रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि अर्वाचीन कथाओं में वाली की मुक्ति का वर्णन है, क्योंकि पद्मपुराण आदि अर्वाचीन नहीं हैं। पद्मपुराण ( ४।११२।१६६-१६९ ), अध्यात्मरामायण ( ४।२ ), आनन्दरामायण ( १।८। ६३ ), रङ्गनाथरामायण ( ४।९ ), कम्बरामायण, रामचरितमानस ( ४।१०।१ ) आदि के अनुसार राम को परब्रह्म विष्णुस्वरूप मानकर बाली ने उनकी स्तुति की और अनायास ही देह-त्याग किया — "रामचरन दृढ़ प्रोति करि बालि कीन्ह तनुत्याग । सुमन माल जिमि कण्ठ ते गिरत न जानइ नाग ।।” ( रा० मा० ४।१० ) कुछ राम-कथाओं में कहा गया है कि द्वापरान्त में वाली ने भील के रूप में प्रकट होकर विष्णुस्वरूप राम से अन्य ( कृष्ण ) जन्म में बदला लिया था। महाभारत मुसलपर्व अध्याय ५ के अनुसार जरानामक व्याध ने सुप्त मृग समझ कर कृष्ण पर बाण चलाया था। महानाटक ( ५।५७;१४।७५ ) तथा आनन्दरामायण ( १!८।६६-६८ ) के अनुसार राम ने आहत वाली से कहा था, तुम द्वापरान्त में भील बनकर मेरे पैर में बाण चलाओगे, तभी तुम्हारी मुक्ति होगी । वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम ने मनुस्मृति के दो श्लोक उद्धृत किये थे — “राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात् प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ।।" (वा० रा० ४।१८।३१,३२) उनके अनुसार पाप करनेवाले प्राणी राजा के द्वारा दण्डित होकर निर्मल हो सुकृती सन्तों के समान स्वर्ग जाते हैं । राजा दण्ड दें अथवा छोड़ दें, पाप करनेवाला सर्वथा पाप से मुक्त हो जाता है। परन्तु उचित दण्ड न देने से राजा उस पाप का भागी होता है। उसके अनुसार वाली का कल्याण उसी जन्म में हो गया। रामचरितमानस की परम्परा के अनुसार उसे दिव्य भगवत्पादपद्म की प्राप्ति हो गयी। कल्पान्तरीय कथाओं के अनुसार वाली कृष्ण के दर्शन के अनन्तर मुक्त हुआ है। इस तरह कल्पभेद से दोनों ही कथाएँ सङ्गत हैं। तारा के शाप की बात भी कल्पान्तरीय समझनी चाहिये । ५२१ वें अनु० में वाल्मीकिरामायण में अङ्गद बार-बार सुग्रीव की कठोरता का उल्लेख करता है। इस प्रसङ्ग में राम का नाम भी लेता है — "भेतव्यं तस्य सततं रामस्य च महात्मनः ।” ( वा० रा० ४।४९।९ ) “इहास्ति नो नैव भयं पुरन्दरान्न राघवाद् वानरराजतोऽपि वा ।” ( वा० रा० ४।५३।२६ ) अर्थात् तीक्ष्णदण्ड सुग्रीव से डरना चाहिये और महात्मा राम से भी डरना चाहिये । इस मायानिर्मित बिल में हम लोगों को इन्द्र तथा राघव तथा वानरराज से भी भय नहीं है । परन्तु यह केवल विपन्न अवस्था की उक्ति है । वस्तुस्थिति की परिचायिका नहीं है । बुल्के आदि कहते हैं, महानाटक में कहा गया है कि अङ्गद ने दूतकार्य के लिए जाते समय राम के प्रति वैर तथा उनका वध करने की अभिलाषा प्रकट की थी ( अङ्क ८।३ ) । युद्ध के पश्चात् अयोध्या पहुँच कर अङ्गद ने राम का युद्ध के लिए आह्वान किया था, किन्तु एक आकाशवाणी से यह जानकर शान्त हो गया था कि वालि-वध का प्रतीकार कृष्णावतार के समय भीलरूपी वाली के द्वारा होनेवाला है ( अङ्क १४।७१-७६ ) । हिकायत महाराज रावण के अनुसार अङ्गद ने द्वन्द्वयुद्ध में राम को हरा दिया । राम ने विभीषण को वाली की समाधि पर भेजा था । विभीषण वाली को देखकर अङ्गद को राजा बनाने का आदेश देकर अन्तर्धान हो गया । वस्तुतः ऐसी कथाएँ प्रतिक्रिया