भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 593

५१६ रामायणमीमांसा षोडश यहाँ कुछ टीकाकार मानते हैं कि परस्पर जय की इच्छा से ही प्रथम आदित्य को जो प्राप्त कर ले वही प्रबल मान्य होगा । इस प्रतिज्ञा से आदित्य के पास दोनों गये । परन्तु उनके मतानुसार आवृत्त्या इस पर और इन्द्र- कर्तृक वृत्रवध-प्रसङ्ग की असंगति होगी । बुल्के ने भी वृत्र-वध के बाद ( इन्द्र पर ) विजय प्राप्त करने की इच्छा से आकाश-मार्ग से स्वर्ग जा रहे थे, यह अर्थ किया है। उनके अर्थ में इन्द्रप्रसंग की संगति तो हो जाती है, परन्तु जा रहे थे, यह उक्त श्लोक के किसी भी शब्द का अर्थ नहीं है । “स्वर्गतौ” शब्द का अर्थ तो यही है कि आकाश मार्ग से स्वर्ग पहुँच गये । साथ ही ‘आवृत्त्या' शब्द का उन्होंने स्पर्श भी नहीं किया । अतः आवृत्त्या का यही अर्थ ठीक है कि लौटते समय दर्प से हम दोनों आदित्य के पास पहुँच गये । इस तरह पहली कथा में ही इन्द्रविजय की इच्छा से हम दोनों स्वर्ग गये । लौटते समय दर्प से हम लोग आदित्य के पास गये । अर्थात् विजय करके लौट रहे थे । दूसरी बार उसी कथा का सम्पाति ने विस्तार से वर्णन किया । वहीं उसका कारण भी कहा गया है—