रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०८ रामायणमीमांसा षोडश उसकी ग्रीवा पर गिरा उससे सुग्रीव की उत्पत्ति हुई। इन्द्र ने अपने पुत्र को एक अक्षयगुणपूर्ण सुवर्णमाला दी। सूर्य ने अपने पुत्र की सेवा में हनुमान् को नियुक्त कर दिया। ऋक्षरजा पुनः अपना वानररूप पाकर अपने पुत्रों के साथ ब्रह्मा के पास गया। ब्रह्मा ने एक देवदूत के साथ उसे विश्वकर्मा द्वारा निर्मित किष्किन्धा भेज दिया। देवदूत ने ऋक्षरजा का वानरराजपद पर अभिषेक कर दिया। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७) के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्गों की कथाओं के अनुसार किसी दिन प्रजापति के वाम नेत्र में एक रजकण पड़ गया। उसे बाँये हाथ से दूर फेंकने से उसमें से एक स्त्री उत्पन्न हुई। पश्चात् सूर्य ने उसका आलिङ्गन किया और वरदान दिया कि तुम्हें एक वीर पुत्र उत्पन्न होगा। किसी समय इन्द्र भी उसे देखकर आकृष्ट हुए। उन्होंने उसको अपने हाथ से स्पर्श करके आशीर्वाद दिया कि तुमसे वाली ओर सुग्रीव दो कामरूपी यमल वानर उत्पन्न होंगे। किष्किन्धा में राज्य करेंगे। भावार्थरामायण में बताया गया है कि किसी दिन कैलास के एक सरोवर में शिवपार्वती क्रीड़ा कर रहे थे। अचानक कुछ मुनि आ गये, जिससे दोनों अन्तर्धान हो गये। पार्वती ने शाप दिया कि जो इस सरोवर में स्नान करेगा वह नारी के रूप में इससे निकलेगा। उस शाप से अनभिज्ञ होने के कारण ऋक्षरजा स्नान करके स्त्री हो गया। बलरामदासरामायण के अनुसार मदनिका अप्सरा के इन्द्र-सभा में अकस्मात् हँसने के कारण इन्द्र ने उसे शाप दिया कि तू वानरमुखी होकर मानसरोवर के निकट पृथ्वी पर निवास करेगी और कश्यप से पुत्र उत्पन्न कर मुक्ति प्राप्त करेगी, अतः मदनिका वहाँ रहने लगी। किसी दिन उर्वशी का सौन्दर्य देखकर कश्यप के तेज का पतन होता है। वह उसे जल में फेंक देते हैं। उसे पीकर मदनिका गर्भवती हो गयी। वह एक ऐसा पुत्र पैदा करती है जिसका शरीर मनुष्य का और मुख वानर का है। एक शबरी उस शिशु का पालन करती है। ब्रह्मा उसे ऋक्षपति नाम देकर आरण्य के राजपद पर अभिषिक्त करते हैं। ब्रह्मा ऋक्षपति को पार्वती-वन के पश्चिमी भाग में प्रवेश करने से मना करते हैं। किन्तु वह निषेधोल्लङ्घन करके उसमें प्रविष्ट होते ही नारी बन गया। इसका कारण यही था किसी दिन पार्वती ने अतृप्ति से वैसा शाप दिया था। अनन्तर वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही नारी भावापन्न ऋक्षपति से बाली और सुग्रीव का जन्म होता है। ब्रह्मा के आदेशानुसार वह दोनों पुत्रों को दण्डकारण्य में छोड़ देता है। गौतमपत्नी अहल्या दोनों को गौतम नदी के तटपर पाकर दोनों का धर्मपुत्र के रूप में पालन करती है। जब वे तीन वर्ष के होते हैं तब किष्किन्धा का राजा खडगद मृगया के अवसर पर गौतम से मिलकर बताता है कि अञ्जना नामक पुत्री को छोड़कर मेरे कोई सन्तान नहीं है। ऋषि वाली और सुग्रीव को राजा के हाथ में सौंप देते हैं। खडगद वाली को राजा एवं सुग्रीव को युवराज बना देते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार गरुड़ का भ्राता अरुण दो स्त्रियों को सूर्य का रथ हाँकते देखकर हँस पड़ा। सूर्य ने अरुण को रथ हाँकने के लिए कहा। अरुण ने स्वीकार कर लिया। वहीं अप्सराओं का नाच देखकर वह स्त्री बन गया। इन्द्र एवं सूर्य से उसे एक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। अरुण ने दोनों को अगस्त्य की सेवा में सौंप दिया। तपस्या में संलग्न अगस्त्य पर पानी छिड़कने से अगस्त्य के शाप से दोनों वानर बन गये। पउमचरियं की रामकथाओं के अनुसार आदिरजा तथा इन्द्रमाली की वाली, सुग्रीव तथा श्रीप्रभा तीन सन्तानें थीं। सारलादासमहाभारत वनपर्व के अनुसार गौतम अपनी पत्नी का जीव लेकर स्नानार्थ जाया करते थे। किसी दिन इन्द्र और सूर्य दोनों उस निर्जीव शरीर पर आसक्त हो गये। इन्द्र के प्रवेश से सजीव अहल्या से सूर्य का सम्बन्ध हुआ और सूर्य के प्रवेश से सजीव उसी शरीर से इन्द्र का सम्बन्ध हुआ, उससे श्यामशील और जवशील दो पुत्र उत्पन्न हुए। अञ्जना ने इसका भेद गौतम को बतला दिया था। परीक्षा लेने के लिए गौतम ने