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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 578, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 578

अध्याय अरण्यकाण्ड ५०१ यद्यपि बुल्के के अनुसार "लङ्काकाण्ड में विद्युज्जिह्न द्वारा राम का मायामय सिर दिखाया गया है (सर्ग २३)। बाद में इन्द्रजित् वानरसेना के सामने मायामयी सीता का सिर काटता है (सर्ग ८१)। इन्हीं दो कथाओं के आधार पर मायामयी सीता की कल्पना हुई होगी। इस तरह "निदधे रावणः सीतां मयो मायामिवासुरीम् ।" (वा० रा० ३।५४।२४)। रावण ने सीता को लङ्का में वैसे ही रखा था जैसे मय ने आसुरी माया को रखा। इसे भी इस कल्पना का आधार मान लेते हैं।" परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि जब अनेक पुराणों के अनुसार वैसी ही वस्तुस्थिति थी तब कल्पना क्यों मानी जाय । इसी लिए टीकाकारों ने वाल्मीकिरामायण के उपर्युक्त पद्य से यह ध्वनि निकाली है कि वस्तुतः लङ्का में आगता सीता मायामयी ही थी । "मायामिवासुरीमित्यनेन मायारूपवेषा सीता लङ्कामागतेति ध्वनितम् ।" ( तिलक ) । वास्तविक सीता अग्नि में निवास कर रही थीं । अग्निपरीक्षा के अवसर पर अग्नि ने सीता की रक्षा करके उनके पातिव्रत्य का साक्ष्य देकर उन्हें राम को प्रदान किया था। इसे भी कल्पनामात्र मानना निर्मूल है। देवीभागवत (३।२९) के अनुसार रावण का प्रस्ताव सुनकर सीता गार्हपत्य अग्नि की ओर शरण के लिए जाती है तथा अद्भुतरामायण के अनुसार भी वास्तविक सीता का हरण न होकर काल्पनिक सीता का ही हरण हुआ था। "तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् । विश्वं यथेद्माभाति तथेयं प्रतिभाति मे ॥ (सर्ग १६।३) द्विपदरामायण (३।१८) में लक्ष्मण सीता को अग्नि के लिए सौंप कर जाते हैं। कूर्मपुराण के अनुसार रावण को देखकर सीता ने अग्नि की शरण ग्रहण की। बुल्के के अनुसार यह पुराण ९ वीं शती का है। परन्तु यह उनकी धारणा गलत है। प्रायः पाश्चात्य लेखकों को एक व्यापक भयंकर रोग होता हैं कि वे प्राचीन से प्राचीन वेदादि शास्त्रों को भी ईसा के आसपास ही रखना चाहते हैं । वेदव्यास ही इन पुराणों के निर्माता हैं। उनका काल ईसा से ३६ सौ वर्ष पूर्व है। पुराण भी अनादिसिद्ध हैं। उनका प्रतिद्वापर आविर्भावमात्र होता है । अस्तु "जगाम शरणं वह्निमावसथ्यम् । सीतामादाय रामेष्टां पावकोऽन्तरधीयत ॥" बुल्के का अर्थ है, अग्नि ने मायासीता का निर्माण कर वास्तविक सीता को ग्रहण कर उसको छिपा दिया, परन्तु यह अशुद्ध अर्थ है। व्याकरण के अनुसार इसका अर्थ यह है कि माया सीता रचकर राम की इष्टा प्रिया सीता को लेकर पावक स्वयं अन्तर्हित हो गया। इससे यह भी स्पष्ट है कि मायामयी सीता को रावण लङ्का ले गया। रावणवध के बाद राम ने मायासीता पर शङ्काएं की फलस्वरूप वह अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। तब अग्नि ने वास्तविक सीता प्रकट की और राम ने उन्हें स्वीकार किया । "गृहाण चैतां विमलां जानकीं वचनान्मम । पश्य नारायणं देवं स्वात्मानं प्रभवाप्ययम् ॥"१ ब्रह्मवैवर्त्त के अनुसार सीताहरण के पूर्व ही अग्निदेव ब्राह्मण के वेष में आकर कहते हैं, सीताहरण का समय आ गया है। सीता को मुझ में रखकर उसकी छाया अपने पास रखो । अग्निपरीक्षा के अवसर पर सीता को पुनः लौटा दूँगा। राम ने वैसा ही किया। अग्निपरीक्षा के समय वास्तविक सीता राम को समर्पण कर देने के बाद छायासीता ने पूछा कि मैं क्या करूँ ? तब अग्नि ने उन्हें पुष्कर भेज दिया। वहाँ उन्होंने तीन लाख वर्ष तप करके लक्ष्मीपद प्राप्त कर लिया। देवीभागवत में भी अग्निदेव राम के पास जाकर उनको छायासीता देते हैं। ब्रह्मवैवर्त्त (प्रकृतिखण्ड अ० १४), देवीभागवत (९।१६) तथा अध्यात्मरामायण में ये ही सब बातें रूपान्तर से कही हैं। १. कूर्मपुराण उत्तर विभाग अध्याय ३४; कलकत्ता संस्करण पृ० ६९२ ।

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