भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 579

Here is the line-by-line transcription of the provided image into Markdown format:

५०२ रामायणमीमांसा पञ्चदश "मायासीतां बहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ।” ( युद्धकाण्ड सर्ग १२ ) मायासीता अग्नि में प्रवेश करती हैं तथा अग्निदेव राम को वास्तविक सीता प्रदान करते हैं (सर्ग १३) । उपर्युक्त प्रमाणों को बुल्के केवल कल्पनामात्र मानते हैं । परन्तु भारतीय आस्तिक समाज की दृष्टि में पुराण परम प्रमाण हैं । श्रीतुलसीदासजी ने भी अपने मानस में इसका उल्लेख किया है— "जौ लगि करौं निशाचर नासा । तुम पावक मँह करहु निवासा ।” (रा० मा० ३।२३।१) भावार्थरामायण ( ३।१६ ) के अनुसार देवताओं को आशङ्का थी कि सीता-स्पर्श करने से रावण भस्म हो जायेगा, किन्तु सभी राक्षसों के विनाश के लिए उसका भस्म हो जाना ठीक न होगा, अतः देवताओं के हितार्थ सीता अपनी छाया को लेकर प्रेषित करती है । बलरामदासरामायण ( उत्तरखण्ड ) के अनुसार नारद की शिक्षा से सीता ने वैसा किया । धर्मखण्ड ( अ० १३ ) तथा तत्त्वसंग्रहरामायण ( ३।१३ ) नारद के परामर्श से राम ने माया- सीता का निर्माण करके मृत्युदेवी से कहा कि वे सीता के रूप में लङ्का में प्रवेश करें और वास्तविक सीता को राम ने अपने वक्षस्थल में रख लिया । लङ्कायुद्ध के पहले सीता अपनी माता पृथ्वी की शरण में चली गयीं । आनन्दरामायण के अनुसार सीता रजोलूप से अग्नि में, सत्त्वरूप से राम के समीप और तमोरूप से रावण के मोहनार्थ वन में रहीं । "सीते त्वं त्रिविधा भूत्वा रजोलूपा वसानले । वामाङ्गे मे सत्त्वरूपा वस च्छाया तमोगयी ॥ पञ्चवट्यां दशास्यस्य मोहनार्थं वसात्र वै ॥” ( आ० रा० ७।६७, ६८ ) ५०८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं यूनानी होमर के काव्य में हेलेन पतिता बनकर अपने अपहर्त्ता पेरिस के साथ स्वेच्छा से भाग निकलती है और युद्ध के बाद अपने पति मेनेलोस को पुनः प्राप्त होती है। यूनानी धार्मिक विकास में वही हेलेन बाद में देवी मानी गयी । फलस्वरूप भक्तों ने होमर का वृत्तान्त, इष्ट देवी की मर्यादा के प्रति- कूल समझकर, इस तरह बदल दिया कि पेरिस हेलेन की एक छाया ( एडोलोन मायामयी मूर्ति, छाया ) अपने साथ ले जाता है । इसी तरह भक्ति भावना ने दोनों देशों में एक ही उपाय का सहारा लिया है। परन्तु इन दोनों कथाओं में परस्पर प्रभाव मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। दोनों कथाओं का स्वतन्त्ररूप से विकास हुआ है। यह है बुल्के का हृदय । फिर भी जो लोग उन्हें रामायणभक्त समझते हैं उनकी बुद्धि पर तरस आना चाहिये । परन्तु बुल्के को यह जानना चाहिये कि किसी बाह्य अंश की समानता से वस्तु का अपलाप नहीं किया जा सकता है । आज देश-विदेशों में सैकड़ों कुमारियों से अवैध सन्तानें पैदा होती हैं । फिर भी यीशू क्राइष्ट की मां कुमारी मेरी को ईसाई वैसा ही नहीं मानते। पुराण तो होमर काव्य से प्राचीन हैं, अतः होमर काव्य में पुराणप्रसिद्ध मायासीता के अनुसार पर हेलन की मायामयी मूर्ति की चर्चा की गयी होगी । फिर वहाँ हेलन के स्वेच्छा से भाग निकलने के कारण दोनों में आकाश पाताल का अन्तर है । वस्तुतः जैसा कमल के पराग, मकरन्द, किञ्जल्क आदि का विश्लेषण कार्य बन्दर के हाथों में देना खतरनाक है । वैदिक संस्कृति-संस्कारों से शून्य पाश्चात्यों के द्वारा भारतीय आर्ष ग्रन्थों का विश्लेषण भी वैसा ही होता है । पुराणों ने ठीक ही कहा है कि अल्पश्रुत से वेद डरता है। यह अवश्य अर्थ का अनर्थ कर के वेद पर प्रहार करेगा । "बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।” ( म० भा० १।१।२६८ )