्या करूँ ? तब अग्नि ने उन्हें पुष्कर भेज दिया। वहाँ उन्होंने तीन लाख वर्ष तप करके लक्ष्मीपद प्राप्त कर लिया। देवीभागवत में भी अग्निदेव राम के पास जाकर उनको छायासीता देते हैं। ब्रह्मवैवर्त्त (प्रकृतिखण्ड अ० १४), देवीभागवत (९।१६) तथा अध्यात्मरामायण में ये ही सब बातें रूपान्तर से कही हैं। १. कूर्मपुराण उत्तर विभाग अध्याय ३४; कलकत्ता संस्करण पृ० ६९२ ।
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५०२ रामायणमीमांसा पञ्चदश "मायासीतां बहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ।” ( युद्धकाण्ड सर्ग १२ ) मायासीता अग्नि में प्रवेश करती हैं तथा अग्निदेव राम को वास्तविक सीता प्रदान करते हैं (सर्ग १३) । उपर्युक्त प्रमाणों को बुल्के केवल कल्पनामात्र मानते हैं । परन्तु भारतीय आस्तिक समाज की दृष्टि में पुराण परम प्रमाण हैं । श्रीतुलसीदासजी ने भी अपने मानस में इसका उल्लेख किया है— "जौ लगि करौं निशाचर नासा । तुम पावक मँह करहु निवासा ।” (रा० मा० ३।२३।१) भावार्थरामायण ( ३।१६ ) के अनुसार देवताओं को आशङ्का थी कि सीता-स्पर्श करने से रावण भस्म हो जायेगा, किन्तु सभी राक्षसों के विनाश के लिए उसका भस्म हो जाना ठीक न होगा, अतः देवताओं के हितार्थ सीता अपनी छाया को लेकर प्रेषित करती है । बलरामदासरामायण ( उत्तरखण्ड ) के अनुसार नारद की शिक्षा से सीता ने वैसा किया । धर्मखण्ड ( अ० १३ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१३ ) नारद के परामर्श से राम ने माया- सीता का निर्माण करके मृत्युदेवी से कहा कि वे सीता के रूप में लङ्का में प्रवेश करें और वास्तविक सीता को राम ने अपने वक्षस्थल में रख लिया । लङ्कायुद्ध के पहले सीता अपनी माता पृथ्वी की शरण में चली गयीं । आनन्दरामायण के अनुसार सीता रजोलूप से अग्नि में, सत्त्वरूप से राम के समीप और तमोरूप से रावण के मोहनार्थ वन में रहीं । "सीते त्वं त्रिविधा भूत्वा रजोलूपा वसानले । वामाङ्गे मे सत्त्वरूपा वस च्छाया तमोगयी ॥ पञ्चवट्यां दशास्यस्य मोहनार्थं वसात्र वै ॥” ( आ० रा० ७।६७, ६८ ) ५०८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं यूनानी होमर के काव्य में हेलेन पतिता बनकर अपने अपहर्त्ता पेरिस के साथ स्वेच्छा से भाग निकलती है और युद्ध के बाद अपने पति मेनेलोस को पुनः प्राप्त होती है। यूनानी धार्मिक विकास में वही हेलेन बाद में देवी मानी गयी । फलस्वरूप भक्तों ने होमर का वृत्तान्त, इष्ट देवी की मर्यादा के प्रति- कूल समझकर, इस तरह बदल दिया कि पेरिस हेलेन की एक छाया ( एडोलोन मायामयी मूर्ति, छाया ) अपने साथ ले जाता है । इसी तरह भक्ति भावना ने दोनों देशों में एक ही उपाय का सहारा लिया है। परन्तु इन दोनों कथाओं में परस्पर प्रभाव मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। दोनों कथाओं का स्वतन्त्ररूप से विकास हुआ है। यह है बुल्के का हृदय । फिर भी जो लोग उन्हें रामायणभक्त समझते हैं उनकी बुद्धि पर तरस आना चाहिये । परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि किसी बाह्य अंश की समानता से वस्तु का अपलाप नहीं किया जा सकता है । आज देश-विदेशों में सैकड़ों कुमारियों से अवैध सन्तानें पैदा होती हैं । फिर भी यीशू क्राइष्ट की मां कुमारी मेरी को ईसाई वैसा ही नहीं मानते। पुराण तो होमर काव्य से प्राचीन हैं, अतः होमर काव्य में पुराणप्रसिद्ध मायासीता के अनुसार पर हेलन की मायामयी मूर्ति की चर्चा की गयी होगी । फिर वहाँ हेलन के स्वेच्छा से भाग निकलने के कारण दोनों में आकाश पाताल का अन्तर है । वस्तुतः जैसा कमल के पराग, मकरन्द, किञ्जल्क आदि का विश्लेषण कार्य बन्दर के हाथों में देना खतरनाक है । वैदिक संस्कृति-संस्कारों से शून्य पाश्चात्यों के द्वारा भारतीय आर्ष ग्रन्थों का विश्लेषण भी वैसा ही होता है । पुराणों ने ठीक ही कहा है कि अल्पश्रुत से वेद डरता है। यह अवश्य अर्थ का अनर्थ कर के वेद पर प्रहार करेगा । "बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ( म० भा० १।१।२६८ )
इसी तरह वेद, रामायण, महाभारत तथा पुराणों का स्वरूप और प्रामाण्य न समझनेवाले पाश्चात्य रामायण आदि के सम्बन्ध में भी अर्थ का अनर्थ करते हैं। वस्तुतः पूर्वोत्तर-मीमांसाओं तथा अन्य दर्शनों में वेदों की अपौरुषेयता, अनादिता एवं स्वतःप्रामाण्य पर पूर्णरूप से विचार किया गया है। रामायण, महाभारत तथा पुराण आदि आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों का भी प्रामाण्य कहा गया है। उस दृष्टि से वेदों, इतिहासों और पुराणों का समन्वय करके निर्धारित अर्थ ही वेदार्थ या पुराणार्थ होता है। अन्यथा तो रामायण एवं तथाकथित आदिरामायण का भी प्रामाण्य कैसे होगा ? सर्वत्र अनास्था होने से सीता और राम नाम की कोई वस्तु भी सिद्ध न हो सकेगी। यही स्थिति ईसाई, मोहमडन आदि के ग्रन्थों की भी होगी। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार यह निश्चित है कि धर्मग्लानि और अधर्माभ्युत्थान के निवारणार्थ धर्म-संस्थापनार्थ, विशेषतः अमलात्मा परमहंस महा- मुनीन्द्रों के लिए भक्तियोग विधानार्थ परब्रह्म का ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि के रूप में आविर्भाव होता है। "एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा" के अनुसार एक ही दिव्य ब्रह्मज्योति सीता-राम के रूप में व्यक्त होती है। जल और तरङ्ग, सूर्य और प्रभा, चन्द्र और चन्द्रिका तथा अमृत और मधुरता के तुल्य आनन्दसिन्धु एवं उसका माधुर्यसारसर्वस्व अभिन्न ही वस्तु है। इस दृष्टि से जलतरङ्ग एवं अमृत-माधुर्य के समान ही उनका विरह (विश्लेष) भी असम्भव है। इस दृष्टि से सीता-राम का वियोग असम्भव ही है। लक्ष्मीरूप से सीता सदा राम के वक्षःस्थल पर श्रीचिह्न के रूप में विराजमान हैं। व्यावहारिकरूप में एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम के रूप में व्यक्त है। लङ्कागमन आदि कार्यार्थ मायासीता की कल्पना स्वाभाविक ही है। जैसे वाल्मीकिरामायण के द्वारा सीता-राम का आविर्भाव उक्त है वैसे ही पुराणों द्वारा मायासीता का लङ्कागमन तथा वनवास आदि भी उक्त है। बुल्के की दृष्टि में वाल्मीकि- रामायण भी मिलावट से रहित नहीं है। इतना ही क्यों पाश्चात्यों ने तो वेदों में भी मिलावट की कल्पना की है, पर उनकी ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण ही हैं।
षोडश अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०९वें अनु० में किष्किन्धाकाण्ड की कथावस्तु का विश्लेषण किया गया है। राम द्वारा हनुमान् की शुद्ध भाषा और व्याकरण का अध्ययन दाक्षिणात्य पाठ में है, अन्य दो पाठों में नहीं है (वा० स० ४।३।२८-३८)। वालि- वध के पश्चात् सुग्रीव का पश्चात्ताप तथा राम द्वारा तारा को सान्त्वना प्रदान (सर्ग २४), प्रस्त्रवण गिरि का वर्णन, वर्षा-ऋतु का त्रिष्टुप् छन्द में वर्णन, तारा और लक्ष्मण का संवाद, लक्ष्मण को क्रुद्ध देखकर उनको शान्त करने के लिए सुग्रीव द्वारा तारा को भेजना। इसके अतिरिक्त दाक्षिणात्य पाठ २१वाँ तथा ३९वां सर्ग पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता। उक्त दोनों सर्ग गौड़ीय पाठ में विद्यमान हैं। भारतीय परम्परा में शाखाभेद से वेदों के पाठ-भेद के समान वाल्मीकिरामायण, सप्तशती आदि के भी सभी पाठ-भेद प्रामाणिक ही हैं। परन्तु बुल्के इसी कारण प्रक्षेप सिद्ध करने का भी प्रयत्न करते हैं। राम के प्रति तारा का यह शाप कि सीता थोड़े समय तक आपके पास रहकर भूतल में प्रवेश करेंगी। सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व को बुलाना जो अङ्गद को अपनी पीठ पर समुद्र के उस पार ले जाने का प्रस्ताव करता है। केसरी द्वारा दिग्गज धवल का वध, जिसके लिए उसने वरस्वरूप मरुत्-विक्रम पुत्र हनुमान् को प्राप्त किया था। उक्त वृत्तान्त गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में मिलते हैं, दाक्षिणात्य पाठ में नहीं मिलते तथापि सिद्धान्तदृष्टि से समन्वित अर्थ का ग्रहण करना उचित है। ५११वें अनु० में बुल्के कहते हैं वालिवध के दोष से राम को बचाने का मार्ग अपनाया गया है। सर्ग १७ और १८ प्रक्षेप हैं। इस अंश का खण्डन पीछे किया जा चुका है। वस्तुतः ये सर्ग प्रक्षिप्त नहीं हैं। दिग्वर्णन को भी वे प्रक्षिप्त मानते हैं: हेतु यह देते हैं कि महाभारत के रामोपाख्यान में इसका वर्णन नहीं है। सर्ग ४५ में सभी दिशाओं में वानरों का प्रस्थान वर्णित है। परन्तु उनका यह सब कथन निस्सार है। महाभारत का रामोपाख्यान कसौटी नहीं है। वह तो वाल्मीकिरामायण का संक्षेप माना गया है। भारतीय शास्त्रों में संक्षेप और विस्तार से वर्णन की पद्धति होती है। महाभारत में भी पहले संक्षेप में वर्णन किया जाता है। पश्चात् उसी अंश का विस्तृत वर्णन होता है। बुल्के का प्रामाणिक पाठ निर्धारण भी वानरीय पङ्कज-विश्लेषण से अधिक कुछ भी नहीं है। तभी तो उनकी दृष्टि में ६०० श्लोकों में १५० प्रामाणिक ठहरते हैं। उनसे भी कोई और महामति विश्लेषण करेगा तो पाँच ही श्लोक प्रामाणिक सिद्ध होंगे। परन्तु उनकी प्रामाणिकता स्वयं में ही प्रमाणशून्य है। सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि भी याकोबी के अनुसार प्रक्षिप्त हैं, परन्तु भारतीय परम्परा में वे सभी पाठ प्रामाणिक हैं। उनका पाठानुष्ठान होता है। टीकाकारों ने उनपर टीकाएँ लिखी हैं। ऋषि निशाकर और सम्पाति की कथा को भी सर्ग ६०-६३ वे प्रक्षिप्त कहते हैं। इसमें भी अनावश्यक विस्तृत वर्णन को ही हेतु कहा गया है जो कि हेत्वाभास ही सिद्ध होता है। हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को भी वे वाल्मीकिकृत नहीं मानते हैं। ये सब कल्पनाएँ वैसी ही हैं जैसे कोई अल्पज्ञ प्राणी अपने घर में बैठा हुआ कामायनी के अंशों को अस्पष्टता के कारण प्रक्षेप कहने का साहस करे। इसी तरह किष्किन्धा के अन्य सर्गों को भी परस्पर विरोधी उल्लेखों के कारण वे प्रतिभाशाली वाल्मीकि की कृति नहीं मानते हैं। जैसे ४।२४, ७।२ तथा ५९।३ में कहा गया है कि राम अथवा वानर सीता के अपहर्ता के नाम से अनभिज्ञ हैं। परन्तु ७।१९, १७।५०, २६।१७ आदि में उनके नाम तथा उनकी राजधानी लङ्का (३५।१५) का बारम्बार उल्लेख हुआ है। सर्ग ५८ में सम्पाति का कहना कि मैंने स्त्री का अपहरण करते हुए रावण को आकाश में
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अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०५ देखा था (श्लोक १५) । किन्तु अगले सर्ग में वही फिर कहता है मैंने अपने पुत्र सुपार्श्व से सीता के अपहरण के विषय में सुना था (५९।६), अतः यह सब प्रक्षेप ही है; परन्तु यह सब कथन भी अनभिज्ञताजन्य ही है। यदि उन्होंने परम्पराप्राप्त टीकाओं को देखा होता तो उनकी भ्रान्ति दूर हो जाती । तिलककार ने "तच्च न ज्ञायते रक्षः" (४।१४) पर "विशिष्येति शेषः" कहकर उसी का समाधान किया है । अर्थात् सामान्य ज्ञान होने पर भी उसकी विशेषताएँ अज्ञात हैं। यों तो "घटमहं न जानामि" कहनेवाला भी सामान्यरूप से घट को जानता ही है। तभी तो अज्ञान को घटविशेषण से विशेषित करता है। “न जाने निलयं तस्य सर्वथा पापरक्षसः । सामर्थ्यं विक्रमं वापि दुष्कुलेयस्य वा कुलम् ॥” (७२) इसकी भी तिलक टीका देखनी चाहिये । वस्तुतः पूर्वापरविरोध का परिहार किये बिना तो वेद, रामायण, धर्मशास्त्र किसी का भी अर्थ निश्चित न होगा । किसी भी संविधान में ऐसे पूर्वापर विरोध का परिहार करना अनिवार्य है। तिलककार के अनुसार सुग्रीव कहते हैं उस पाप करनेवाले राक्षस के निलय स्थान (गुप्तवास स्थान) को मैं नहीं जानता हूँ । बुल्के ने निलय का अर्थ केवल घर समझ लिया है, इसी लिए उन्हें ऐसी भ्रान्ति हुई है। किन्तु यहाँ निलीयतेऽस्मिन् जिसमें छिपा जाय इस विशेष अर्थ में 'निलय' शब्द का प्रयोग है। क्योंकि पाप करनेवाला राजधानी में रहना पसन्द नहीं कर सकता। साथ ही उसके सामर्थ्य, शौर्य और "विक्रमं पादविक्षेपं करोति यत्र" इस व्युत्पत्ति के अनुसार वासनगर को मैं नहीं जानता। दुष्कुलेय से यह ध्वनित होता है कि वह राक्षसकुलप्रसूत है इतना विदित है। टीकाकार आगे स्वयं लिखते हैं कि अतः हनुमान् आदि को भेजते समय सुग्रीव ने लङ्का की चर्चा करके यह कहा था कि इन्द्रतुल्य दुरात्मा रावण का वही देश है— “स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः । राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्राक्षसमद्युतेः ॥” (वा० रा० ४।४१।२५) पर इसका पूर्व से विरोध नहीं होगा, क्योंकि इतना जानतमात्र से उसका वध सम्भव नहीं है। अतः इतनी जानकारी निष्फल ही है। आज भी सामान्य ज्ञान होने पर भी संग्राम के लिए विशेष जानकारी अपेक्षित होती है। इसी लिए गुप्तचरों द्वारा शत्रु के विभिन्न रहस्यस्थानों, विशिष्ट बलों तथा शस्त्रास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जाता है। यही समाधान अन्य अंशों का भी है। (७।१९) आदि में रावण आदि के नाम का निर्देश और अज्ञान दोनों का यही समन्वय है । इसी तरह टीकाकारों ने ५८ एवं ५९ वें सर्ग के विरोधाभास का भी परिहार किया है । सर्ग ५८ वें में सम्पाति ने बताया है कि सर्वाभरणभूषिता रूपसंपन्ना तरुणी रावण द्वारा हरण की जाती हुई मैंने देखी थी। वहीं और भी कहा गया है—वह राम नाम और लक्ष्मण नाम बराबर पुकार रही थी एवं गात्रविधूनन करती हुई भूषणों को फेंक रही थी । राम नाम के कीर्तन से मैं उसे सीता समझता हूँ (वा० रा० ४।५८।१४-२३ ) । किन्तु सर्ग ५९ श्लो० ६ से अपनी बात को प्रमाणान्तर से प्रत्यायित करने के लिए उसने सुपार्श्व के द्वारा सुनी हुई कथा का वर्णन किया। उस कथा में ऋषियों ने सुपार्श्व को बताया था दाशरथि राम की पत्नी जनकात्मजा का रावण ने हरण किया है। स्वयं उसने राम राम की पुकार से उस तरुणी को राम-पत्नी समझा। परन्तु सुपार्श्व द्वारा उसे विदित हुआ कि ऋषियों ने उसे राम-पत्नी बताया है । टीकाकार ने कहा है—"प्रतिसंहृक्तान् त्यक्तप्रायो- पवेशनान् सीताश्रुतिसमाहितान् सीताविषयवृत्तान्तश्रवणे सावधानान् पुनराश्वासयन्नन्यसाक्षिकतावचनेन भूयः स्वोक्तार्थं प्रत्याययन् अर्थात् सम्पाति का वचन सुनकर वानरों ने प्रायोपवेशन त्याग दिया और सीता के वृत्तान्त का ६४
५०६ रामायणमीमांसा षोडश
श्रवण करने के लिए सावधान हो गये तब सम्पाति ने उन्हें पुनः आश्वस्त करते हुए, अपनी बातों के सम्बन्ध में अन्य की साक्षिता दिखलाते हुए स्वोक्त अर्थ में विश्वास उत्पन्न कराते हुए सुपार्श्ववर्णित वृत्तान्त सुनाया— “स हरीन् प्रतिसंमृक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान् । पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० ४।५९।५ ) इस तरह विचार करने पर यहाँ असमन्वय का प्रश्न ही नहीं है । संगति का लक्षण, उसके भेद, विरोधा- भास एवं विरोध-परिहार सम्बन्धी भारतीय परम्परा न जानने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को भारतीय शास्त्रों में पद पद पर भ्रान्ति होती है। भारतीय विचारपद्धति न समझने के कारण ही पाश्चात्य लोग वेदों में भी असंगति दिखलाने का साहस करते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है— “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।२ ) “प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।३ ) तथा “मनो ब्रह्मेति । विज्ञानं ब्रह्मेति । आनन्दो ब्रह्मेति ( तै० उ० ३।४, ५, ६ ) । इन वचनों को देखकर वे कहते हैं वैदिक बहुत शीघ्रता से अपनी कही बातों को भूल जाते हैं। पहले वायु के लिए कहा “नमस्ते वायो त्वमेव ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि” ( तै० उ० १।१ ) और फिर अन्न, प्राण आदि को कह दिया, परन्तु यह वेद का दोष नहीं उनकी शक्ति, लक्षणा आदि विविध वृत्तियों को न जानने से अनभिज्ञों को भ्रान्ति होती है । “भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ।” ( भा० पु० १०।८७।३६ ) वेदस्तुति में कहा गया है भगवन्, आपकी वेदरूप वाणी विविध वृत्तियों द्वारा उक्थजड़ों को भ्रम में डाल देती है । ५१२ वें अनु० में बुल्के किष्किन्धाकाण्ड के विकास पर विचार करते हैं । वस्तुतः विकास का भी अर्थ वही है जो उनकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं था उस अंश का विस्तार ही विकास है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव राम-लक्ष्मण को देखकर तथा उनको वाली द्वारा प्रेषित समझकर भयभीत होकर हनुमान् को उनके निकट भेजता है । हनुमान् भिक्षुरूप धारण कर राम और लक्ष्मण के पास आते हैं और अपना परिचय देकर कहते हैं कि सुग्रीव आपसे मैत्री करना चाहते हैं। राम ने सुग्रीव की सहायता करने का वचन दिया । पश्चात् हनुमान् लक्ष्मण से सीता-हरण का वृत्तान्त सुनकर सुग्रीव की सहायता का आश्वासन देते हैं। तथा अपने वानर रूप में प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को अपने कन्धे पर चढ़ाकर दोनों को पर्वत के शिखर पर सुग्रीव के पास पहुँचाते हैं ( सर्ग २-४ ) । बंगाली राम-कथाओं में “शिवरामेश्वर-युद्ध” का भी वर्णन है । लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने जाते हैं । वहाँ के द्वारपाल हनुमान् से युद्ध करते हैं । देर होने पर राम स्वयं जाते हैं । इतने में शिवजी भी आ जाते हैं। दोनों युद्ध करते हैं। अन्त में शिव राम के लिए सहायतार्थ हनुमान् को समर्पित करते हैं। हनुमान् राम के भक्त हो गये। उत्तर भारत के एकवृत्तान्त के अनुसार राम के लिए फल तोड़ते हुए लक्ष्मण रुद्रावतार हनुमान् से युद्ध करते हैं। लक्ष्मण राम के भाई हैं, यह सुनकर हनुमान् राम की शरण लेते हैं और राम तथा लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाते हैं । ( पा० वृ० नं० १३ ) । संताली राम-कथा के अनुसार हनुमान् तरबूजों की रखवाली करते हैं। लक्ष्मण उनमें से कुछ लेना चाहते हैं । जिसमें दोनों की भिड़न्त हो गयी। अन्त में हनुमान् ने दोनों को फल खिलाया । मूल ग्रन्थ का सीधा सम्बन्ध न होने से दन्तकथाओं का सम्बन्ध जुड़ जाने का ही यह परिणाम है। भावार्थरामायण के अनुसार राम की शक्ति देखने के लिए हाथ में साल वृक्ष लेकर राम और लक्ष्मण के पास पहुँचकर हनुमान् ने धमकी के साथ पूछा तुम लोग कौन हो ? राम ने बाण चलाकर हनुमान् को परास्त किया। तब हनुमान् ने वायु का सुझाव मान कर राम से क्षमा माँगी ।
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०७ रामकियेन के अनुसार जन्म से ही हनुमान् के कानों में कुण्डल थे । आकाशवाणी में यह बताया गया था कि जो व्यक्ति बालक के इन कुण्डलों को देखेगा वही उसका स्वामी होगा (पिता होगा) । हनुमान् किसी वृक्ष पर चढ़कर फल खा रहे थे । हनुमान् ने पेड़ के नीचे लक्ष्मण की गोद में सिर रख कर सोते हुए राम को देखा । लक्ष्मण का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हनुमान् उनपर पत्ते और फल फेंकने लगे । अन्त में नीचे उतर कर लक्ष्मण से युद्ध किया । लक्ष्मण के तीन बाण छीनकर पत्तों में छिप गये । लक्ष्मण ने राम को जगाया । राम ने उस वानर के कानों में कुण्डलों को देखा और हनुमान् को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया । सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार हनुमान् राम से युद्ध करते हैं । अन्त में राम को पहचान कर उनके भक्त बन जाते हैं । रामकेर्ति (सर्ग ५) के अनुसार हनुमान् वायुपुत्र थे । रंगनाथरामायण (४।३) के अनुसार हनुमान् तपस्या द्वारा ब्रह्मा से वरदान पाते हैं और पूछते हैं कि मेरे मोक्ष और कार्यसिद्धि के लिए मेरा आराध्य कौन होगा ? ब्रह्मा ने कहा जो तुम्हारे आभूषणों को देख सकेगा वही तुम्हारा प्रभु होगा । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२।१३५) में उल्लेख है कि राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे । राम ने एक वानर देखा जो हेम के समान पिङ्गल और मणिकुण्डल पहने था । कम्बरामायण (४।२।३५) तथा बालरामदासरामायण में भी कुण्डलों की चर्चा है । भावार्थरामायण (४।१) के अनुसार अञ्जना ने हनुमान् से कहा था कि जो तुम्हारी लंगोटी देख सकेगा वहीं तुम्हारा स्वामी होगा । उसके अनुसार लंगोटी पहने ही हनुमान् का जन्म हुआ था । वस्तुतः हनुमान् की राम में अनन्यभक्ति और राम का उनके प्रति वात्सल्यभाव तथा हनुमान् की अखण्डब्रह्मचर्यनिष्ठा की अभिव्यञ्जना के लिए उक्त कथाओं का प्राकट्य है । बिहौररामकथा में हनुमान् ने अपनी माता के गर्भ से राम को पहिचान लिया था और जन्मते ही वह उनके साथ चल दिये । अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने हनुमान् को अपने विष्णुरूप का दर्शन कराया । सेरीराम के एक पाठ के अनुसार लक्ष्मण राम के लिए पानी लाये । राम ने पानी पीकर उसे (सुग्रीव के आँसुओं से) नम- कीन पाया । कारण का पता लगाने पर सुग्रीव से भेंट होती है । रामकेर्ति (सर्ग ५) में भी यहीं कथा मिलती है । सेरीराम के शेळाबेर पाठ के अनुसार लक्ष्मण द्वारा लाये गये पानी को पीकर राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर चार दिन तक सोते रहे । सुग्रीव पेड़ से लक्ष्मण का यह भ्रातृ-प्रेम देख कर रोने लगा । सुग्रीव के एक आँसू ने राम की छाती पर पड़कर उन्हें जगाया । राम ने इसे लक्ष्मण का आँसू समझकर उन्हें घर लौटने का आदेश दे दिया । इसपर लक्ष्मण की प्रार्थना से पेड़ के पत्ते छोटे हो गये तथा सुग्रीव दिखायी पड़ने लगा । तब राम-सुग्रीव की मैत्री हुई । सेरतकाण्ड तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार वाली ने सुग्रीव को दूर फेंक दिया था । वह अधमरा होकर वृक्ष की शाखाओं पर पड़ा था । राम ने उसी वृक्ष के नीचे विश्राम किया और सुग्रीव के आँसू राम पर पड़े । इन सभी कथाओं का तात्पर्य वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध ही लगा लेना उचित है । सुग्रीव अत्यन्त आर्त था । भगवान् राम के साथ सम्बन्ध होने से वह कृतार्थ हो गया । यही इन कथाओं का सार है । अनु० ५१३ में बुल्के कहते हैं आदिरामायण में वाली और सुग्रीव की जन्म-कथा नहीं थी । परन्तु यह समझना उनकी भूल है । दाक्षिणात्य बालकाण्ड (१७।१०) में वाली और सुग्रीव को क्रमशः इन्द्र एवं सूर्य का पुत्र कहा गया है । उसको प्रक्षेप कहना भी निराधार है । अन्य पाठों के अनुसार युद्धकाण्ड (सर्ग ४) में शुक रावण को उनका वृत्तान्त सुनाता है । महाभारत में प्रायः प्रत्येक पात्र के सम्बन्ध में विस्तृत कथा मिलती है । तदनुसार रामायण में भी सभी पात्रों की विस्तृत न सही प्रत्येक प्रधान पात्र का कुछ तो वर्णन उचित ही था । दाक्षिणात्य पाठ की कथा का सार यही है कि ब्रह्मा के अश्रु से ऋक्षरजा बानर की उत्पत्ति हुई । वह सरोवर में अपनी छाया को ही अपना प्रतिद्वन्द्वी समझ कर उसमें कूद पड़ता है और एक सुन्दर स्त्री हो जाता है । तब उसी समय वहाँ इन्द्र और सूर्य आते हैं और उसपर मोहित होते हैं । इन्द्र का तेज उसके बालों पर गिरा उससे वाली एवं सूर्य का तेज
५०८ रामायणमीमांसा षोडश उसकी ग्रीवा पर गिरा उससे सुग्रीव की उत्पत्ति हुई। इन्द्र ने अपने पुत्र को एक अक्षयगुणपूर्ण सुवर्णमाला दी। सूर्य ने अपने पुत्र की सेवा में हनुमान् को नियुक्त कर दिया। ऋक्षरजा पुनः अपना वानररूप पाकर अपने पुत्रों के साथ ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा ने एक देवदूत के साथ उसे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित किष्किन्धा भेज दिया। देवदूत ने ऋक्षरजा का वानरराजपद पर अभिषेक कर दिया। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७) के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्गों की कथाओं के अनुसार किसी दिन प्रजापति के वाम नेत्र में एक रजकण पड़ गया। उसे बाँये हाथ से दूर फेंकने से उसमें से एक स्त्री उत्पन्न हुई। पश्चात् सूर्य ने उसका आलिङ्गन किया और वरदान दिया कि तुम्हें एक वीर पुत्र उत्पन्न होगा। किसी समय इन्द्र भी उसे देखकर आकृष्ट हुए। उन्होंने उसको अपने हाथ से स्पर्श करके आशीर्वाद दिया कि तुमसे वाली ओर सुग्रीव दो कामरूपी यमल वानर उत्पन्न होंगे। किष्किन्धा में राज्य करेंगे। भावार्थरामायण में बताया गया है कि किसी दिन कैलास के एक सरोवर में शिवपार्वती क्रीड़ा कर रहे थे। अचानक कुछ मुनि आ गये, जिससे दोनों अन्तर्धान हो गये। पार्वती ने शाप दिया कि जो इस सरोवर में स्नान करेगा वह नारी के रूप में इससे निकलेगा। उस शाप से अनभिज्ञ होने के कारण ऋक्षरजा स्नान करके स्त्री हो गया। बलरामदासरामायण के अनुसार मदनिका अप्सरा के इन्द्र-सभा में अकस्मात् हँसने के कारण इन्द्र ने उसे शाप दिया कि तू वानरमुखी होकर मानसरोवर के निकट पृथ्वी पर निवास करेगी और कश्यप से पुत्र उत्पन्न कर मुक्ति प्राप्त करेगी, अतः मदनिका वहाँ रहने लगी। किसी दिन उर्वशी का सौन्दर्य देखकर कश्यप के तेज का पतन होता है। वह उसे जल में फेंक देते हैं। उसे पीकर मदनिका गर्भवती हो गयी। वह एक ऐसा पुत्र पैदा करती है जिसका शरीर मनुष्य का और मुख वानर का है। एक शबरी उस शिशु का पालन करती है। ब्रह्मा उसे ऋक्षपति नाम देकर आरण्य के राजपद पर अभिषिक्त करते हैं। ब्रह्मा ऋक्षपति को पार्वती-वन के पश्चिमी भाग में प्रवेश करने से मना करते हैं। किन्तु वह निषेधोल्लङ्घन करके उसमें प्रविष्ट होते ही नारी बन गया। इसका कारण यही था किसी दिन पार्वती ने अतृप्ति से वैसा शाप दिया था। अनन्तर वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही नारी भावापन्न ऋक्षपति से बाली और सुग्रीव का जन्म होता है। ब्रह्मा के आदेशानुसार वह दोनों पुत्रों को दण्डकारण्य में छोड़ देता है। गौतमपत्नी अहल्या दोनों को गौतम नदी के तटपर पाकर दोनों का धर्मपुत्र के रूप में पालन करती है। जब वे तीन वर्ष के होते हैं तब किष्किन्धा का राजा खडगद मृगया के अवसर पर गौतम से मिलकर बताता है कि अञ्जना नामक पुत्री को छोड़कर मेरे कोई सन्तान नहीं है। ऋषि वाली और सुग्रीव को राजा के हाथ में सौंप देते हैं। खडगद वाली को राजा एवं सुग्रीव को युवराज बना देते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार गरुड़ का भ्राता अरुण दो स्त्रियों को सूर्य का रथ हाँकते देखकर हँस पड़ा। सूर्य ने अरुण को रथ हाँकने के लिए कहा। अरुण ने स्वीकार कर लिया। वहीं अप्सराओं का नाच देखकर वह स्त्री बन गया। इन्द्र एवं सूर्य से उसे एक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। अरुण ने दोनों को अगस्त्य की सेवा में सौंप दिया। तपस्या में संलग्न अगस्त्य पर पानी छिड़कने से अगस्त्य के शाप से दोनों वानर बन गये। पउमचरियं की रामकथाओं के अनुसार आदिरजा तथा इन्द्रमाली की वाली, सुग्रीव तथा श्रीप्रभा तीन सन्तानें थीं। सारलादासमहाभारत वनपर्व के अनुसार गौतम अपनी पत्नी का जीव लेकर स्नानार्थ जाया करते थे। किसी दिन इन्द्र और सूर्य दोनों उस निर्जीव शरीर पर आसक्त हो गये। इन्द्र के प्रवेश से सजीव अहल्या से सूर्य का सम्बन्ध हुआ और सूर्य के प्रवेश से सजीव उसी शरीर से इन्द्र का सम्बन्ध हुआ, उससे श्यामशील और जवशील दो पुत्र उत्पन्न हुए। अञ्जना ने इसका भेद गौतम को बतला दिया था। परीक्षा लेने के लिए गौतम ने
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०९ दोनों को जल में फेंक दिया । जिससे दोनों वानर हो गये । गौतम ने दोनों को निःसन्तान राजा खडगद को प्रदान कर दिया । सेरतकाण्ड और सेरीराम की कथाओं में भी उससे मिलती जुलती कथा है । रामकियेन की कथा पीछे दी जा चुकी है । बुल्के ने भी पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ को विकृत रूप ही माना है । मूल सम्बन्धविच्छेद से अनेक कल्पनाओं को अवकाश मिलता ही है । वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड (सर्ग १७) के अनुसार भगवान् विष्णु जब दशरथ के गृह में पुत्ररूप में प्राप्त हुए तब ब्रह्मा ने सब देवताओं से कहा "विष्णु की सहायता के लिए वानर- रूप में अपने ऐसे पुत्रों को रचो जो बलवान्, कामरूपी, शूर, मायाविद्, वायु के समान वेगवाले, नयज्ञ, बुद्धिसम्पन्न और विष्णुतुल्य पराक्रमवाले हों और जो असंहार्य, उपायज्ञ तथा दिव्यसंहनन और देवताओं के समान ही सर्वास्त्र- सम्पन्न हों । तदनुसार देवताओं ने अप्सराओं, गन्धर्वियों, यक्ष तथा पन्नगों की कन्याओं, विद्याधरियों आदि में विविध सन्तानें उत्पन्न कीं । स्वयं ब्रह्मा ने ऋक्षपुंगव जाम्बवान् को उत्पन्न किया था, इन्द्र ने वाली को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने तार को, धनद ने गन्धमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अग्नि ने नील को, अश्विनों ने मैन्द और द्विविद को, वरुण ने सुषेण को, पर्जन्य ने शरभ को तथा पवन ने वज्राङ्ग वैनतेयतुल्य हनुमान् को जन्म दिया । वाली और सुग्रीव के जन्म की विशेष कथा उत्तरकाण्ड में प्रक्षिप्त सर्ग से समझी जा सकती है । इसी के अनुसार अन्य कथाओं का अभिप्राय भी लगा लेना चाहिये । ५१५ वें अनु० में वाली और सुग्रीव की शत्रुता के कारणों पर विचार है । दुन्दुभि-पुत्र मायावी के ललकारने पर वाली उसे मारने निकला । सुग्रीव भी निकला । मायावी एक बिल में प्रविष्ट हो गया । वाली सुग्रीव को बिलद्वार पर खड़ा करके अन्दर चला गया । एक वर्ष बाद बिल से फेनयुक्त रक्त-धारा निकलती देखकर तथा असुरों का गर्जन सुनकर सुग्रीव ने समझ लिया कि वाली मारा गया । पत्थरों से बिल का द्वार बन्द कर अपने भाई की उदक-क्रिया सम्पन्न करके किष्किन्धा लौट आया । मन्त्रियों ने उसे अभिषिक्त कर दिया और वह न्यायपूर्वक शासन करने लगा । वाली अपने शत्रु को मारकर लौटा । सुग्रीव ने विनयपूर्वक राज्यसिंहासन उसे सौंप दिया । परन्तु उसने उसकी पत्नी रूमा को लेकर उसे निर्वासित कर दिया । सुग्रीव सारी पृथ्वी में भटक कर वाली के लिए अगम्य ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगा । दिग्वर्णन के बाद सुग्रीव ने वही कथा राम को सुनायी थी । इस वृत्तान्त में असुर का नाम दुन्दुभि ही था । सुग्रीव के राजा बनने पर तारा और रूमा दोनों उसकी पत्नियां बन गयीं । वाली ने सर्वत्र उसका पीछा किया । तब हनुमान् ने सुग्रीव को मतङ्ग के शाप का स्मरण दिलाया जिससे सुग्रीव ऋष्यमूक पर रहने लगा । अध्यात्मरामायण के मायावी मय दानव का परम दुर्मद पुत्र था (४।१।४७) । अध्यात्मरामायण (१।४। १६) के अनुसार उसका दुर्मद नाम है। सेरीराम के अनुसार वाली ने गुफा में प्रवेश करने के पहले सुग्रीव से कहा था कि यदि सफेद रक्त गुफा से निकले तो मुझे मृत समझना, यदि लाल रक्त निकले तो शत्रु का मरण समझना । परन्तु सफेद रुधिर निकलने से सुग्रीव ने वाली को मृत समझ लिया । किष्किन्धा पहुँचकर सुग्रीव ने वाली की पत्नी के सामने विवाह का प्रस्ताव किया । उसने सप्ताह की अवधि माँगी, इसी बीच वाली लौट आया। पद्मपुराण (४।११२।१६३) के अनुसार वाली ने ६०,००० वर्ष पूर्व दशरथ के अभिषेक के दिन ही सुग्रीव को निर्वासित किया था । पउमचरियं के अनुसार राम के आगमन से पूर्व ही वाली को वैराग्य हो गया था । सुग्रीव ने तारा से विवाह किया और उससे अङ्गदभट और जवानन्द दो पुत्र हुए । महानाटक के अनुसार तारा सुग्रीव की ही पत्नी थी । रङ्गनाथरामायण के अनुसार समुद्र-मन्थन में वाली और सुग्रीव ने देवताओं की सहायता की थी, फलतः लक्ष्मी के बाद समुद्र-मन्थन से निकली देवाङ्गनाओं में से तारा वाली और सुग्रीव को दी गयी। रामकियेन के अनुसार ईश्वर के
सुमेरु-पर्वत को पूर्ववत् सीधा कर देने के पुरस्कारस्वरूप वाली को एक त्रिशूल और सुग्रीव को तारा मिली थी । किन्तु वाली ने छिपाकर तारा से विवाह कर लिया । दुन्दुभि वध के अतिरिक्त रावण की पराजय भी वाली ने की थी । सुग्रीव ने दुन्दभि के अस्थिनिचय तथा सप्त तालों को दिखला कर राम से कहा था इनको वाली एक ही समय में निष्पत्र कर देता था । सुग्रीव का अभिप्राय समझकर राम ने पादाङ्गुष्ठ से दुन्दुभि के अस्थि-कङ्काल को दस योजन दूर फेंक दिया और राम का एक बाण सप्त तालों का भेदन कर गिरिप्रस्थ सप्त भूमि का भेदन करके पुनः तूणीर में प्रविष्ट हो गया । नृसिंहपुराण के अनुसार वे सप्तताल एक सर्प की पीठ पर चढ़कर स्थित थे । आनन्दरामायण के अनुसार वाली ने किसी गुफा में तालवृक्ष के फल रखे थे। कोई उनमें से सात ले गया। वाली ने गुफा में एक सर्प देखा और उसे ही चोर समझ कर शाप दिया कि तुम्हारे शरीर पर सात ताल के वृक्ष उत्पन्न होंगे । सर्प ने प्रतिशाप दिया था कि जो उनको काटेगा वही तुम्हारा घातक होगा । राम ने शेषांश लक्ष्मण के पैर को अपने पैर से दबाकर सर्प को सीधा कर दिया और एक बाण से सातों को काट डाला । सुग्रीव ने फिर भी कहा कश्यप ने महती तपस्या से माला प्राप्त कर वह माला इन्द्र को दी थी । इन्द्र ने वही माला वाली को प्रदान कर दी । उसे देखते ही शत्रुगण युद्ध में बलहीन हो जाते हैं । वाली सदा माला को पहने रहता है । राम ने शापमुक्त उसी सर्प को आदेश दिया कि वह माला चुराकर ले जाये । सर्प ने माला चुराकर इन्द्र को दे दी । तभी सुग्रीव वाली से द्वन्द्वयुद्ध के लिए प्रस्तुत हुआ । तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार राम ने सुग्रीव को विश्वरूप दिखाया और ज्ञानमुद्रा तथा रामसहस्रनामस्तोत्र बताया । सेरीराम के अनुसार राम ने अपने एक बाण से सहस्र वन काट डाले । उस समय उनके धनुष की टङ्कार से सुग्रीव आदि मूच्छित हो गये थे । इन अनेक उद्धरणों का तात्पर्य यही है कि वाली महान् पराक्रमी था । उसके वध में अनेक प्रतिबन्ध थे, इसी लिए सुग्रीव भयभीत होकर राम की विशिष्ट सामर्थ्य के सम्बन्ध में पूर्ण आश्वस्त होकर ही द्वन्द्वयुद्ध में प्रवृत्त हुआ था । राम ने उसकी इच्छा से बहुत अधिक अपनी सामर्थ्य सिद्ध कर दिखायी । वाली का वध प्रथम द्वन्द्वयुद्ध में दोनों के एकरूप होने के कारण राम ने बाण नहीं छोड़ा । जिससे पराजित होकर सुग्रीव को ऋष्यमूक लौट जाना पड़ा । दूसरी बार राम ने सुग्रीव के गले में गजपुष्प की माला पहना दी । दुबारा सुग्रीव का आह्वान सुनकर तारा के अनुरोध को ठुकराकर वाली पुनः निकला । सुग्रीव से द्वन्द्वयुद्ध करते समय राम- बाण से आहत होकर वाली गिर पड़ा (सर्ग १३-१६) । अनन्तर के दो ( १७, १८ ) सर्गों को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं । इसका खण्डन पीछे किया जा चुका है । बुल्के ५१९ वें अनु० में कहते हैं, महाभारत के रामोपाख्यान में एक ही द्वन्द्वयुद्ध मिलता है । संक्षिप्त संकलन के नाते यह ठीक ही है, पर इससे वाल्मीकिरामायण में वर्णित दो द्वन्द्वयुद्धों का अपलाप नहीं किया जा सकता । विभिन्न अन्य राम-कथाओं में सुग्रीव को पहिचानने के लिए उसकी पूंछ में दर्पण तथा कमर में एक जड़ का लपेटना आदि भी उक्त है। सेरीराम के अनुसार वाली ने बाण हाथ से पकड़ लिया था। राम की निर्दोषता सिद्ध होने पर विष्णुस्वरूप राम के बाण की अमोघता के लिए बाण छोड़ दिया और वह छाती में घुस गया । आहत वाली ने राम का हाथ पकड़ कर अपनी पुत्री और पुत्र को सौंप दिया । राम ने वाली को जीवित रखना चाहा, पर उसने स्वीकार नहीं किया। पद्मपुराण (४।१११।१६७) में कहा गया है कि मरने के पूर्व वाली ने राम को उनका बाण लोटा दिया था ।
बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि अर्वाचीन कथाओं में वाली की मुक्ति का वर्णन है, क्योंकि पद्मपुराण आदि अर्वाचीन नहीं हैं। पद्मपुराण ( ४।११२।१६६-१६९ ), अध्यात्मरामायण ( ४।२ ), आनन्दरामायण ( १।८। ६३ ), रङ्गनाथरामायण ( ४।९ ), कम्बरामायण, रामचरितमानस ( ४।१०।१ ) आदि के अनुसार राम को परब्रह्म विष्णुस्वरूप मानकर बाली ने उनकी स्तुति की और अनायास ही देह-त्याग किया — "रामचरन दृढ़ प्रोति करि बालि कीन्ह तनुत्याग । सुमन माल जिमि कण्ठ ते गिरत न जानइ नाग ।।” ( रा० मा० ४।१० ) कुछ राम-कथाओं में कहा गया है कि द्वापरान्त में वाली ने भील के रूप में प्रकट होकर विष्णुस्वरूप राम से अन्य ( कृष्ण ) जन्म में बदला लिया था। महाभारत मुसलपर्व अध्याय ५ के अनुसार जरानामक व्याध ने सुप्त मृग समझ कर कृष्ण पर बाण चलाया था। महानाटक ( ५।५७;१४।७५ ) तथा आनन्दरामायण ( १!८।६६-६८ ) के अनुसार राम ने आहत वाली से कहा था, तुम द्वापरान्त में भील बनकर मेरे पैर में बाण चलाओगे, तभी तुम्हारी मुक्ति होगी । वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम ने मनुस्मृति के दो श्लोक उद्धृत किये थे — “राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ।।" (वा० रा० ४।१८।३१,३२) उनके अनुसार पाप करनेवाले प्राणी राजा के द्वारा दण्डित होकर निर्मल हो सुकृती सन्तों के समान स्वर्ग जाते हैं । राजा दण्ड दें अथवा छोड़ दें, पाप करनेवाला सर्वथा पाप से मुक्त हो जाता है। परन्तु उचित दण्ड न देने से राजा उस पाप का भागी होता है। उसके अनुसार वाली का कल्याण उसी जन्म में हो गया। रामचरितमानस की परम्परा के अनुसार उसे दिव्य भगवत्पादपद्म की प्राप्ति हो गयी। कल्पान्तरीय कथाओं के अनुसार वाली कृष्ण के दर्शन के अनन्तर मुक्त हुआ है। इस तरह कल्पभेद से दोनों ही कथाएँ सङ्गत हैं। तारा के शाप की बात भी कल्पान्तरीय समझनी चाहिये । ५२१ वें अनु० में वाल्मीकिरामायण में अङ्गद बार-बार सुग्रीव की कठोरता का उल्लेख करता है। इस प्रसङ्ग में राम का नाम भी लेता है — "भेतव्यं तस्य सततं रामस्य च महात्मनः ।” ( वा० रा० ४।४९।९ ) “इहास्ति नो नैव भयं पुरन्दरान्न राघवाद् वानरराजतोऽपि वा ।” ( वा० रा० ४।५३।२६ ) अर्थात् तीक्ष्णदण्ड सुग्रीव से डरना चाहिये और महात्मा राम से भी डरना चाहिये । इस मायानिर्मित बिल में हम लोगों को इन्द्र तथा राघव तथा वानरराज से भी भय नहीं है । परन्तु यह केवल विपन्न अवस्था की उक्ति है । वस्तुस्थिति की परिचायिका नहीं है । बुल्के आदि कहते हैं, महानाटक में कहा गया है कि अङ्गद ने दूतकार्य के लिए जाते समय राम के प्रति वैर तथा उनका वध करने की अभिलाषा प्रकट की थी ( अङ्क ८।३ ) । युद्ध के पश्चात् अयोध्या पहुँच कर अङ्गद ने राम का युद्ध के लिए आह्वान किया था, किन्तु एक आकाशवाणी से यह जानकर शान्त हो गया था कि वालि-वध का प्रतीकार कृष्णावतार के समय भीलरूपी वाली के द्वारा होनेवाला है ( अङ्क १४।७१-७६ ) । हिकायत महाराज रावण के अनुसार अङ्गद ने द्वन्द्वयुद्ध में राम को हरा दिया । राम ने विभीषण को वाली की समाधि पर भेजा था । विभीषण वाली को देखकर अङ्गद को राजा बनाने का आदेश देकर अन्तर्धान हो गया । वस्तुतः ऐसी कथाएँ प्रतिक्रिया
५१२ रामायणमीमांसा षोडश के रूप में सामने आती हैं, यथार्थता के आधार पर नहीं। महर्षि वाल्मीकि की ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रसूत वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ ही वस्तुस्थिति का परिचायक है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम के सम्मुख इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा तथा त्रिपु- रान्तक भी खड़े नहीं हो सकते थे । फिर अन्य की तो बात ही क्या है— “इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा । रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ।” (वा० रा० सुन्दरकाण्ड) रामचरितमानस के अनुसार अङ्गद एवं हनुमान् दोनों ही राम के परम प्रिय भक्त हैं— प्रभु आज्ञा धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ । सोइ गुनसागर ईस राम कृपा जापर करहु ॥ स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदर दयउ । अस विचारि युवराज तन पुलकित हरषित भयउ ॥” ( रा० मा० ६।१७ क और ख ) वालि-वध के दोष का निवारण वाल्मीकिरामायण में स्पष्ट है, परन्तु बुल्के जैसे पाश्चात्य लोग तो केवल प्रक्षिप्त कहकर ही सब कुछ उड़ा देना चाहते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार इन्द्रप्रदत्त हेममाला के कारण शत्रु बल- हीन हो जाता था। इसी लिए कहा जाता है कि राम ने वाली को छिप कर मारा था । तोरवेरामायण ( ४।४ ) के अनुसार शत्रु की आधी शक्ति वाली को मिल जाती थी। भावार्थरामायण में भी यही बात उल्लिखित है। जो भी हो, आर्ष वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम ने वाली को मारा । वाल्मीकिरामायण के अनुसार छिपने की कोई बात नहीं है । युद्ध करते करते जब सुग्रीव क्षीण होने लगा तब राम ने बाण चलाया— “ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम् । स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकाङ्क्षया ।” ( वा० रा० ४।१६।३३ ) ज्यातल के निर्घोष से पक्षिगण त्रस्त हो गये । मृगगण भाग चले । ऐसा लगा मानो प्रलय होने जा रहा हो । वाल्मीकिरामायण से इतना ही विदित होता है कि माला के प्रभाव से प्राण एवं तेज तथा पराक्रम ने वालि को नहीं छोड़ा । प्रतीत होता था कि माला, उसका देह और राम का वह बाण लक्ष्मी ही त्रिविध रूप से दीप्त हो रही है ( वा० रा० ४।१५।७ ) । वाली ने भी राम पर यह दोष नहीं लगाया कि आपने मुझे छिपकर मारा है। किन्तु उसका यही आरोप था कि अन्य से युद्ध करते हुए को आपने मारा । “न मान्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि ।” ( वा० रा० ४।१७।२१ ) यह हो सकता है कि युद्ध करनेवाले प्रतिद्वन्द्वी का अर्धबल उसमें आ जाता हो । परन्तु राम ने तो दण्डधर के रूप में उसे दण्ड दिया था, अतः उनके सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं हो सकती थी। पउमचरियं के अनुसार वाली सुग्रीव को राज देकर श्रमण हो गया। किन्तु साहसगति नामक विद्याधर ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य छीन लिया । राम सेना को लेकर सुग्रीव के साथ किष्किन्धा पहुँचे । साहसगति ने सामना किया। दोनों में घोर युद्ध हुआ । सुग्रीव आहत हो गया । राम ने बताया कि पहचानने में गड़बड़ी होने से साहसगति को नहीं मारा । दुबारा युद्ध में साहसगति को मारा । उत्तरपुराण (६८।४४०-४६३) के अनुसार लक्ष्मण ने वाली को मारा था। अनामकं जातकं के अनुसार राम का धनुष देखकर वाली भाग गया । महावीरचरित एवं अनर्घराघव में वाली राम द्वारा द्वन्द्वयुद्ध में मारा जाता है ।
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१३ राम की चातुर्मास्य-साधना ५२३ वें अनु० में बुल्के राम की वर्षाकालीन साधना के सम्बन्ध में कहते हैं । राम ने लक्ष्मण के साथ प्रस्त्रवण गिरि की एक गुफा में वर्षाऋतु बितायी ( वा० रा० ४ । सर्ग २७, २८ ) । अग्निपुराण ( ८।५ ) के अनुसार माल्यवान् पर्वत पर राम ने चातुर्मास्य यज्ञ किया । देवीभागवत ( ३।३० ) के अनुसार नारद के परामर्श से राम ने नवरात्रोपासना की । सिंहारूढ़ा भगवती से राम विजय का वरदान पाते हैं । विजयापूजा के बाद राम लङ्का को प्रस्थान करते हैं । शिवपुराण ( वेङ्कटेश प्रेस उमासंहिता ३।५३-५५ ) में कहा गया है कि राम ने शिव की आराधना की है । उससे उन्हें शिव से धनुष, बाण तथा ज्ञान प्राप्त हुआ । शिवपुराण ( नवलकिशोर प्रेस शतरुद्रसंहिता अध्याय ३४-३९ ) में राम की शिवपूजा का विस्तृत वर्णन है । अन्त में अन्य देवताओं के साथ शिव प्रकट होते हैं और राम को धनुष तथा अपने अन्य अस्त्र देते हैं । अन्य देवताओं ने भी अपने अपने अस्त्र राम को दिये और उनकी सहायता के लिए देवता लोग रीछ और वानर हुए । शिवजी ने भी हनुमान् के रूप में प्रकट होकर प्रत्यक्ष ही राम की सहायता करने का वचन दिया और राम को शिवगीता का उपदेश दिया । शिवगीता ( वेङ्कटेश प्रेस ) में अगस्त्य ने राम को पाशुपतव्रत करने का उपदेश दिया था । राम के द्वारा पाशुपतव्रत करने पर शिवजी ने दिव्य धनुष के साथ पाशुपत अस्त्र प्रदान किया था । प्रायः पाश्चात्य इन अनेक विचित्र उपासनाओं का भेद देख कर भी सबकी अप्रामा- णिकता की कल्पना करते हैं । परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से सबका समन्वय ही उचित है । अतः श्रीराम ने शिवजी की तथा भगवती की भी उपासना की हो तो इसमें कोई विरोध की बात नहीं है । कल्पभेद का समाधान तो है ही । वानरों का प्रेषण ५२४ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, प्रचलित वाल्मीकिरामायण की अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त है । इसमें वानरों के प्रेषण का अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है ( सर्ग २९-४७ ) । यह कहना भी गलत है, क्योंकि वह सब परम्पराप्राप्त है और टीकाकारों ने उसपर टीकाएँ लिखी हैं । ५१०-५११ अनु० का खण्डन पीछे हो चुका है । महाभारत के उद्योग पर्व का विस्तार देखते हुए यहाँ यह संक्षेप ही है । बुल्के की अपनी बुद्धि को छोड़कर इन सर्गों के प्रक्षिप्त होने में कोई भी प्रमाण नहीं है । हनुमान् के परामर्श से सुग्रीव ने नील को सेना बुलाने का आदेश दिया ( सर्ग २९ ) । राम की प्रेरणा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में प्रवेश किया । उनको कुपित जानकर तारा को पुरस्कृत कर नम्रतापूर्वक सुग्रीव ने क्षमा माँग ली । राम ने सुग्रीव का प्रेमपूर्वक स्वागत किया । सेरीराम के अनुसार सम्बूरान ( जम्बू ) महाजम्बू इन्द्र के शाप से वानर बन गया था । वह वाली का मित्र था । सुग्रीव सम्बूरान के कारण राम की सहायता से डरता था । लक्ष्मण ने पत्र लिखकर सम्बूरान से विष्णु के अवतारी राम की अधीनता स्वीकार करने को कहा, पर उसने राम अवतार पर विश्वास नहीं किया । जब हनुमान् रात्रि में हरण कर उसे राम के पास ले गये । तब उसने राम को देखकर उनका अवतारत्व स्वीकार किया । जाम्बवान् ने ज्योतिष द्वारा यह जान लिया कि सीता ने देह-त्याग का विचार छोड़ दिया है । और रावण चार धनुष की दूरी तक ही सीता के पास जा सकता है उससे अधिक निकट जाने में असमर्थ है । इसपर राम ने कहा कि जाम्बवान् की बात की सच्चाई जानने के लिए लङ्का जाने को कौन तैयार है । सबों की अनिच्छा देखकर राम ने वाली का स्मरण किया और हनुमान् को बुलाया । हनुमान् इस शर्त पर जाने को तैयार हुए कि राम के साथ एक पत्तल में भोजन की अनुमति मिल जाय । राम ने समुद्र-स्नान करने का आदेश दिया और इस शर्त को स्वीकार किया । वस्तुतः यह ६५
५१४ रामायणमीमांसा षोडश विकृति ही है, क्योंकि भारतीय दृष्टि के अनुसार राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। वाल्मीकिरामायण वेद का उपबृंहणरूप ही है। भागवत के अनुसार मर्त्यशिक्षण ही राम के अवतार का मुख्य उद्देश्य है। हनुमान् शिव के अवतार थे। वे भी लोकशिक्षार्थ दास्यभाव के आदर्श के संस्थापक हैं। उनके द्वारा उक्त शर्त सङ्गत नहीं है और राम द्वारा उस शर्त को स्वीकार करना भी सङ्गत नहीं है। भारतीय धर्म में किसी का उच्छिष्ट खाना या किसी को उच्छिष्ट देना निषिद्ध ही है—“नोच्छिष्टं कस्य- चिद् दद्याद् नाद्याच्चैव तथान्तरा।” (मनु० २।५६) । वाल्मीकिरामायण (४।४४।१२) के अनुसार राम हनुमान् को अभिज्ञान के रूप में अङ्गुलीयक (मुद्रिका) प्रदान करते हैं। पर बुल्के के अनुसार यह सब प्रक्षिप्त है। सीता द्वारा दिये हुए अभिज्ञानों के अनुकरण पर राम द्वारा दिये गये अभिज्ञान की भी कल्पना की गयी है। महाभारत के रामो- पाख्यान में भी इसकी चर्चा नहीं है, परन्तु यह कोई हेतु नहीं है। जब आर्ष ग्रन्थ में उसका प्रतिपादन है ही तब उसे प्रक्षेप कहने का कोई औचित्य नहीं है। आनन्दरामायण (१।८।९३-९७) के अनुसार राम ने हनुमान् को निजमन्त्र दिया था एवं सीता के भाल पर तिलक तथा कपोलों पर पत्रावलीरचना का वृत्तान्त सुनाया था। तोरवेरामायण में चित्रकूट के जल-विहार को अभिज्ञान माना गया है। इस प्रकार अन्य भी अभिज्ञान हो सकते हैं। कम्बरामायण के अनुसार राम ने सीता का नख-शिख स्वरूप भी बतलाया था, जिससे वानरों को खोजने में सुविधा हो । गुहाप्रवेश ५२६ वें अनु० में तृषित वानरों ने विन्ध्य की दक्षिण-पश्चिम कोटि पर ऋक्षबिल गुफा से जल पक्षियों को निकलते देख हनुमान् के नेतृत्व में प्रवेश किया। आगे बढ़कर उस प्रकाशमय सुवर्णनगरी में तापसी मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयम्प्रभा को देखा। मय ने उस नगरी का निर्माण किया था। हेमा अप्सरा में आसक्त होने के कारण इन्द्र ने मय का वध किया था। स्वयम्प्रभा ने वानरों को विविध फल भोजनार्थ दिये। आँखें बन्द कर सबको गुफा के बाहर ला दिया। वाल्मीकिरामायण (४।५२।१-३२) में बड़े उत्तम ढङ्ग से इस प्रसङ्ग का वर्णन है। उत्तरकाण्ड के अनुसार देवताओं ने मय को हेमा का प्रदान किया था। देवकार्यवश वह मय को छोड़ कर चली गयी। वियुक्त मय ने उस नगरी का निर्माण किया था। मय ने हेमा से मन्दोदरी पुत्री और दुन्दुभि तथा मायावी दो पुत्र उत्पन्न किये थे। हेमा से प्रेरित स्वयम्प्रभा मय को सूचना देने आयी, पर मय हेमा के विरह से मर चुका था। स्वयम्प्रभा का लौटकर हेमा को यह समाचार देने का साहस नहीं हुआ, अतः उसने वहीं तप करने का निश्चय कर लिया। नृसिंहपुराण तथा अग्निपुराण में तापसी के प्रभा, सुप्रभा आदि नाम दिये गये हैं। अभिनन्दकृत रामचरित में अङ्गद ने गुफा के द्वार पर दुर्दम दैत्य का वध किया था। अध्यात्मरामायण (४।६६।५१-८४) में कहा गया है कि विश्वकर्मा की पुत्री हेमा ने अपने नृत्य से शिव को प्रसन्न कर वह नगर प्राप्त किया था। ब्रह्मलोक जाते समय उसने अपनी सखी स्वयम्प्रभा को आदेश दिया तुम तपस्या करती रहो। त्रेतायुग में जब राम के दूत आयेंगे तब उनका आतिथ्य करना। तदनुसार स्वयम्प्रभा वानरों का सत्कार करके सबको गुफा के बाहर लायी और राम के दर्शन और स्तुति करके वह बदरीवन चली गयी। बाहर निकल कर वानरों ने देखा कि एक मास की अवधि पूरी हो चुकी है। सब लोग अत्यन्त निरुत्साह हो गये। अङ्गद के पुनः गुफा में प्रवेश कर वहीं निवास करने का प्रस्ताव किया। हनुमान् ने इसका विरोध किया। अन्त में सब प्रायोपवेशन में बैठ गये। सम्पाति ने उपवास करनेवाले वानरों से अपने भाई जटायु का नाम सुना और पास जाकर समाचार पूछा। अपनी कथा भी सुनायी और यह भी बताया कि सीता को रावण ले गया है। वह एक सौ योजन दूर समुद्र पार निवास करता है। उसने वानरों को समुद्र पार करने का परामर्श दिया। अन्त में जामवन्त
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१५ ने हनुमान् को उनके जन्म की कथा सुनाते हुए समुद्र-लङ्घन का आदेश दिया । हनुमान् की महिमा सुनकर सब वानरों ने विषादरहित होकर हनुमान् की स्तुति की । संस्तुत होकर महाबल हनुमान् महान् तेज से पूर्ण होकर अपने स्वाभा- विक बल का स्मरण करके बोले—मैं समुद्र पार जाकर भूमि का स्पर्श किये बिना पुनः लौट सकता हूँ । गरुड़, वायु और मेरी शक्ति समान है। इन दोनों को छोड़कर कोई भी मेरी गति का अनुसरण नहीं कर सकता । बादलों से उदित विद्युत् के समान में निमेषान्तरमात्र में निरालम्बन आकाश में उत्पतन कर सकता हूँ । सौ योजन ही नहीं हजारों योजन जाना मेरे लिए कुछ कठिन नहीं है। इन्द्र या ब्रह्मा के हाथ से अमृत लाऊँ या लङ्का को ही उठा लाऊँ । जाम्बवान् ने आश्वस्त करके कहा कि सीता का समाचार लेकर शीघ्र आ जाओ । तुम्हारे आने तक हम सब तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे । बुल्के ने यहाँ भी प्रक्षेप की कल्पना की है, जिसका निराकरण पीछे किया जा चुका है । सम्पाति की कथा के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं कि सम्पाति की कथा दो बार आयी है। प्रथम के अनुसार वृत्र-वध के बाद सम्पाति और जटायु दोनों भाई इन्द्र पर विजय प्राप्त करने के लिए आकाश-मार्ग से स्वर्ग जा रहे थे । सूर्यमण्डल के समीप पहुँचने पर जटायु को प्रचण्ड सूर्य किरणों से संत्रस्त देखकर सम्पाति ने अपने पक्षों से उसे ढँक लिया । फलतः सम्पाति के पक्ष जल गये और वह विन्ध्यगिरि पर गिर गया। बाद में सम्पाति को जटायु के सम्बन्ध में कुछ समाचार नहीं मिला । द्वितीय अपेक्षाकृत विस्तृत कथा में कहा गया है पहले सम्पाति जटायु के साथ निशाकर मुनि के पास जाया करता था । अतः पक्ष जलने के बाद भी सम्पाति निशाकर से भेंट करने गया था। वहाँ पहुँचकर उसने निशाकर से कहा हम दोनों भाई शक्ति-परीक्षा के लिए आकाश में सूर्य की ओर बढ़ने लगे । सूर्य के पास पहुँच कर हम दोनों भयभीत हो गये । जटायु पहले गिर गया । सम्पाति के पक्षों से सुरक्षित होकर वह जन- स्थान में सकुशल पहुँच गया । सम्पाति निःसहाय होकर विन्ध्य पर गिर गया उसने देहत्याग का विचार किया पर निशाकर ने उसे आश्वासन दिया कि राम के दूत सीता की खोज करने इधर आयेंगे। तुम उनको सीता का समाचार दोगे तब अपने पक्ष पुनः प्राप्त करोगे । कथा सुनाते सुनाते सम्पाति ने अनुभव किया कि उसके पक्ष बढ़ रहे हैं । उसने इसका श्रेय निशाकर को दिया ( सर्ग ६०-६३ ) । अन्य पाठों में भी सम्पाति निशाकर को ही अपने स्वास्थ्य-लाभ का श्रेय देता है । पर वानर इसे राम और लक्ष्मण का प्रभाव मानते हैं । आकाशवाणी ने वानरों के कथन का समर्थन किया । बुल्के द्वितीय वृत्तान्त को प्रक्षेप मानते हैं । इसी लिए उन्होंने दोनों कथाओं में परस्पर विरुद्ध बातों को दिखलाने का प्रयत्न किया है । परन्तु उनका यह प्रयत्न निराधार है, क्योंकि प्रथम कही हुई संक्षिप्त कथा का ही दूसरा विस्तृत रूप है । दोनों के अक्षरों पर ध्यान दिया जाता तो विरोध भी प्रतीत न होता । तिलक व्याख्याकार ने दोनों कथाओं का समन्वय किया है । “पुरा वृत्रवधे वृत्ते स चाहं च जयैषिणौ । आदित्यमुपयातो स्वो ज्वलन्तं रश्मिमालिनम् ॥” ( वा० रा० ४।५८।४ ) पुराकाल में वृत्रवध के अनुसार इन्द्र को अति प्रबल जानकर उनको जीतने के लिए जटायु और मैं दोनों स्वर्ग गये । गरुड़ के समान शीघ्र ही इन्द्र को जीतकर लौटते समय दर्प से दोनों आदित्य के पास गये । हम दोनों में जटायु अवसाद को प्राप्त होने लगा । मैंने स्नेह से परम विह्वल जटायु को अपने पक्षों से बचाया— “आवृत्त्याकाशमार्गेण जवेन स्वर्गंतौ भृशम् । मध्ये प्राप्ते तु सूर्ये तु जटायुरवसीदति ॥” ( वा० रा० ४।५८।५ )
५१६ रामायणमीमांसा षोडश यहाँ कुछ टीकाकार मानते हैं कि परस्पर जय की इच्छा से ही प्रथम आदित्य को जो प्राप्त कर ले वही प्रबल मान्य होगा । इस प्रतिज्ञा से आदित्य के पास दोनों गये । परन्तु उनके मतानुसार आवृत्त्या इस पर और इन्द्र- कर्तृक वृत्रवध-प्रसङ्ग की असंगति होगी । बुल्के ने भी वृत्र-वध के बाद ( इन्द्र पर ) विजय प्राप्त करने की इच्छा से आकाश-मार्ग से स्वर्ग जा रहे थे, यह अर्थ किया है। उनके अर्थ में इन्द्रप्रसंग की संगति तो हो जाती है, परन्तु जा रहे थे, यह उक्त श्लोक के किसी भी शब्द का अर्थ नहीं है । “स्वर्गतौ” शब्द का अर्थ तो यही है कि आकाश मार्ग से स्वर्ग पहुँच गये । साथ ही ‘आवृत्त्या' शब्द का उन्होंने स्पर्श भी नहीं किया । अतः आवृत्त्या का यही अर्थ ठीक है कि लौटते समय दर्प से हम दोनों आदित्य के पास पहुँच गये । इस तरह पहली कथा में ही इन्द्रविजय की इच्छा से हम दोनों स्वर्ग गये । लौटते समय दर्प से हम लोग आदित्य के पास गये । अर्थात् विजय करके लौट रहे थे । दूसरी बार उसी कथा का सम्पाति ने विस्तार से वर्णन किया । वहीं उसका कारण भी कहा गया है—
अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१७
अनुगमन से विन्ध्यगिरि में पतन आदि सुनाया। भगवन्, इन्द्रयुद्ध में हुए वज्रपातजनित व्रणों के कारण परिश्रान्त होने से सूर्य्यानुगमन से होनेवाले पक्षनाश के कारण लज्जा से व्याकुल होने से उत्तर देने में मैं समर्थ नहीं हूँ। इससे भी स्पष्ट है कि इन कथाओं में पूर्वापर विरोध नहीं है। पङ्खों की पुनरुत्पत्ति तथा स्वास्थ्य-लाभ में निशाकर के वचन का प्रभाव होते हुए भी राम और लक्ष्मण के प्रभाव का भी अपलाप नहीं किया जा सकता है । “उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम् । स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदैः ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत् । निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः ॥” (वा० रा० ४।६२।८-९) वानरों के देखते देखते उसके पङ्ख पुनः उत्पन्न हो गये । अरुणपत्रतुल्य उगते पङ्खों से युक्त अपने शरीर को देखकर उसे अतुल प्रसन्नता हुई और उसने कहा कि अमिततेजा मुनि के प्रभाव से आदित्य-किरणों से दग्ध मेरे पङ्ख पुनः नवीन हो गये हैं। यौवन काल में जो बल था वही फिर मुझमें हो गया है। मेरे पङ्खों की पुनरुत्पत्ति आप लोगों की सिद्धि की प्रत्यायक है। जैसे गुरु का कृतज्ञ भी ईश्वर का कृतज्ञ माना जाता है वैसे ही निशाकर मुनि की कृतज्ञता स्वीकार करने- वाला सम्पाति राम और लक्ष्मण का भी कृतज्ञ है ही। मुनि ने भी कहा था कि तुम्हारे पुनः उत्तम नवीन पङ्ख हो जायेंगे । पुराण में मैंने सुना है बहुत बड़ा कार्य होनेवाला है। मैंने तप से भी सब कुछ जाना है। राजा दशरथ के महातेजस्वी पुत्र राम होंगे। वे लक्ष्मण और सीता के साथ दण्डकारण्य में आयेंगे । देवताओं तथा दानवों से अवध्य राजा रावण सीता का हरण करेगा। वह सीता को नाना प्रकार का प्रलोभन देगा । परन्तु वह महाभागा यशस्विनी सीता अन्न-पान का त्याग कर देगी। इन्द्र उन्हें देवदुर्लभ अमृतप्रख्य परमान्न प्रदान करेंगे। सीता अग्राशन राम और लक्ष्मण के नाम पर भूमि में निर्वापकर उसे ग्रहण करेंगी । रामदूत वानर तुम्हारे पास आयेंगे। तुम उनसे राममहिषी सीता का समाचार कहना । तुम कहीं न जाकर देश और काल की प्रतीक्षा करो। तुम्हें पुनः पङ्ख प्राप्त होंगे। हम तुम्हें अभी सपङ्ख बना सकते हैं। परन्तु तुम यहाँ रहकर लोकों का परम कार्य करोगे। तुम्हें दोनों राजकुमारों राम और लक्ष्मण का, ब्राह्मणों का, गुरुओं का, मुनियों का, देवताओं का और इन्द्र का भी काम करना है। अर्थात् राम- दूतों को सीता का पता बताने से रावण का वध होगा। उससे सभी का हित होगा। मैं भी राम और लक्ष्मण को देखना चाहता हूँ। परन्तु अब अधिक काल तक प्राणों का धारण करना नहीं चाहता । अतः कलेवर त्याग रहा हूँ (सर्ग ६२) । इससे स्पष्ट है कि महर्षि भी राम और लक्ष्मण का महत्त्व मानते थे। राम का कार्य करने के अनन्तर ही उसका सपङ्ख होना वे उचित समझते थे । इस सर्ग से सीता के लिए इन्द्रदत्त पायस की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है और बुल्के का पक्ष खण्डित होता है । इसीलिए बुल्के ने इन सर्गों को ही प्रक्षिप्त मान लिया है। कम्बरामायण (४।१५) के अनुसार सूर्य ने सबसे पहले सम्पाति को आश्वासन दिया था कि जब वानर राम का नाम उच्चारण करेंगे उस समय तुम्हारे पङ्ख फिर से निकल आयेंगे । भावार्थरामायण (४।१६) में भी सूर्य के इस आश्वासन का उल्लेख है। अध्यात्मरामायण में मुनि का चन्द्रमा नाम है। उन्होंने सम्पाति को उपदेश देकर उसे शरीर त्यागने से रोका और नारायणावतार राम के दूतों की प्रतीक्षा करने का आदेश दिया । पङ्खों के पुनः निकलने से सम्पाति ने वानरों से कहा—जिनके नामस्मरणमात्र से दुष्ट जन भी इस अपार संसारसागर को पारकर विष्णु के शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं। तुम लोग उन्हीं भगवान् के भक्त हो। फिर समुद्र के पार करने
५१८ रामायणमीमांसा षोडश में क्यों असमर्थ होओगे । बुल्के कहते हैं इस प्रकार हम देखते हैं कि सम्पाति की कथा धीरे-धीरे अलौकिक घटनाओं के परिवर्धन से विकसित होकर अन्त में भगवान् राम के गुणगान में परिणत हुई । इससे स्पष्ट है, बुल्के इसे वस्तुस्थिति नहीं मानते, किन्तु द्वितीय कथा को भक्तकृत कल्पनामात्र मानते हैं । परन्तु यह उनकी केवल दुरभिसन्धि है, क्योंकि जब आर्ष विज्ञान पर आधारित वाल्मीकिरामायण में सम्पाति की विस्तृत कथा विद्यमान है तब केवल अलौकिक घटनाओं के कारण उसे प्रक्षेप या कल्पनामात्र कैसे कहा जाय ? क्या बाइबिल की कथाओं में अलौकिक घटनाओं के कारण बाइबिल का प्रामाण्य मान्य नहीं है ? ❖