रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ | रामायणमीमांसा | पञ्चदश
मैंने देखा कि सूर्योदय-प्रभा के तुल्य किसी स्त्री को लिये हुए अञ्जनचयतुल्य कोई पुरुष जा रहा है । अर्थात् रथ नष्ट हो जाने से रावण अन्त में विरथ ही सीता को ले जा रहा था। यही है आजकल का अन्वेषण (रिसर्च) । महाभारत का रामोपाख्यान तो वाल्मीकिरामायण के ही आधार पर संक्षिप्त संकलनमात्र है, अतः उसके आधार पर वाल्मीकिरामायण के अंशों को प्रक्षेप मानना शुद्ध अनभिज्ञता ही है । ४९२वें अनु० में कञ्चनमृग के सम्बन्ध में चर्चा की गयी है । वह अंश भी उनका अपूर्ण है । वस्तुस्थिति यह हैं कि शूर्पणखा से पहले ही अकम्पन के मुख से जनस्थान के राक्षसों का वध, राम का पराक्रम और सीता की सुन्दरता सुनकर ही रावण सीताहरण के लिए सहायतार्थ मारीच के पास गया था। परन्तु मारीच ने रावण को राम का पराक्रम बताकर लौटा दिया था। पश्चात् विरूपित शूर्पणखा ने जाकर खर के वध का समाचार और सीता के सौन्दर्य का वर्णन किया । रावण पुनः मारीच के पास गया । मारीच फिर उससे राम के पराक्रम का वर्णन करता है और आपबीती घटनाओं का वर्णन करता है । विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के समय राम ने एक बाण मारकर मुझे शत- योजन की दूरी पर फेंक दिया था। बाद में भी दो राक्षसों के साथ दण्डक वन जाने पर राम ने साथियों को मार दिया और मैं भयभीत होकर भाग गया और अब तपोमय जीवन बिता रहा हूँ। मारीच ने स्पष्ट कहा यदि तुम नहीं मानोगे तो लङ्का का सर्वनाश हो जायेगा । इसपर रावण मारीच को वध की धमकी देता है । मारीच ने सोचा कि मैं किसी प्रकार बच नहीं सकता । वह रावण से स्पष्ट कहता है, राम दर्शनमात्र से मुझे मार कर अन्त में बन्धुबान्धव सहित तुम्हारा भी वध करेंगे । मैं राम के हाथों मरकर अवश्य कृतकृत्य होकर मुक्ति को प्राप्त हो जाऊँगा— “अनेन कृतकृत्योऽस्मि म्रिये चाप्यरिणा हतः ।” ( वा० रा० ३।४१।१७ ) मारीच की स्वीकृति के बाद रावण उसे रथ पर बैठा कर जनस्थान की ओर प्रस्थान करता है । वहाँ पहुँच कर मारीच नाना मणियों से जटिल कनकम्ग का रूप धारण करता है । उधर सीता का ध्यान जाता है । वह राम और लक्ष्मण को बुलाकर कनकम्ग दिखाती हैं और उसे पाने के लिए अनुरोध करती हैं। सीता को लक्ष्मण की रक्षा में छोड़कर राम कनकम्ग का शिकार करने जाते हैं। मारीच राम को दूर ले जाता है । अन्त में राम-बाण से आहत होकर अपना रूप धारण करता है तथा पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार राम-वाणी का अनुकरण करता हुआ हा सीता, हा लक्ष्मण कहकर महानाद करता है । राम उस मृत मायामारीच को छोड़कर आशङ्का करते हुए लौटते हैं । सीता मारीच की पुकार सुनकर लक्ष्मण से अनुरोध करती हैं कि वे भाई की सहायता के लिए शीघ्र जायें । लक्ष्मण पहले अस्वीकार करते हैं, किन्तु सीता के कटु शब्द सुनकर चले जाते हैं । रावण ब्राह्मणरूप में सीता के पास आता है । वे उसे आतिथ्य के लिए निमन्त्रित करती हैं । रावण सीता को अपना परिचय देकर उनके सामने लङ्का की महारानी बनने का प्रस्ताव रखता है । सीता का कटु उत्तर सुनकर रावण राक्षसरूप में प्रकट होकर उन्हें रथ में बैठाकर लङ्का की ओर चल देता है । सीताहरण का यही रूप देश-विदेशों की सभी रामकथाओं में प्रचलित है । किन्तु दामोदर के महानाटक ( ३।३७ ) के अनुसार राम और लक्ष्मण दोनों ही कनकम्ग शिकार के लिए जाते हैं । उदात्तराघव के अनुसार लक्ष्मण कनकम्ग के वधार्थ जाते हैं । रावण कुलपति के रूप में राम और सीता के पास आता है तथा राम की निन्दा करता है, क्योंकि उन्होंने लक्ष्मण को भेज दिया है । उसी समय एक छद्मवेषी राक्षस आकर समाचार देता है कि कनकम्ग राक्षस बनकर लक्ष्मण को ले जा रहा हैं । इसपर राम सीता को रावण की रक्षा में छोड़कर लक्ष्मण की सहायता करने जाते हैं । सेरीराम के अनुसार सीताहरण के पहले शक्ति प्राप्त करने के लिए राम यज्ञ करते हैं । उस समय गागक- नासिर नामक राक्षस काक बनकर यज्ञ-भङ्ग करने आता है । राम द्वारा उसका वध किया जाता है । तब रावण