रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५०९ दोनों को जल में फेंक दिया । जिससे दोनों वानर हो गये । गौतम ने दोनों को निःसन्तान राजा खडगद को प्रदान कर दिया । सेरतकाण्ड और सेरीराम की कथाओं में भी उससे मिलती जुलती कथा है । रामकियेन की कथा पीछे दी जा चुकी है । बुल्के ने भी पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ को विकृत रूप ही माना है । मूल सम्बन्धविच्छेद से अनेक कल्पनाओं को अवकाश मिलता ही है । वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड (सर्ग १७) के अनुसार भगवान् विष्णु जब दशरथ के गृह में पुत्ररूप में प्राप्त हुए तब ब्रह्मा ने सब देवताओं से कहा "विष्णु की सहायता के लिए वानर- रूप में अपने ऐसे पुत्रों को रचो जो बलवान्, कामरूपी, शूर, मायाविद्, वायु के समान वेगवाले, नयज्ञ, बुद्धिसम्पन्न और विष्णुतुल्य पराक्रमवाले हों और जो असंहार्य, उपायज्ञ तथा दिव्यसंहनन और देवताओं के समान ही सर्वास्त्र- सम्पन्न हों । तदनुसार देवताओं ने अप्सराओं, गन्धर्वियों, यक्ष तथा पन्नगों की कन्याओं, विद्याधरियों आदि में विविध सन्तानें उत्पन्न कीं । स्वयं ब्रह्मा ने ऋक्षपुंगव जाम्बवान् को उत्पन्न किया था, इन्द्र ने वाली को, सूर्य ने सुग्रीव को, बृहस्पति ने तार को, धनद ने गन्धमादन को, विश्वकर्मा ने नल को, अग्नि ने नील को, अश्विनों ने मैन्द और द्विविद को, वरुण ने सुषेण को, पर्जन्य ने शरभ को तथा पवन ने वज्राङ्ग वैनतेयतुल्य हनुमान् को जन्म दिया । वाली और सुग्रीव के जन्म की विशेष कथा उत्तरकाण्ड में प्रक्षिप्त सर्ग से समझी जा सकती है । इसी के अनुसार अन्य कथाओं का अभिप्राय भी लगा लेना चाहिये । ५१५ वें अनु० में वाली और सुग्रीव की शत्रुता के कारणों पर विचार है । दुन्दुभि-पुत्र मायावी के ललकारने पर वाली उसे मारने निकला । सुग्रीव भी निकला । मायावी एक बिल में प्रविष्ट हो गया । वाली सुग्रीव को बिलद्वार पर खड़ा करके अन्दर चला गया । एक वर्ष बाद बिल से फेनयुक्त रक्त-धारा निकलती देखकर तथा असुरों का गर्जन सुनकर सुग्रीव ने समझ लिया कि वाली मारा गया । पत्थरों से बिल का द्वार बन्द कर अपने भाई की उदक-क्रिया सम्पन्न करके किष्किन्धा लौट आया । मन्त्रियों ने उसे अभिषिक्त कर दिया और वह न्यायपूर्वक शासन करने लगा । वाली अपने शत्रु को मारकर लौटा । सुग्रीव ने विनयपूर्वक राज्यसिंहासन उसे सौंप दिया । परन्तु उसने उसकी पत्नी रूमा को लेकर उसे निर्वासित कर दिया । सुग्रीव सारी पृथ्वी में भटक कर वाली के लिए अगम्य ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगा । दिग्वर्णन के बाद सुग्रीव ने वही कथा राम को सुनायी थी । इस वृत्तान्त में असुर का नाम दुन्दुभि ही था । सुग्रीव के राजा बनने पर तारा और रूमा दोनों उसकी पत्नियां बन गयीं । वाली ने सर्वत्र उसका पीछा किया । तब हनुमान् ने सुग्रीव को मतङ्ग के शाप का स्मरण दिलाया जिससे सुग्रीव ऋष्यमूक पर रहने लगा । अध्यात्मरामायण के मायावी मय दानव का परम दुर्मद पुत्र था (४।१।४७) । अध्यात्मरामायण (१।४। १६) के अनुसार उसका दुर्मद नाम है। सेरीराम के अनुसार वाली ने गुफा में प्रवेश करने के पहले सुग्रीव से कहा था कि यदि सफेद रक्त गुफा से निकले तो मुझे मृत समझना, यदि लाल रक्त निकले तो शत्रु का मरण समझना । परन्तु सफेद रुधिर निकलने से सुग्रीव ने वाली को मृत समझ लिया । किष्किन्धा पहुँचकर सुग्रीव ने वाली की पत्नी के सामने विवाह का प्रस्ताव किया । उसने सप्ताह की अवधि माँगी, इसी बीच वाली लौट आया। पद्मपुराण (४।११२।१६३) के अनुसार वाली ने ६०,००० वर्ष पूर्व दशरथ के अभिषेक के दिन ही सुग्रीव को निर्वासित किया था । पउमचरियं के अनुसार राम के आगमन से पूर्व ही वाली को वैराग्य हो गया था । सुग्रीव ने तारा से विवाह किया और उससे अङ्गदभट और जवानन्द दो पुत्र हुए । महानाटक के अनुसार तारा सुग्रीव की ही पत्नी थी । रङ्गनाथरामायण के अनुसार समुद्र-मन्थन में वाली और सुग्रीव ने देवताओं की सहायता की थी, फलतः लक्ष्मी के बाद समुद्र-मन्थन से निकली देवाङ्गनाओं में से तारा वाली और सुग्रीव को दी गयी। रामकियेन के अनुसार ईश्वर के