भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

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अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०५ देखा था (श्लोक १५) । किन्तु अगले सर्ग में वही फिर कहता है मैंने अपने पुत्र सुपार्श्व से सीता के अपहरण के विषय में सुना था (५९।६), अतः यह सब प्रक्षेप ही है; परन्तु यह सब कथन भी अनभिज्ञताजन्य ही है। यदि उन्होंने परम्पराप्राप्त टीकाओं को देखा होता तो उनकी भ्रान्ति दूर हो जाती । तिलककार ने "तच्च न ज्ञायते रक्षः" (४।१४) पर "विशिष्येति शेषः" कहकर उसी का समाधान किया है । अर्थात् सामान्य ज्ञान होने पर भी उसकी विशेषताएँ अज्ञात हैं। यों तो "घटमहं न जानामि" कहनेवाला भी सामान्यरूप से घट को जानता ही है। तभी तो अज्ञान को घटविशेषण से विशेषित करता है। “न जाने निलयं तस्य सर्वथा पापरक्षसः । सामर्थ्यं विक्रमं वापि दुष्कुलेयस्य वा कुलम् ॥” (७२) इसकी भी तिलक टीका देखनी चाहिये । वस्तुतः पूर्वापरविरोध का परिहार किये बिना तो वेद, रामायण, धर्मशास्त्र किसी का भी अर्थ निश्चित न होगा । किसी भी संविधान में ऐसे पूर्वापर विरोध का परिहार करना अनिवार्य है। तिलककार के अनुसार सुग्रीव कहते हैं उस पाप करनेवाले राक्षस के निलय स्थान (गुप्तवास स्थान) को मैं नहीं जानता हूँ । बुल्के ने निलय का अर्थ केवल घर समझ लिया है, इसी लिए उन्हें ऐसी भ्रान्ति हुई है। किन्तु यहाँ निलीयतेऽस्मिन् जिसमें छिपा जाय इस विशेष अर्थ में 'निलय' शब्द का प्रयोग है। क्योंकि पाप करनेवाला राजधानी में रहना पसन्द नहीं कर सकता। साथ ही उसके सामर्थ्य, शौर्य और "विक्रमं पादविक्षेपं करोति यत्र" इस व्युत्पत्ति के अनुसार वासनगर को मैं नहीं जानता। दुष्कुलेय से यह ध्वनित होता है कि वह राक्षसकुलप्रसूत है इतना विदित है। टीकाकार आगे स्वयं लिखते हैं कि अतः हनुमान् आदि को भेजते समय सुग्रीव ने लङ्का की चर्चा करके यह कहा था कि इन्द्रतुल्य दुरात्मा रावण का वही देश है— “स हि देशस्तु वध्यस्य रावणस्य दुरात्मनः । राक्षसाधिपतेर्वासः सहस्राक्षसमद्युतेः ॥” (वा० रा० ४।४१।२५) पर इसका पूर्व से विरोध नहीं होगा, क्योंकि इतना जानतमात्र से उसका वध सम्भव नहीं है। अतः इतनी जानकारी निष्फल ही है। आज भी सामान्य ज्ञान होने पर भी संग्राम के लिए विशेष जानकारी अपेक्षित होती है। इसी लिए गुप्तचरों द्वारा शत्रु के विभिन्न रहस्यस्थानों, विशिष्ट बलों तथा शस्त्रास्त्रों की जानकारी प्राप्त करने के लिए प्रयास किया जाता है। यही समाधान अन्य अंशों का भी है। (७।१९) आदि में रावण आदि के नाम का निर्देश और अज्ञान दोनों का यही समन्वय है । इसी तरह टीकाकारों ने ५८ एवं ५९ वें सर्ग के विरोधाभास का भी परिहार किया है । सर्ग ५८ वें में सम्पाति ने बताया है कि सर्वाभरणभूषिता रूपसंपन्ना तरुणी रावण द्वारा हरण की जाती हुई मैंने देखी थी। वहीं और भी कहा गया है—वह राम नाम और लक्ष्मण नाम बराबर पुकार रही थी एवं गात्रविधूनन करती हुई भूषणों को फेंक रही थी । राम नाम के कीर्तन से मैं उसे सीता समझता हूँ (वा० रा० ४।५८।१४-२३ ) । किन्तु सर्ग ५९ श्लो० ६ से अपनी बात को प्रमाणान्तर से प्रत्यायित करने के लिए उसने सुपार्श्व के द्वारा सुनी हुई कथा का वर्णन किया। उस कथा में ऋषियों ने सुपार्श्व को बताया था दाशरथि राम की पत्नी जनकात्मजा का रावण ने हरण किया है। स्वयं उसने राम राम की पुकार से उस तरुणी को राम-पत्नी समझा। परन्तु सुपार्श्व द्वारा उसे विदित हुआ कि ऋषियों ने उसे राम-पत्नी बताया है । टीकाकार ने कहा है—"प्रतिसंहृक्तान् त्यक्तप्रायो- पवेशनान् सीताश्रुतिसमाहितान् सीताविषयवृत्तान्तश्रवणे सावधानान् पुनराश्वासयन्नन्यसाक्षिकतावचनेन भूयः स्वोक्तार्थं प्रत्याययन् अर्थात् सम्पाति का वचन सुनकर वानरों ने प्रायोपवेशन त्याग दिया और सीता के वृत्तान्त का ६४