रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 580, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंइसी तरह वेद, रामायण, महाभारत तथा पुराणों का स्वरूप और प्रामाण्य न समझनेवाले पाश्चात्य रामायण आदि के सम्बन्ध में भी अर्थ का अनर्थ करते हैं। वस्तुतः पूर्वोत्तर-मीमांसाओं तथा अन्य दर्शनों में वेदों की अपौरुषेयता, अनादिता एवं स्वतःप्रामाण्य पर पूर्णरूप से विचार किया गया है। रामायण, महाभारत तथा पुराण आदि आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों का भी प्रामाण्य कहा गया है। उस दृष्टि से वेदों, इतिहासों और पुराणों का समन्वय करके निर्धारित अर्थ ही वेदार्थ या पुराणार्थ होता है। अन्यथा तो रामायण एवं तथाकथित आदिरामायण का भी प्रामाण्य कैसे होगा ? सर्वत्र अनास्था होने से सीता और राम नाम की कोई वस्तु भी सिद्ध न हो सकेगी। यही स्थिति ईसाई, मोहमडन आदि के ग्रन्थों की भी होगी। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के अनुसार यह निश्चित है कि धर्मग्लानि और अधर्माभ्युत्थान के निवारणार्थ धर्म-संस्थापनार्थ, विशेषतः अमलात्मा परमहंस महा- मुनीन्द्रों के लिए भक्तियोग विधानार्थ परब्रह्म का ही विष्णु, शिव, राम, कृष्ण आदि के रूप में आविर्भाव होता है। "एकं ज्योतिरभूद् द्वेधा" के अनुसार एक ही दिव्य ब्रह्मज्योति सीता-राम के रूप में व्यक्त होती है। जल और तरङ्ग, सूर्य और प्रभा, चन्द्र और चन्द्रिका तथा अमृत और मधुरता के तुल्य आनन्दसिन्धु एवं उसका माधुर्यसारसर्वस्व अभिन्न ही वस्तु है। इस दृष्टि से जलतरङ्ग एवं अमृत-माधुर्य के समान ही उनका विरह (विश्लेष) भी असम्भव है। इस दृष्टि से सीता-राम का वियोग असम्भव ही है। लक्ष्मीरूप से सीता सदा राम के वक्षःस्थल पर श्रीचिह्न के रूप में विराजमान हैं। व्यावहारिकरूप में एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम के रूप में व्यक्त है। लङ्कागमन आदि कार्यार्थ मायासीता की कल्पना स्वाभाविक ही है। जैसे वाल्मीकिरामायण के द्वारा सीता-राम का आविर्भाव उक्त है वैसे ही पुराणों द्वारा मायासीता का लङ्कागमन तथा वनवास आदि भी उक्त है। बुल्के की दृष्टि में वाल्मीकि- रामायण भी मिलावट से रहित नहीं है। इतना ही क्यों पाश्चात्यों ने तो वेदों में भी मिलावट की कल्पना की है, पर उनकी ये सब कल्पनाएँ निष्प्रमाण ही हैं।