भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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अध्याय किष्किन्धाकाण्ड ५१७

अनुगमन से विन्ध्यगिरि में पतन आदि सुनाया। भगवन्, इन्द्रयुद्ध में हुए वज्रपातजनित व्रणों के कारण परिश्रान्त होने से सूर्य्यानुगमन से होनेवाले पक्षनाश के कारण लज्जा से व्याकुल होने से उत्तर देने में मैं समर्थ नहीं हूँ। इससे भी स्पष्ट है कि इन कथाओं में पूर्वापर विरोध नहीं है। पङ्खों की पुनरुत्पत्ति तथा स्वास्थ्य-लाभ में निशाकर के वचन का प्रभाव होते हुए भी राम और लक्ष्मण के प्रभाव का भी अपलाप नहीं किया जा सकता है । “उत्पेततुस्तदा पक्षौ समक्षं वनचारिणाम् । स दृष्ट्वा स्वां तनुं पक्षैरुद्गतैररुणच्छदैः ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे वानरांश्चेदमब्रवीत् । निशाकरस्य राजर्षेः प्रसादादमितौजसः ॥” (वा० रा० ४।६२।८-९) वानरों के देखते देखते उसके पङ्ख पुनः उत्पन्न हो गये । अरुणपत्रतुल्य उगते पङ्खों से युक्त अपने शरीर को देखकर उसे अतुल प्रसन्नता हुई और उसने कहा कि अमिततेजा मुनि के प्रभाव से आदित्य-किरणों से दग्ध मेरे पङ्ख पुनः नवीन हो गये हैं। यौवन काल में जो बल था वही फिर मुझमें हो गया है। मेरे पङ्खों की पुनरुत्पत्ति आप लोगों की सिद्धि की प्रत्यायक है। जैसे गुरु का कृतज्ञ भी ईश्वर का कृतज्ञ माना जाता है वैसे ही निशाकर मुनि की कृतज्ञता स्वीकार करने- वाला सम्पाति राम और लक्ष्मण का भी कृतज्ञ है ही। मुनि ने भी कहा था कि तुम्हारे पुनः उत्तम नवीन पङ्ख हो जायेंगे । पुराण में मैंने सुना है बहुत बड़ा कार्य होनेवाला है। मैंने तप से भी सब कुछ जाना है। राजा दशरथ के महातेजस्वी पुत्र राम होंगे। वे लक्ष्मण और सीता के साथ दण्डकारण्य में आयेंगे । देवताओं तथा दानवों से अवध्य राजा रावण सीता का हरण करेगा। वह सीता को नाना प्रकार का प्रलोभन देगा । परन्तु वह महाभागा यशस्विनी सीता अन्न-पान का त्याग कर देगी। इन्द्र उन्हें देवदुर्लभ अमृतप्रख्य परमान्न प्रदान करेंगे। सीता अग्राशन राम और लक्ष्मण के नाम पर भूमि में निर्वापकर उसे ग्रहण करेंगी । रामदूत वानर तुम्हारे पास आयेंगे। तुम उनसे राममहिषी सीता का समाचार कहना । तुम कहीं न जाकर देश और काल की प्रतीक्षा करो। तुम्हें पुनः पङ्ख प्राप्त होंगे। हम तुम्हें अभी सपङ्ख बना सकते हैं। परन्तु तुम यहाँ रहकर लोकों का परम कार्य करोगे। तुम्हें दोनों राजकुमारों राम और लक्ष्मण का, ब्राह्मणों का, गुरुओं का, मुनियों का, देवताओं का और इन्द्र का भी काम करना है। अर्थात् राम- दूतों को सीता का पता बताने से रावण का वध होगा। उससे सभी का हित होगा। मैं भी राम और लक्ष्मण को देखना चाहता हूँ। परन्तु अब अधिक काल तक प्राणों का धारण करना नहीं चाहता । अतः कलेवर त्याग रहा हूँ (सर्ग ६२) । इससे स्पष्ट है कि महर्षि भी राम और लक्ष्मण का महत्त्व मानते थे। राम का कार्य करने के अनन्तर ही उसका सपङ्ख होना वे उचित समझते थे । इस सर्ग से सीता के लिए इन्द्रदत्त पायस की प्रामाणिकता भी सिद्ध होती है और बुल्के का पक्ष खण्डित होता है । इसीलिए बुल्के ने इन सर्गों को ही प्रक्षिप्त मान लिया है। कम्बरामायण (४।१५) के अनुसार सूर्य ने सबसे पहले सम्पाति को आश्वासन दिया था कि जब वानर राम का नाम उच्चारण करेंगे उस समय तुम्हारे पङ्ख फिर से निकल आयेंगे । भावार्थरामायण (४।१६) में भी सूर्य के इस आश्वासन का उल्लेख है। अध्यात्मरामायण में मुनि का चन्द्रमा नाम है। उन्होंने सम्पाति को उपदेश देकर उसे शरीर त्यागने से रोका और नारायणावतार राम के दूतों की प्रतीक्षा करने का आदेश दिया । पङ्खों के पुनः निकलने से सम्पाति ने वानरों से कहा—जिनके नामस्मरणमात्र से दुष्ट जन भी इस अपार संसारसागर को पारकर विष्णु के शाश्वत स्थान को प्राप्त करते हैं। तुम लोग उन्हीं भगवान् के भक्त हो। फिर समुद्र के पार करने