रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१२ रामायणमीमांसा षोडश के रूप में सामने आती हैं, यथार्थता के आधार पर नहीं। महर्षि वाल्मीकि की ऋतम्भरा प्रज्ञा प्रसूत वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ ही वस्तुस्थिति का परिचायक है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम के सम्मुख इन्द्र, महेन्द्र, ब्रह्मा तथा त्रिपु- रान्तक भी खड़े नहीं हो सकते थे । फिर अन्य की तो बात ही क्या है— “इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा । रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ।” (वा० रा० सुन्दरकाण्ड) रामचरितमानस के अनुसार अङ्गद एवं हनुमान् दोनों ही राम के परम प्रिय भक्त हैं— प्रभु आज्ञा धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ । सोइ गुनसागर ईस राम कृपा जापर करहु ॥ स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदर दयउ । अस विचारि युवराज तन पुलकित हरषित भयउ ॥” ( रा० मा० ६।१७ क और ख ) वालि-वध के दोष का निवारण वाल्मीकिरामायण में स्पष्ट है, परन्तु बुल्के जैसे पाश्चात्य लोग तो केवल प्रक्षिप्त कहकर ही सब कुछ उड़ा देना चाहते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार इन्द्रप्रदत्त हेममाला के कारण शत्रु बल- हीन हो जाता था। इसी लिए कहा जाता है कि राम ने वाली को छिप कर मारा था । तोरवेरामायण ( ४।४ ) के अनुसार शत्रु की आधी शक्ति वाली को मिल जाती थी। भावार्थरामायण में भी यही बात उल्लिखित है। जो भी हो, आर्ष वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम ने वाली को मारा । वाल्मीकिरामायण के अनुसार छिपने की कोई बात नहीं है । युद्ध करते करते जब सुग्रीव क्षीण होने लगा तब राम ने बाण चलाया— “ततो रामो महातेजा आर्तं दृष्ट्वा हरीश्वरम् । स शरं वीक्षते वीरो वालिनो वधकाङ्क्षया ।” ( वा० रा० ४।१६।३३ ) ज्यातल के निर्घोष से पक्षिगण त्रस्त हो गये । मृगगण भाग चले । ऐसा लगा मानो प्रलय होने जा रहा हो । वाल्मीकिरामायण से इतना ही विदित होता है कि माला के प्रभाव से प्राण एवं तेज तथा पराक्रम ने वालि को नहीं छोड़ा । प्रतीत होता था कि माला, उसका देह और राम का वह बाण लक्ष्मी ही त्रिविध रूप से दीप्त हो रही है ( वा० रा० ४।१५।७ ) । वाली ने भी राम पर यह दोष नहीं लगाया कि आपने मुझे छिपकर मारा है। किन्तु उसका यही आरोप था कि अन्य से युद्ध करते हुए को आपने मारा । “न मान्येन संरब्धं प्रमत्तं वेद्धुमर्हसि ।” ( वा० रा० ४।१७।२१ ) यह हो सकता है कि युद्ध करनेवाले प्रतिद्वन्द्वी का अर्धबल उसमें आ जाता हो । परन्तु राम ने तो दण्डधर के रूप में उसे दण्ड दिया था, अतः उनके सम्बन्ध में यह बात लागू नहीं हो सकती थी। पउमचरियं के अनुसार वाली सुग्रीव को राज देकर श्रमण हो गया। किन्तु साहसगति नामक विद्याधर ने सुग्रीव का रूप धारण कर उसकी पत्नी और राज्य छीन लिया । राम सेना को लेकर सुग्रीव के साथ किष्किन्धा पहुँचे । साहसगति ने सामना किया। दोनों में घोर युद्ध हुआ । सुग्रीव आहत हो गया । राम ने बताया कि पहचानने में गड़बड़ी होने से साहसगति को नहीं मारा । दुबारा युद्ध में साहसगति को मारा । उत्तरपुराण (६८।४४०-४६३) के अनुसार लक्ष्मण ने वाली को मारा था। अनामकं जातकं के अनुसार राम का धनुष देखकर वाली भाग गया । महावीरचरित एवं अनर्घराघव में वाली राम द्वारा द्वन्द्वयुद्ध में मारा जाता है ।