भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 574

अध्याय अरण्यकाण्ड ४९७ गागकनासिर के दो पुत्रों को मृग का रूप धारण करने का आदेश देता है एक सुवर्ण और एक रजत । ४९२ वें अनु० में ब्रह्मचक्र के अनुसार शूर्पणखा अपनी दो पुत्रियों के साथ लङ्का तथा किष्किन्धा की सीमा की रखवाली करती है। किसी दिन राम, लक्ष्मण और सीता को देखकर उनपर आक्रमण करती है। लक्ष्मण उन दोनों का वध करते हैं तथा राम शूर्पणखा को हटने के लिए विवश करते हैं। शूर्पणखा लङ्का जाती है और स्वयं कनकम्ग बनकर सीताहरण में सहायता करती है। राम कनकम्पूग का शिकार करने जाते हैं। लक्ष्मण राम की पुकार सुनकर राम को जोखिम में समझ कर सीता को नङ्गथो रानी (पृथ्वी) को सौंप कर उस ओर चले जाते हैं। रावण सीता को ले जाने का प्रयास करता है। किन्तु पृथ्वी सीता को पैर पकड़ कर रोक लेती है। रावण का कुछ वश नहीं चलता है। राम लक्ष्मण को देखकर सीता के सम्बन्ध में चिन्ता प्रकट करते हैं। लक्ष्मण आश्वासन देते हैं कि पृथिवी रक्षा करेगी। मैं पृथिवी पर विश्वास नहीं करता, राम के इन शब्दों को जानकर पृथिवी सीता को छोड़ देती है और रावण सीता को लङ्का ले जाता है। वस्तुतः भारतीय परम्पराओं एवं वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने से यह कथा विश्वसनीय नहीं है। ४९४ वें अनु० में और परिवर्तन दिखाया गया है। राम और लक्ष्मण के चले जाने पर रावण आकर सीता को विश्वास दिलाता है कि अब अयोध्या जाना है। इसपर विश्वास करके सीता स्वयं रथ पर चढ़ती हैं। कथा का यह रूप नृसिंहपुराण (अध्याय ४९) में कहा गया है। संन्यासी के रूप में रावण कहता है, भरत आ गये हैं। आपको लेने के लिए मुझे भेजा है। राम भी मृग को फँसाकर अयोध्या जा रहे हैं। यह सुनकर सीता विमान में चढ़ जाती हैं। बृहद्धर्मपुराण के अनुसार रावण कहता है, कौशल्या आपको देखने को उत्सुक हैं (पूर्वखण्ड अध्याय १९) । दक्षिण भारत के (१६०९ ई० के) एक वृत्तान्त के अनुसार रावण एक ऋषि के वेष में रथ के साथ सीता के पास आता है। अयोध्या के नागरिकों के रूप में राक्षस उसमें बैठे हैं। रावण ने कहा- हम भरत की ओर से आये हैं। राम का राज्याभिषेक होनेवाला है। राम ने स्वयं अयोध्या के लिए प्रस्थान किया है। आश्चर्यचूड़ामणि के अनुसार लक्ष्मण के जाने के बाद रावण और उसके सारथि ने क्रमशः राम और लक्ष्मण का रूप धारण किया था। सारथि (लक्ष्मण) राम (रावण) से कहता है कि भरत का राज्य सङ्कट में है। उनकी सहायता के लिए यह रथ तपस्वियों ने भेजा है। तीनों रथ पर चढ़कर चले जाते हैं। शूर्पणखा सीता के रूप में राम के साथ बातचीत करती है। गुणभद्रकृत जैन उत्तरपुराण के अनुसार वनवास नहीं है। नगर के समीपस्थ चित्रकूट नामक उपवन से सीताहरण होता है। इसमें लक्ष्मण का उल्लेख नहीं है। मृग के लिए राम के जाने पर रावण राम के रूप में सीता के पास आकर कहता है मैंने मृग को फँसा कर बनारस भेजा है। अब घर जाने का समय आ गया है। यह सुनकर सीता पुष्पक पर बैठ जाती है। धोखा देने के लिए पुष्पक पालकी बन जाता है। स्पष्टतः इन कथाओं का तात्पर्य अद्भुतता लाने और रावणस्पर्श के बिना ही सीता का लङ्कागमन दिखाना ही है। जैसे 'विषं भुङ्क्ष्व' इस वाक्य का विषभक्षण इस वाच्यार्थ में तात्पर्य नहीं है, किन्तु शत्रुगृहभोजननिवृत्ति इस लक्ष्यार्थ में ही है, वैसे ही वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध अपने वाच्यार्थ में उक्त कथाओं का तात्पर्य न होकर सीता की रावणस्पर्शरहितता और अद्भुतरसाभिव्यक्ति में ही है, क्योंकि भारतीय परम्परा के अनुसार जिन किन्हीं अपरिचित महात्माओं एवं ऋषियों के वचनों में भी इतना विश्वास करना निषिद्ध है "न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।" अविश्वस्त में विश्वास नहीं करना चाहिये। विश्वस्त में भी अतिविश्वास करना सर्वथा असङ्गत है। उक्त कथाओं में उत्तरोत्तर जोड़ लगाया गया है। अन्त में राम और लक्ष्मण के रूप में ही रावण और उसके सारथि को चित्रित किया गया है। भरत के आने पर भी वसिष्ठ आदि के प्रयास करने पर भी जो राम पिता के आज्ञानुसार अवध नहीं गये वे कैसे अयोध्या जाने को तैयार हो जायेंगे, सीता विश्वास कैसे करती। इसके अतिरिक्त सीता जैसी पतिव्रता जो हनुमान् के लिए अग्नि को शीतल बना सकी थीं उनके सामने रावण का कृत्रिम रामस्वरूप कैसे टिक सकता था। ६३