रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९८ रामायणमीमांसा पञ्चदश भासकृत प्रतिमानाटक के अनुसार दशरथ के वार्षिक श्राद्ध के लिए सीता और राम विचार कर रहे थे, उसी समय परिव्राजक के रूप में रावण आता है और वह परिचय देकर विभिन्न शास्त्रों के सम्बन्ध में अपनी जानकारी बताता है। इसमें प्राचेतसश्राद्धकल्प की बात करता है। राम श्राद्ध के सम्बन्ध में जिज्ञासा प्रकट करते हैं। तब वह कहता है। हिमालय के काञ्चनपार्श्व मृग से पितर विशेषरूप से प्रसन्न होते हैं। उसी क्षण मारीच वैसा मृग बनकर दिखायी देता है। लक्ष्मण उस समय आश्रम के कुलपति का स्वागत करते थे। अतः सीता को रावण के पास छोड़कर राम मृग के पीछे चले जाते हैं। तब रावण अपना रूप धारण कर सीता को लङ्का ले जाता है। इसमें भी अद्भुतता एवं नवीनता लाना ही उद्देश्य है। वाल्मीकिरामायण के ऐतिहासिक तथ्य के अपलाप में तात्पर्य नहीं है, क्योंकि अपरिचित शास्त्रज्ञ के सन्निधान से भी सीता को छोड़ना सम्भव नहीं था। इसी प्रकार कृत्यारावण में शूर्पणखा गौतमी तपस्विनी का रूप धारण कर सीता को दूर ले जाती है। फिर वही सीता के रूप में लक्ष्मण के पास आकर कटु शब्दों में राम की सहायता के लिए जाने को बाध्य करती है (अङ्क १)। इतने में रावण सीता के समीप आकर उन्हें यह कहकर पुष्पक पर चढ़ने को बाध्य कर देता है—यदि तुम स्वेच्छा से पुष्पक पर नहीं चढ़ोगी तो मैं आश्रम के सभी तपस्वियों का सिर काट दूँगा (अङ्क २)। बुल्के यहाँ स्वयं ही मानते हैं कि इस कथानक का सीता को लक्ष्मण पर कटु अभियोग लगाने के दोष से बचाना ही उद्देश्य है। एक अन्य वृत्तान्त के अनुसार रावण स्वयं ही दो सिरवाले मृग का रूप धारण कर लेता है। सीता उसके चर्म के प्रति स्पृहा प्रकट करती है। राम उसके पीछे जाकर उसे मारते हैं। उसी क्षण रावण का जीव एक साधु के शरीर में प्रविष्ट होकर पर्णशाला के पास आकर लक्ष्मण से कहता है। तुम्हारा भाई वैरिर्यों से घिरा हुआ है। उसकी सहायता करने जाओ। सीता के अनुरोध से लक्ष्मण जाते हैं। रावण सीता को लेकर लङ्का की ओर प्रस्थान करता है। किसी की आँखों देखी घटनाओं की भी यथार्थता में मतभेद हो जाता है। वर्तमान काल में युद्धों के सम्बन्ध में विभिन्न पक्षों के मतभेद इसके सुन्दर उदाहरण हैं। इसी लिए वास्तविक इतिहास संवाद-दाताओं के तारों एवं टेलीप्रिन्टरों पर निर्भर नहीं हो सकते। अतएव वाल्मीकिरामायण के आरम्भ में ही स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि ब्रह्मा के आदेशानुसार महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजा प्रज्ञा प्राप्त कर उस दिव्य ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा सम्पूर्ण घटनाओं का अपरोक्ष साक्षात्कार कर के ही वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ लिखा है। ऐसी स्थिति में वाल्मीकि- रामायण के विरुद्ध ऐसी सभी कल्पनाएँ गौणार्थ ही समझी जानी चाहिये। राम की सहायता के लिए जाते समय लक्ष्मण सीता की सहायता के लिए कुटी के चारों ओर धनुष से रेखा खींचते हैं और देवताओं की शपथ लेकर कहते हैं कि जो इसके भीतर घुसेगा उसका सिर फट जायेगा। बाद में छद्मवेषी रावण के अनुरोध से सीता उसे भोजन देने के लिए हाथ रेखा के बाहर बढ़ाती हैं और रावण उन्हें खींच लेता है। यह कथा आनन्दरामायण (१।७।९८), भावार्थरामायण (३।१५), सूरसागर (नवाँ स्कन्ध, पद ५०३ नागरीप्रचारिणी सभा संस्करण), रामचरितमानस (६।३६।२), असमिया गीतिरामायण, रामचन्द्रिका (१२-१८), खोतानीरामायण, सेरीराम, हिकायत महाराज रावण तथा पाश्चात्य वृत्तान्त (नं० १३) में पायी जाती है। एक पाश्चात्य वृत्तान्त के अनुसार जब रावण रेखा पार करना चाहता था तब अग्नि की लपटें उठकर उसे भीतर घुसने से रोक देती थीं। मधुसूदन सम्पादित महानाटक (३।६९-७२) में रावण सीता को तुलसी देना चाहता है। किन्तु सीता रेखा उल्लङ्घन अस्वीकार करती हैं। पर रावण रेखा पार कर सीता को ले जाता है। तत्त्वसंग्रह- रामायण (३।१५) में सीता अपने पति के कुशल-क्षेम के सम्बन्ध में चिन्तित हैं। किन्तु रावण उनकी हस्तरेखा देखकर ही उत्तर देने की प्रतिज्ञा करता है। अवध में प्रचलित कथा के अनुसार रावण कहता है, मैं बँधी भिक्षा नहीं ले सकता। बाहर आकर दो तभी भिक्षा लूँगा। बिर्होर नामक आदिवासियों के अनुसार लक्ष्मण जाने के पहले सीता