रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 584, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०७ रामकियेन के अनुसार जन्म से ही हनुमान् के कानों में कुण्डल थे । आकाशवाणी में यह बताया गया था कि जो व्यक्ति बालक के इन कुण्डलों को देखेगा वही उसका स्वामी होगा (पिता होगा) । हनुमान् किसी वृक्ष पर चढ़कर फल खा रहे थे । हनुमान् ने पेड़ के नीचे लक्ष्मण की गोद में सिर रख कर सोते हुए राम को देखा । लक्ष्मण का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हनुमान् उनपर पत्ते और फल फेंकने लगे । अन्त में नीचे उतर कर लक्ष्मण से युद्ध किया । लक्ष्मण के तीन बाण छीनकर पत्तों में छिप गये । लक्ष्मण ने राम को जगाया । राम ने उस वानर के कानों में कुण्डलों को देखा और हनुमान् को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया । सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार हनुमान् राम से युद्ध करते हैं । अन्त में राम को पहचान कर उनके भक्त बन जाते हैं । रामकेर्ति (सर्ग ५) के अनुसार हनुमान् वायुपुत्र थे । रंगनाथरामायण (४।३) के अनुसार हनुमान् तपस्या द्वारा ब्रह्मा से वरदान पाते हैं और पूछते हैं कि मेरे मोक्ष और कार्यसिद्धि के लिए मेरा आराध्य कौन होगा ? ब्रह्मा ने कहा जो तुम्हारे आभूषणों को देख सकेगा वही तुम्हारा प्रभु होगा । पद्मपुराण (पातालखण्ड ११२।१३५) में उल्लेख है कि राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे । राम ने एक वानर देखा जो हेम के समान पिङ्गल और मणिकुण्डल पहने था । कम्बरामायण (४।२।३५) तथा बालरामदासरामायण में भी कुण्डलों की चर्चा है । भावार्थरामायण (४।१) के अनुसार अञ्जना ने हनुमान् से कहा था कि जो तुम्हारी लंगोटी देख सकेगा वहीं तुम्हारा स्वामी होगा । उसके अनुसार लंगोटी पहने ही हनुमान् का जन्म हुआ था । वस्तुतः हनुमान् की राम में अनन्यभक्ति और राम का उनके प्रति वात्सल्यभाव तथा हनुमान् की अखण्डब्रह्मचर्यनिष्ठा की अभिव्यञ्जना के लिए उक्त कथाओं का प्राकट्य है । बिहौररामकथा में हनुमान् ने अपनी माता के गर्भ से राम को पहिचान लिया था और जन्मते ही वह उनके साथ चल दिये । अद्भुतरामायण के अनुसार राम ने हनुमान् को अपने विष्णुरूप का दर्शन कराया । सेरीराम के एक पाठ के अनुसार लक्ष्मण राम के लिए पानी लाये । राम ने पानी पीकर उसे (सुग्रीव के आँसुओं से) नम- कीन पाया । कारण का पता लगाने पर सुग्रीव से भेंट होती है । रामकेर्ति (सर्ग ५) में भी यहीं कथा मिलती है । सेरीराम के शेळाबेर पाठ के अनुसार लक्ष्मण द्वारा लाये गये पानी को पीकर राम लक्ष्मण की गोद में सिर रखकर चार दिन तक सोते रहे । सुग्रीव पेड़ से लक्ष्मण का यह भ्रातृ-प्रेम देख कर रोने लगा । सुग्रीव के एक आँसू ने राम की छाती पर पड़कर उन्हें जगाया । राम ने इसे लक्ष्मण का आँसू समझकर उन्हें घर लौटने का आदेश दे दिया । इसपर लक्ष्मण की प्रार्थना से पेड़ के पत्ते छोटे हो गये तथा सुग्रीव दिखायी पड़ने लगा । तब राम-सुग्रीव की मैत्री हुई । सेरतकाण्ड तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार वाली ने सुग्रीव को दूर फेंक दिया था । वह अधमरा होकर वृक्ष की शाखाओं पर पड़ा था । राम ने उसी वृक्ष के नीचे विश्राम किया और सुग्रीव के आँसू राम पर पड़े । इन सभी कथाओं का तात्पर्य वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध ही लगा लेना उचित है । सुग्रीव अत्यन्त आर्त था । भगवान् राम के साथ सम्बन्ध होने से वह कृतार्थ हो गया । यही इन कथाओं का सार है । अनु० ५१३ में बुल्के कहते हैं आदिरामायण में वाली और सुग्रीव की जन्म-कथा नहीं थी । परन्तु यह समझना उनकी भूल है । दाक्षिणात्य बालकाण्ड (१७।१०) में वाली और सुग्रीव को क्रमशः इन्द्र एवं सूर्य का पुत्र कहा गया है । उसको प्रक्षेप कहना भी निराधार है । अन्य पाठों के अनुसार युद्धकाण्ड (सर्ग ४) में शुक रावण को उनका वृत्तान्त सुनाता है । महाभारत में प्रायः प्रत्येक पात्र के सम्बन्ध में विस्तृत कथा मिलती है । तदनुसार रामायण में भी सभी पात्रों की विस्तृत न सही प्रत्येक प्रधान पात्र का कुछ तो वर्णन उचित ही था । दाक्षिणात्य पाठ की कथा का सार यही है कि ब्रह्मा के अश्रु से ऋक्षरजा बानर की उत्पत्ति हुई । वह सरोवर में अपनी छाया को ही अपना प्रतिद्वन्द्वी समझ कर उसमें कूद पड़ता है और एक सुन्दर स्त्री हो जाता है । तब उसी समय वहाँ इन्द्र और सूर्य आते हैं और उसपर मोहित होते हैं । इन्द्र का तेज उसके बालों पर गिरा उससे वाली एवं सूर्य का तेज