रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ रामायणमीमांसा षोडश
श्रवण करने के लिए सावधान हो गये तब सम्पाति ने उन्हें पुनः आश्वस्त करते हुए, अपनी बातों के सम्बन्ध में अन्य की साक्षिता दिखलाते हुए स्वोक्त अर्थ में विश्वास उत्पन्न कराते हुए सुपार्श्ववर्णित वृत्तान्त सुनाया— “स हरीन् प्रतिसंमृक्तान् सीताश्रुतिसमाहितान् । पुनराश्वासयन् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् ॥” ( वा० रा० ४।५९।५ ) इस तरह विचार करने पर यहाँ असमन्वय का प्रश्न ही नहीं है । संगति का लक्षण, उसके भेद, विरोधा- भास एवं विरोध-परिहार सम्बन्धी भारतीय परम्परा न जानने के कारण ही पाश्चात्य विद्वानों को भारतीय शास्त्रों में पद पद पर भ्रान्ति होती है। भारतीय विचारपद्धति न समझने के कारण ही पाश्चात्य लोग वेदों में भी असंगति दिखलाने का साहस करते हैं। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है— “अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।२ ) “प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्” ( तै० उ० ३।३ ) तथा “मनो ब्रह्मेति । विज्ञानं ब्रह्मेति । आनन्दो ब्रह्मेति ( तै० उ० ३।४, ५, ६ ) । इन वचनों को देखकर वे कहते हैं वैदिक बहुत शीघ्रता से अपनी कही बातों को भूल जाते हैं। पहले वायु के लिए कहा “नमस्ते वायो त्वमेव ब्रह्मासि त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि” ( तै० उ० १।१ ) और फिर अन्न, प्राण आदि को कह दिया, परन्तु यह वेद का दोष नहीं उनकी शक्ति, लक्षणा आदि विविध वृत्तियों को न जानने से अनभिज्ञों को भ्रान्ति होती है । “भ्रमयति भारती त उरुवृत्तिभिरुक्थजडान् ।” ( भा० पु० १०।८७।३६ ) वेदस्तुति में कहा गया है भगवन्, आपकी वेदरूप वाणी विविध वृत्तियों द्वारा उक्थजड़ों को भ्रम में डाल देती है । ५१२ वें अनु० में बुल्के किष्किन्धाकाण्ड के विकास पर विचार करते हैं । वस्तुतः विकास का भी अर्थ वही है जो उनकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं था उस अंश का विस्तार ही विकास है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार सुग्रीव राम-लक्ष्मण को देखकर तथा उनको वाली द्वारा प्रेषित समझकर भयभीत होकर हनुमान् को उनके निकट भेजता है । हनुमान् भिक्षुरूप धारण कर राम और लक्ष्मण के पास आते हैं और अपना परिचय देकर कहते हैं कि सुग्रीव आपसे मैत्री करना चाहते हैं। राम ने सुग्रीव की सहायता करने का वचन दिया । पश्चात् हनुमान् लक्ष्मण से सीता-हरण का वृत्तान्त सुनकर सुग्रीव की सहायता का आश्वासन देते हैं। तथा अपने वानर रूप में प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को अपने कन्धे पर चढ़ाकर दोनों को पर्वत के शिखर पर सुग्रीव के पास पहुँचाते हैं ( सर्ग २-४ ) । बंगाली राम-कथाओं में “शिवरामेश्वर-युद्ध” का भी वर्णन है । लक्ष्मण शिव की वाटिका में फल तोड़ने जाते हैं । वहाँ के द्वारपाल हनुमान् से युद्ध करते हैं । देर होने पर राम स्वयं जाते हैं । इतने में शिवजी भी आ जाते हैं। दोनों युद्ध करते हैं। अन्त में शिव राम के लिए सहायतार्थ हनुमान् को समर्पित करते हैं। हनुमान् राम के भक्त हो गये। उत्तर भारत के एकवृत्तान्त के अनुसार राम के लिए फल तोड़ते हुए लक्ष्मण रुद्रावतार हनुमान् से युद्ध करते हैं। लक्ष्मण राम के भाई हैं, यह सुनकर हनुमान् राम की शरण लेते हैं और राम तथा लक्ष्मण को सुग्रीव के पास ले जाते हैं । ( पा० वृ० नं० १३ ) । संताली राम-कथा के अनुसार हनुमान् तरबूजों की रखवाली करते हैं। लक्ष्मण उनमें से कुछ लेना चाहते हैं । जिसमें दोनों की भिड़न्त हो गयी। अन्त में हनुमान् ने दोनों को फल खिलाया । मूल ग्रन्थ का सीधा सम्बन्ध न होने से दन्तकथाओं का सम्बन्ध जुड़ जाने का ही यह परिणाम है। भावार्थरामायण के अनुसार राम की शक्ति देखने के लिए हाथ में साल वृक्ष लेकर राम और लक्ष्मण के पास पहुँचकर हनुमान् ने धमकी के साथ पूछा तुम लोग कौन हो ? राम ने बाण चलाकर हनुमान् को परास्त किया। तब हनुमान् ने वायु का सुझाव मान कर राम से क्षमा माँगी ।