भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५१४ रामायणमीमांसा षोडश विकृति ही है, क्योंकि भारतीय दृष्टि के अनुसार राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। वाल्मीकिरामायण वेद का उपबृंहणरूप ही है। भागवत के अनुसार मर्त्यशिक्षण ही राम के अवतार का मुख्य उद्देश्य है। हनुमान् शिव के अवतार थे। वे भी लोकशिक्षार्थ दास्यभाव के आदर्श के संस्थापक हैं। उनके द्वारा उक्त शर्त सङ्गत नहीं है और राम द्वारा उस शर्त को स्वीकार करना भी सङ्गत नहीं है। भारतीय धर्म में किसी का उच्छिष्ट खाना या किसी को उच्छिष्ट देना निषिद्ध ही है—“नोच्छिष्टं कस्य- चिद् दद्याद् नाद्याच्चैव तथान्तरा।” (मनु० २।५६) । वाल्मीकिरामायण (४।४४।१२) के अनुसार राम हनुमान् को अभिज्ञान के रूप में अङ्गुलीयक (मुद्रिका) प्रदान करते हैं। पर बुल्के के अनुसार यह सब प्रक्षिप्त है। सीता द्वारा दिये हुए अभिज्ञानों के अनुकरण पर राम द्वारा दिये गये अभिज्ञान की भी कल्पना की गयी है। महाभारत के रामो- पाख्यान में भी इसकी चर्चा नहीं है, परन्तु यह कोई हेतु नहीं है। जब आर्ष ग्रन्थ में उसका प्रतिपादन है ही तब उसे प्रक्षेप कहने का कोई औचित्य नहीं है। आनन्दरामायण (१।८।९३-९७) के अनुसार राम ने हनुमान् को निजमन्त्र दिया था एवं सीता के भाल पर तिलक तथा कपोलों पर पत्रावलीरचना का वृत्तान्त सुनाया था। तोरवेरामायण में चित्रकूट के जल-विहार को अभिज्ञान माना गया है। इस प्रकार अन्य भी अभिज्ञान हो सकते हैं। कम्बरामायण के अनुसार राम ने सीता का नख-शिख स्वरूप भी बतलाया था, जिससे वानरों को खोजने में सुविधा हो । गुहाप्रवेश ५२६ वें अनु० में तृषित वानरों ने विन्ध्य की दक्षिण-पश्चिम कोटि पर ऋक्षबिल गुफा से जल पक्षियों को निकलते देख हनुमान् के नेतृत्व में प्रवेश किया। आगे बढ़कर उस प्रकाशमय सुवर्णनगरी में तापसी मेरुसावर्णि की पुत्री स्वयम्प्रभा को देखा। मय ने उस नगरी का निर्माण किया था। हेमा अप्सरा में आसक्त होने के कारण इन्द्र ने मय का वध किया था। स्वयम्प्रभा ने वानरों को विविध फल भोजनार्थ दिये। आँखें बन्द कर सबको गुफा के बाहर ला दिया। वाल्मीकिरामायण (४।५२।१-३२) में बड़े उत्तम ढङ्ग से इस प्रसङ्ग का वर्णन है। उत्तरकाण्ड के अनुसार देवताओं ने मय को हेमा का प्रदान किया था। देवकार्यवश वह मय को छोड़ कर चली गयी। वियुक्त मय ने उस नगरी का निर्माण किया था। मय ने हेमा से मन्दोदरी पुत्री और दुन्दुभि तथा मायावी दो पुत्र उत्पन्न किये थे। हेमा से प्रेरित स्वयम्प्रभा मय को सूचना देने आयी, पर मय हेमा के विरह से मर चुका था। स्वयम्प्रभा का लौटकर हेमा को यह समाचार देने का साहस नहीं हुआ, अतः उसने वहीं तप करने का निश्चय कर लिया। नृसिंहपुराण तथा अग्निपुराण में तापसी के प्रभा, सुप्रभा आदि नाम दिये गये हैं। अभिनन्दकृत रामचरित में अङ्गद ने गुफा के द्वार पर दुर्दम दैत्य का वध किया था। अध्यात्मरामायण (४।६६।५१-८४) में कहा गया है कि विश्वकर्मा की पुत्री हेमा ने अपने नृत्य से शिव को प्रसन्न कर वह नगर प्राप्त किया था। ब्रह्मलोक जाते समय उसने अपनी सखी स्वयम्प्रभा को आदेश दिया तुम तपस्या करती रहो। त्रेतायुग में जब राम के दूत आयेंगे तब उनका आतिथ्य करना। तदनुसार स्वयम्प्रभा वानरों का सत्कार करके सबको गुफा के बाहर लायी और राम के दर्शन और स्तुति करके वह बदरीवन चली गयी। बाहर निकल कर वानरों ने देखा कि एक मास की अवधि पूरी हो चुकी है। सब लोग अत्यन्त निरुत्साह हो गये। अङ्गद के पुनः गुफा में प्रवेश कर वहीं निवास करने का प्रस्ताव किया। हनुमान् ने इसका विरोध किया। अन्त में सब प्रायोपवेशन में बैठ गये। सम्पाति ने उपवास करनेवाले वानरों से अपने भाई जटायु का नाम सुना और पास जाकर समाचार पूछा। अपनी कथा भी सुनायी और यह भी बताया कि सीता को रावण ले गया है। वह एक सौ योजन दूर समुद्र पार निवास करता है। उसने वानरों को समुद्र पार करने का परामर्श दिया। अन्त में जामवन्त

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