भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 581

षोडश अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०९वें अनु० में किष्किन्धाकाण्ड की कथावस्तु का विश्लेषण किया गया है। राम द्वारा हनुमान् की शुद्ध भाषा और व्याकरण का अध्ययन दाक्षिणात्य पाठ में है, अन्य दो पाठों में नहीं है (वा० स० ४।३।२८-३८)। वालि- वध के पश्चात् सुग्रीव का पश्चात्ताप तथा राम द्वारा तारा को सान्त्वना प्रदान (सर्ग २४), प्रस्त्रवण गिरि का वर्णन, वर्षा-ऋतु का त्रिष्टुप् छन्द में वर्णन, तारा और लक्ष्मण का संवाद, लक्ष्मण को क्रुद्ध देखकर उनको शान्त करने के लिए सुग्रीव द्वारा तारा को भेजना। इसके अतिरिक्त दाक्षिणात्य पाठ २१वाँ तथा ३९वां सर्ग पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता। उक्त दोनों सर्ग गौड़ीय पाठ में विद्यमान हैं। भारतीय परम्परा में शाखाभेद से वेदों के पाठ-भेद के समान वाल्मीकिरामायण, सप्तशती आदि के भी सभी पाठ-भेद प्रामाणिक ही हैं। परन्तु बुल्के इसी कारण प्रक्षेप सिद्ध करने का भी प्रयत्न करते हैं। राम के प्रति तारा का यह शाप कि सीता थोड़े समय तक आपके पास रहकर भूतल में प्रवेश करेंगी। सम्पाति का अपने पुत्र सुपार्श्व को बुलाना जो अङ्गद को अपनी पीठ पर समुद्र के उस पार ले जाने का प्रस्ताव करता है। केसरी द्वारा दिग्गज धवल का वध, जिसके लिए उसने वरस्वरूप मरुत्-विक्रम पुत्र हनुमान् को प्राप्त किया था। उक्त वृत्तान्त गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ में मिलते हैं, दाक्षिणात्य पाठ में नहीं मिलते तथापि सिद्धान्तदृष्टि से समन्वित अर्थ का ग्रहण करना उचित है। ५११वें अनु० में बुल्के कहते हैं वालिवध के दोष से राम को बचाने का मार्ग अपनाया गया है। सर्ग १७ और १८ प्रक्षेप हैं। इस अंश का खण्डन पीछे किया जा चुका है। वस्तुतः ये सर्ग प्रक्षिप्त नहीं हैं। दिग्वर्णन को भी वे प्रक्षिप्त मानते हैं: हेतु यह देते हैं कि महाभारत के रामोपाख्यान में इसका वर्णन नहीं है। सर्ग ४५ में सभी दिशाओं में वानरों का प्रस्थान वर्णित है। परन्तु उनका यह सब कथन निस्सार है। महाभारत का रामोपाख्यान कसौटी नहीं है। वह तो वाल्मीकिरामायण का संक्षेप माना गया है। भारतीय शास्त्रों में संक्षेप और विस्तार से वर्णन की पद्धति होती है। महाभारत में भी पहले संक्षेप में वर्णन किया जाता है। पश्चात् उसी अंश का विस्तृत वर्णन होता है। बुल्के का प्रामाणिक पाठ निर्धारण भी वानरीय पङ्कज-विश्लेषण से अधिक कुछ भी नहीं है। तभी तो उनकी दृष्टि में ६०० श्लोकों में १५० प्रामाणिक ठहरते हैं। उनसे भी कोई और महामति विश्लेषण करेगा तो पाँच ही श्लोक प्रामाणिक सिद्ध होंगे। परन्तु उनकी प्रामाणिकता स्वयं में ही प्रमाणशून्य है। सर्ग ३१, ३२, ३५, ३७, ३९ आदि भी याकोबी के अनुसार प्रक्षिप्त हैं, परन्तु भारतीय परम्परा में वे सभी पाठ प्रामाणिक हैं। उनका पाठानुष्ठान होता है। टीकाकारों ने उनपर टीकाएँ लिखी हैं। ऋषि निशाकर और सम्पाति की कथा को भी सर्ग ६०-६३ वे प्रक्षिप्त कहते हैं। इसमें भी अनावश्यक विस्तृत वर्णन को ही हेतु कहा गया है जो कि हेत्वाभास ही सिद्ध होता है। हनुमान् की जन्मकथावाले सर्ग को भी वे वाल्मीकिकृत नहीं मानते हैं। ये सब कल्पनाएँ वैसी ही हैं जैसे कोई अल्पज्ञ प्राणी अपने घर में बैठा हुआ कामायनी के अंशों को अस्पष्टता के कारण प्रक्षेप कहने का साहस करे। इसी तरह किष्किन्धा के अन्य सर्गों को भी परस्पर विरोधी उल्लेखों के कारण वे प्रतिभाशाली वाल्मीकि की कृति नहीं मानते हैं। जैसे ४।२४, ७।२ तथा ५९।३ में कहा गया है कि राम अथवा वानर सीता के अपहर्ता के नाम से अनभिज्ञ हैं। परन्तु ७।१९, १७।५०, २६।१७ आदि में उनके नाम तथा उनकी राजधानी लङ्का (३५।१५) का बारम्बार उल्लेख हुआ है। सर्ग ५८ में सम्पाति का कहना कि मैंने स्त्री का अपहरण करते हुए रावण को आकाश में