रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय सुन्दरकाण्ड ५२१
इच्छा होगी । विशेष जानकारी के लिए पुनः पुनः प्रश्न करना स्वाभाविक ही है । विशेष निश्चय के लिए राम के साथ तुम्हारा कहाँ समागम हुआ ? वानरों का और नरों का संगम कैसे हुआ ? तुमने राम और लक्ष्मण को कैसे जाना ? राम के और लक्ष्मण के कौन कौन विशेष चिह्न हैं ? इत्यादि प्रश्न एवं हनुमान् द्वारा उन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर अत्यन्त संगत है । इस वर्णन में राम के महत्त्वपूर्ण बाह्य तथा आन्तर लक्षण और उनके स्वभाव का वर्णन है । इसी तरह सर्ग ४० में ३८ वें सर्ग की आवृत्ति मानना भी अनभिज्ञता ही है। सीता का हनुमान् से पुनः पुनः प्रिय की चर्चा करना, प्रिय के लिए पुनः पुनः सन्देश कहना और हनुमान् द्वारा पुनः पुनः आश्वासन देना स्वाभाविक ही है । अनु० ५३०. अतएव याकोबी के अनुसार आदिरामायण में लङ्का-दहन सर्ग ४१-५५ का वर्णन नहीं मिलता था, यह कथन तथा उनके तीन तर्क सर्वथा असङ्गत हैं । सीता का हनुमान् को बिदा करने का वर्णन लङ्का-दहन के पूर्व ३९ वें तथा लङ्का-दहन के पश्चात् ५६ वें और राम-हनुमान्-संवाद में ६८ वें सर्ग में उचित ही है । वृत्तान्त का वर्णन करनेवाला यदि वृत्तान्त न होने पर वर्णन करे तभी दोषी है । यथाभूत वृत्तान्त का वर्णन करना सर्वथा उचित ही है। अतएव यह कहना भी निरर्थक है कि बिदा वर्णन का ३९ वाँ सर्ग ही मौलिक स्थान है, क्योंकि इसमें सीता हनुमान् से एक रात रहने का अनुरोध करती हैं । वह लङ्का-दहन के पश्चात् स्वाभाविक नहीं कहा जा सकता । लङ्का-दहन के पूर्व यह नितान्त स्वाभाविक प्रतीत होता है, क्योंकि ३९ वें सर्ग में हनुमान् की बिदा का वर्णन और उनसे एक रात रहने के लिए अनुरोध करने का अपलाप कैसे किया जा सकता है। ३९वें सर्ग में बिदा करती हुई सीता का यह प्रश्न भी उचित ही था कि राम, लक्ष्मण और वानर सैनिक इस भीषण समुद्र को पार कर सकेंगे ? हनुमान् द्वारा इसका उत्तर देना भी उचित ही है । ४० वें सर्ग में पुनः सीता राम के प्रति अपनी अभिलाषाएँ प्रकट करती हुई सन्देश कहती हैं । ४१वें सर्ग में हनुमान् सीता के पास से कुछ दूर चलकर यह विचार करते हैं कि सीता का दर्शन हो गया । यह प्रधान कार्य तो हो गया, परन्तु शत्रु का बल-ज्ञानरूप कार्य शेष ही है । उसका साधन साम, दान और भेद छोड़कर चतुर्थ दण्ड ही हो सकता है । प्रधान कार्य के सम्पादन के साथ ही पूर्व कार्य के अविरोधेन अन्य बहुत कार्यों का सम्पादन करना है इत्यादि बहुत बातें सोचकर हनुमान् तोड़-फोड़ कर रावण के प्रमदवन को उजाड़ने लगे । तदनन्तर जम्बू- माली, अक्षयकुमार, मेघनाद आदि से युद्ध और बन्धन, लङ्का-दहन आदि कार्यों का सम्पादन किया । लङ्का-दहन के बाद सीता के जल जाने की आशङ्का होती है और उससे उन्हें महती आत्मग्लानि होती है। पुनः उन्हें शुभ निमित्त दर्शन से यह विचार आता है कि सीता अपने तेज से ही सुरक्षित होंगी । अग्नि के दहनार्थ अग्नि की प्रवृत्ति नहीं हो सकती । धर्मात्मा राम की भार्या सीता अपने चरित्र से सर्वथा सुरक्षित हैं । पावक उनका स्पर्श नहीं कर सकता । राम के प्रभाव और वैदेही के पुण्य प्रभाव से दहन-कर्मा अग्नि ने मुझे नहीं जलाया । फिर भरत आदि तीनों भ्राताओं की जो देवता हैं और जो राम की मनःकान्ता हैं वह कैसे अग्नि द्वारा नष्ट हो सकती हैं । इतने में चारणों के द्वारा सीता की रक्षा का समाचार सुनकर पुनः प्रत्यक्षतः सीता को देखकर लौटना उचित ही था । एवं इतना महत्त्वपूर्ण कार्य करके भी सीता-दर्शन उचित ही था । मिलने पर सीता द्वारा पुनः दैन्य और छुटकारा पाने की अभिलाषा व्यक्त करना भी स्वाभाविक है और हनुमान्-राम-संवाद में भी वही बात ज्यों की त्यों सुनाना भी उचित ही था । परन्तु इसका यह निष्कर्ष निकालना कि लङ्का-दहन की विस्तृत कथा प्रक्षेप है अत्यन्त असङ्गत है । पूर्वोक्त प्रकार से प्रकरण-सङ्गति में कोई कठिनाई है ही नहीं । सङ्गति की परिभाषा और उसके प्रकारभेद न जानने के कारण ही पाश्चात्यों को इस प्रकार दुष्कल्पना का अवकाश प्राप्त होता है । लङ्का-दहन के प्रक्षेप होने का यह भी कारण कहा गया है कि "हनुमान् सीता से दो बार भेंट करते हैं, लेकिन लङ्का-दहन का कोई उल्लेख नहीं करते । इसके अतिरिक्त ६६