रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ रामायणमीमांसा सप्तदश लङ्कावरोध के समय लङ्का के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है, जिसमें कहीं भी दहन का निर्देश नही मिलता ( ६।३८-३९) ।" परन्तु यह सब निस्सार ही है, क्योंकि पहली बार तो लङ्का-दहन हुआ ही नहीं था। सीता से बिदा लेने के बाद ही हनुमान् के मन में पर-बलजिज्ञासा से वन उजाड़ने आदि में प्रवृत्ति हुई। आत्मश्लाघा या आत्मोत्कर्ष पर्यवसायी आत्मकृत्य वर्णन में प्रवृत्ति अल्पसत्त्व को हो सकती थी। महासत्त्व हनुमान् की वैसी प्रवृत्ति नहीं हो सकती थी, अतः दूसरी बार मिलने पर भी हनुमान् ने लङ्का-दहन आदि आत्मकृत्य का वर्णन नहीं किया । इसके अतिरिक्त लङ्का-दहन जैसा व्यापक और ज्वलन्त कार्य स्वयं प्रख्यात था। उसके वर्णन की आवश्यकता भी हनुमान् ने नहीं समझी । राक्षसियों ने पहले ही सीता को सुनाया था कि हनुमान् को राक्षसों ने पकड़ लिया है और अब उनकी पूँछ में अग्नि लगायी जा रही है। उस समय सीता ने अपने प्रभाव से हनुमान् के प्रति शीतल हो जाने का अग्नि से अनुरोध किया था— “यद्यस्ति गुरुशुश्रूषा यदि वाचरितं तपः । यदि वाप्येकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः ।।'' (वा० रा० ५।५३।२६,२७) रावण महाप्रभावशाली था। चन्द्र, इन्द्र, पवन, पर्जन्य आदि भी उसके आज्ञाकारी थे। अतः उसने शीघ्र ही परिष्कार कराकर पुनः लङ्का का सौन्दर्य सम्पादित कर लिया था। इसलिए अवरोध के समय का सौन्दर्य-वर्णन भी सङ्गत ही है। आधुनिक काल में भी भीषण बमवर्षा के बाद भी पेरिस आदि नगरों को शीघ्र ही सुन्दर बना लिया गया था। शब्दप्रामाण्यवादी आपात विरोधमात्र से शब्द का अप्रामाण्य नहीं मानते, किन्तु उपपत्ति के अनुकूल कल्पना करते हैं; जैसे किसी व्यक्ति के दिन में न खाने पर भी पीनता देखकर उसके रात्रिभोजन की कल्पना कर ली जाती है। घर में न देखकर भी देवदत्त जीवित है, इस प्रामाणिक श्रवण के बल पर ही उसके बाहर अस्तित्व की कल्पना होती है। इसी प्रकार लङ्कादहन के कुछ दिनों बाद भी लङ्का की शोभा का वर्णन श्रवण करके मध्य में उसके पुनरुद्धार तथा पुनर्मार्जन की कल्पना करनी ही चाहिये। इतने मात्र से किसी वर्णन को अप्रामाणिक कहना साहसमात्र है। अतएव सेरीराम के अनुसार एक महर्षि के प्रार्थनानुसार एवं बलरामदास के अनुसार देवताओं ने विश्वकर्मा को भेजकर लङ्का का पुनर्निर्माण किया था। मिथ्या कल्पना की आदत भारतीय मानवों विशेषतः ऋषियों को तो नहीं थी। सुन्दरकाण्ड सर्ग ५४ में लङ्का का दाह वर्णित है। प्रमुख-प्रमुख महापार्श्व, वज्रदंष्ट्र, शुक, सारण, इन्द्रजित्, जम्बूमाली, सुमाली, रश्मितनु, सूर्यशत्रु, ह्रस्वकर्ण, रोमश, युद्धोन्मत्त, मत्त, विद्युज्जिह्व, हस्तिमुख, कराल, विशाल, शोणिताक्ष, कुम्भकर्ण, नरान्तक, कुम्भ, निकुम्भ आदि के भवनों के साथ ही राक्षसेन्द्र रावण के भवन का दाह किया गया था। महापवन से उद्दीप्त अग्नि ने इस प्रकार लङ्का-दहन किया कि अग्नि के कारण काञ्चनमय, मुक्तामणिमय एवं महान् रत्नों से युक्त बहुत से भवन विशीर्ण हो गये। भूषण, वसन, अन्न आदि सभी वस्तुएँ प्रज्वलित हो गयी थीं। अगणित राक्षस भी जल गये थे। यह सब होने पर भी इन्द्र, वरुण आदि को जीतने की सामर्थ्य रखनेवाले राक्षसों में निर्माण-क्षमता की भी कमी नहीं थी। इसी लिए थोड़े ही दिनों में लङ्का की शोभा पूर्ववत् पुनः सम्पादित कर ली गयी थी। कहा जाता है कि विरूपाक्ष तथा यूपाक्ष के वध का वर्णन लङ्का-दहन प्रसङ्ग में ( ४६ वें सर्ग में ) किया गया है। पुनश्च युद्धकाण्ड सर्ग ७५ श्लो० ४७ में यूपाक्ष का तथा सर्ग ७६ श्लोक ३४ में मैन्द द्वारा विरूपाक्ष का वध वर्णित है। विरूपाक्ष की चर्चा सर्ग ९६ में है, अतः लङ्का-दहन क्षेपक ही है। परन्तु यह कथन भी असङ्गत है, क्योंकि उक्त लेखानुसार ही अनेक यूपाक्ष तथा विरूपाक्ष का मानना उचित है। यदि लङ्का-दहन का प्रसङ्ग प्रक्षेप होता तो अक्षयकुमार का भी वध पृथक् से युद्धकाण्ड में वर्णित होना चाहिये था—