रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 597, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें“पुनर्दुःखपारमदृष्ट्वैव सीताप्रलापः” यह इतना स्वाभाविक वर्णन है कि कोई भी समझदार अनावश्यक कहकर इसे क्षेपक नहीं कह सकता । शोकसन्तप्त होकर सीता जब अपनी वेणी द्वारा फाँसी लगाकर देहत्याग कर यम- लोक जाने के लिए वृक्ष की शाखा पकड़ कर समीप में खड़ी होती है तब उसको शोकरहित करनेवाले और धैर्य बँधानेवाले लोकप्रसिद्ध एवं पहले भी जिनका फल अनुभूत हो चुका है ऐसे विभिन्न शकुन होने लगे— “तस्या विशोकानि तदा बहूनि धैर्यार्जितानि प्रवराणि लोके । प्रादुर्निमित्तानि तदा बभूवुः पुरापि सिद्धान्युपलक्षितानि ।” (२८।१९) स्वाभाविक बात है, अत्यन्त संताप होने पर देहत्याग की प्रवृत्ति होती है । उस अवसर पर शुभ कर्मों के फलस्वरूप धैर्य धारण करानेवाले शुभ शकुन होते हैं । सर्ग २९ में उन्हीं शुभ शकुनों का वर्णन है। ३० वें सर्ग में हनुमान् ने तत्त्वतः सीता तथा त्रिजटा के कथोपकथन को और राक्षसियों के तर्जन-गर्जन को सुना— “हनुमानपि विक्रान्तः सर्वं शुश्राव तत्त्वतः ।” इस तरह पूर्वापर की स्पष्ट संगति है। कुछ हस्तप्रतिलिपियों में दोनों सर्गों का न होना लेखक का प्रमाद ही है । तिलककार ने इन्हें प्रामाणिक मानकर ही इनकी व्याख्या की है । इस प्रकार सीता और हनुमान् के संवाद की बहुत-सी सामग्री को प्रक्षिप्त कहना भी प्रमाद ही हैं । ३२ वें सर्ग का दीर्घ छन्दों में वर्णन अनावश्यक है, यह कहना भी प्रमाद ही है । जिस ऋषि ने उस घटना का दर्शन किया वह उस वर्णन को आवश्यक समझकर ही उसके वर्णन में प्रवृत्त हुआ था । ३१ वें सर्ग के अन्त में सीता ऊपर, नीचे और तिर्यक् निरीक्षण करती हुई उन अचिन्त्यबुद्धि वातात्मज हनुमान् को उदयाचल स्थित सूर्य के समान देखती है, यह संक्षेप में निरूपण करके तत्सम्बन्धी विशेष वृत्तान्त का निरूपण ३२ वें सर्ग में किया गया है । उस भीमसत्त्व वानर के दुरासद और दुर्निरीक्ष्य रूप को देखकर सीता को मोह हो गया और वह भय से मोहित होकर राम और लक्ष्मण का नाम लेकर रोने लगी । वह विचार करने लगी कि मैंने यह विकृत स्वप्न ही देखा है और वह अनिष्टाशङ्की चित्त होने के कारण ही राम, लक्ष्मण तथा जनक की स्वस्ति मनाती है और फिर— ‘नमोऽस्तु वाचस्पतये सवज्रिणे’ (वा० रा० ५।३२।१८) रूप मङ्गलाचरण करती है । और प्रार्थना करती है कि वानर ने जो सुनाया वह वैसे ही हो । इतने में विद्रुमप्रतिम लाल मुख वाले विनीतवेष हनुमान् उस द्रुम से उतर कर प्रणाम कर के समीप आ गये । ऋतम्भरा प्रज्ञा से इस घटना का अनुभव करनेवाले ऋषि उसका वर्णन कैसे न करेंगे । सर्ग ३३ में सीता के विश्वस्त हो जाने के पूर्व उनका आत्मपरिचय देना अस्वाभाविक है, यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि यह काव्यमय इतिहास है। अर्धमात्रा के लाघव से पुत्रोत्सव मनानेवाले वैयाकरणों का व्याकरण ग्रन्थ नहीं है । तिलककार कहते हैं लिङ्गों से सीता का निश्चय हो जाने पर भी उनके द्वारा कहलाने के लिए अनजान से होकर हनुमान् ने प्रश्न किया था । पद्मपलाशाक्षि, क्लिष्टकौशेयवासिनि, आप कौन हैं और पुण्डरीक पलाशों से विप्रकीर्ण उदक के तुल्य आपके नेत्रों से शोकजनित जल क्यों बह रहा है इत्यादि । श्रीसीता ने अगले श्लोकों में उत्तर दिया । इसी वस्तुस्थिति का महर्षि ने वर्णन किया । इस तरह सर्ग ३५ में सर्ग ३१ की आवृत्ति तथा अनावश्यक विस्तार कहना भी अन- भिज्ञता ही है । क्योंकि कोई भी शोकव्याकुल प्राणी विशेषतः स्त्री अपने प्रिय से वियुक्त होकर बहुत काल के अनन्तर प्रिय का समाचार पाकर संक्षिप्त समाचारमात्र से सन्तुष्ट हो यह सम्भव नहीं है । उसे अवश्य ही विस्तृत वर्णन सुनने की