रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 590, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१३ राम की चातुर्मास्य-साधना ५२३ वें अनु० में बुल्के राम की वर्षाकालीन साधना के सम्बन्ध में कहते हैं । राम ने लक्ष्मण के साथ प्रस्त्रवण गिरि की एक गुफा में वर्षाऋतु बितायी ( वा० रा० ४ । सर्ग २७, २८ ) । अग्निपुराण ( ८।५ ) के अनुसार माल्यवान् पर्वत पर राम ने चातुर्मास्य यज्ञ किया । देवीभागवत ( ३।३० ) के अनुसार नारद के परामर्श से राम ने नवरात्रोपासना की । सिंहारूढ़ा भगवती से राम विजय का वरदान पाते हैं । विजयापूजा के बाद राम लङ्का को प्रस्थान करते हैं । शिवपुराण ( वेङ्कटेश प्रेस उमासंहिता ३।५३-५५ ) में कहा गया है कि राम ने शिव की आराधना की है । उससे उन्हें शिव से धनुष, बाण तथा ज्ञान प्राप्त हुआ । शिवपुराण ( नवलकिशोर प्रेस शतरुद्रसंहिता अध्याय ३४-३९ ) में राम की शिवपूजा का विस्तृत वर्णन है । अन्त में अन्य देवताओं के साथ शिव प्रकट होते हैं और राम को धनुष तथा अपने अन्य अस्त्र देते हैं । अन्य देवताओं ने भी अपने अपने अस्त्र राम को दिये और उनकी सहायता के लिए देवता लोग रीछ और वानर हुए । शिवजी ने भी हनुमान् के रूप में प्रकट होकर प्रत्यक्ष ही राम की सहायता करने का वचन दिया और राम को शिवगीता का उपदेश दिया । शिवगीता ( वेङ्कटेश प्रेस ) में अगस्त्य ने राम को पाशुपतव्रत करने का उपदेश दिया था । राम के द्वारा पाशुपतव्रत करने पर शिवजी ने दिव्य धनुष के साथ पाशुपत अस्त्र प्रदान किया था । प्रायः पाश्चात्य इन अनेक विचित्र उपासनाओं का भेद देख कर भी सबकी अप्रामा- णिकता की कल्पना करते हैं । परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से सबका समन्वय ही उचित है । अतः श्रीराम ने शिवजी की तथा भगवती की भी उपासना की हो तो इसमें कोई विरोध की बात नहीं है । कल्पभेद का समाधान तो है ही । वानरों का प्रेषण ५२४ वें अनु० में बुल्के कहते हैं, प्रचलित वाल्मीकिरामायण की अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त है । इसमें वानरों के प्रेषण का अपेक्षाकृत अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है ( सर्ग २९-४७ ) । यह कहना भी गलत है, क्योंकि वह सब परम्पराप्राप्त है और टीकाकारों ने उसपर टीकाएँ लिखी हैं । ५१०-५११ अनु० का खण्डन पीछे हो चुका है । महाभारत के उद्योग पर्व का विस्तार देखते हुए यहाँ यह संक्षेप ही है । बुल्के की अपनी बुद्धि को छोड़कर इन सर्गों के प्रक्षिप्त होने में कोई भी प्रमाण नहीं है । हनुमान् के परामर्श से सुग्रीव ने नील को सेना बुलाने का आदेश दिया ( सर्ग २९ ) । राम की प्रेरणा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में प्रवेश किया । उनको कुपित जानकर तारा को पुरस्कृत कर नम्रतापूर्वक सुग्रीव ने क्षमा माँग ली । राम ने सुग्रीव का प्रेमपूर्वक स्वागत किया । सेरीराम के अनुसार सम्बूरान ( जम्बू ) महाजम्बू इन्द्र के शाप से वानर बन गया था । वह वाली का मित्र था । सुग्रीव सम्बूरान के कारण राम की सहायता से डरता था । लक्ष्मण ने पत्र लिखकर सम्बूरान से विष्णु के अवतारी राम की अधीनता स्वीकार करने को कहा, पर उसने राम अवतार पर विश्वास नहीं किया । जब हनुमान् रात्रि में हरण कर उसे राम के पास ले गये । तब उसने राम को देखकर उनका अवतारत्व स्वीकार किया । जाम्बवान् ने ज्योतिष द्वारा यह जान लिया कि सीता ने देह-त्याग का विचार छोड़ दिया है । और रावण चार धनुष की दूरी तक ही सीता के पास जा सकता है उससे अधिक निकट जाने में असमर्थ है । इसपर राम ने कहा कि जाम्बवान् की बात की सच्चाई जानने के लिए लङ्का जाने को कौन तैयार है । सबों की अनिच्छा देखकर राम ने वाली का स्मरण किया और हनुमान् को बुलाया । हनुमान् इस शर्त पर जाने को तैयार हुए कि राम के साथ एक पत्तल में भोजन की अनुमति मिल जाय । राम ने समुद्र-स्नान करने का आदेश दिया और इस शर्त को स्वीकार किया । वस्तुतः यह ६५