रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशबरी या श्रमणी से क्यों न मिलते और इसकी कथा वाल्मीकिरामायण में क्यों न आती ? इसके अतिरिक्त कबन्ध ने दिव्यरूप धारण कर राम को सीता के अन्वेषण का मार्ग बताते हुए मतङ्ग के आश्रम में जाने का संकेत किया था । उसने मतङ्गाश्रम के विविध चमत्कारों का वर्णन करके कहा कि महर्षि मतङ्ग और उनके शिष्यगण तो परम धाम चले गये, पर परिचारिणी श्रमणी शबरी अब भी वहीं है । वह चिरजीविनी है । धर्मनिष्ठ है । सर्वलोकनमस्कृत देवोपम तुमको देखकर स्वर्गलोक जायगी— “तेषां गतानामद्यापि दृश्यते परिचारिणी । श्रमणी शबरी नाम काकुत्स्थ चिरजीविनी ॥ त्वां तु धर्मे स्थिता नित्यं सर्वलोकनमस्कृतम् । दृष्ट्वा देवोपमं राम स्वर्गलोकं गमिष्यति ।।” (वा० रा० ३।७३।२६,२७) ऐसी स्थिति में उक्त सर्ग और उसकी कथाओं को प्रक्षिप्त कहना साहसमात्र है । जब राम शबरी के आश्रम पहुँचे तो उसने राम का आतिथ्य किया । राम उसकी तपश्चर्या के संबन्ध में प्रश्न करते हैं । उसने बताया कि जब आप चित्रकूट में थे तभी यहाँ के ऋषि, जिनकी सेवा में मैं थी, स्वर्ग चले गये । जाते समय उन्होंने कहा था—लक्ष्मण के साथ राम यहाँ आयेंगे; तुम उनका आतिथ्य करके दिव्य लोकों को प्राप्त करोगी । उसने यह भी कहा था कि आज मेरा जप, तप देवश्रेष्ठ आपकी पूजा से सफल हो गया । स्वर्ग भी निश्चित हो गया— “अद्य मे सफलं तपं स्वर्गाश्चैव भविष्यति । त्वयि देववरे राम पूजिते पुरुषर्षभ ।।” ( वा० रा० ३।७४।१२ ) यहाँ शबरी ने राम को देववर—देवश्रेष्ठ विष्णु—कहा है । इसी लिए बुल्के ने इस सर्ग और कथा को ही प्रक्षेप कहने का यत्न किया है । राम, मैं आपके सौम्य चक्षुओं से पूत होकर आपकी कृपा से अक्षय लोकों को जाऊँगी— ‘तवाहं चक्षुषा सौम्य पूता सौम्येन मानद । गमिष्याम्यक्षयांल्लोकांस्त्वत्प्रसादादरिन्दम ।।” ( वा० रा० ३।७४।१३ ) इससे भी राम की ईश्वरता स्पष्ट होती है । इतना ही नहीं किन्तु अध्यात्मरामायण, रामचरितमानस आदि की कथाओं का मूल भी स्पष्ट है । वह कहती है कि धर्मज्ञ महाभाग महर्षियों ने जिनकी मैं परिचर्या करती थी, मुझसे कहा था कि तुम्हारे आश्रम में राम और लक्ष्मण आयेंगे । तुम उनका सत्कार करके दिव्य लोकों को प्राप्त करोगी । सो मैंने पम्पातीर समुद्भूत विविध वन्य पदार्थ आपके लिये सञ्चित कर रखे हैं ( वा० रा० ३।७४ १६-१८) । इससे यह सूचित होता है कि अपने गुरु की आज्ञा के अनुसार राम के आतिथ्य के लिए पुण्य फल, मूल आदि का संग्रह करती कई दिनों से वह प्रतीक्षा कर रही थी और उत्तम उत्तम वृक्षों और लताओं के फलों, मूलों की परीक्षा करके उनका संग्रहण करती थी । इसी का उपबृंहण पद्मपुराण में हैं। राम ने कबन्ध से सुने हुए उस आश्रम के चमत्कारों को देखना चाहा । उसने सब दिखाया और बताया कि यहाँ मेरे गुरु महर्षि ने मन्त्रपूर्वक अपने नीड ( शरीरपञ्जर ) को हुत किया था । यहीं वेदी पर वे अपने कम्पयुक्त हाथों से पुष्पोपहार अर्पण करते थे । उनके तप के प्रभाव से अतुलप्रभा वेदी आज भी अपनी दिव्यश्री से दिशाओं को प्रकाशित कर रही है । उपवासश्रम से स्नान ‘अभिषेक’ के लिए जाने में असमर्थ होने से उनके लिए चिन्तन मात्र से सप्त सागर यहीं आकर उपस्थित हो गये थे । उनके द्वारा स्पृष्ट पुष्प