रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 596, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश अध्याय सुन्दरकाण्ड ५२८ अनुच्छेद, लङ्का में हनुमान् का प्रवेश—लङ्का-वर्णन, लङ्कादेवी को परास्त करना, नगर, महल, पुष्पक विमान, शयनागार आदि का वर्णन एवं सीता का दर्शन न होने से अशोकवन में प्रवेश, सीता का दर्शन, सीता- रावण-संवाद, सीता द्वारा रावण के अनुरोध को ठुकराया जाना, दो महीने की अवधि का दिया जाना, राक्षसियों की रावण द्वारा नियुक्ति, त्रिजटा का राक्षसपराजयसूचक स्वप्नवर्णन, हनुमान्-सीता का संवाद, सीता को शकुन होना, हनुमान् द्वारा राम-कथा का वर्णन, सीता का भयभीत होना, हनुमान् का प्रकट होना, सीता-सन्देह, हनुमान् द्वारा राम का वर्णन, सीता का विश्वास होना, हनुमान् द्वारा मुद्रिका देना और शीघ्र दुःख-निवृत्ति का आश्वासन, हनुमान् की पीठ पर बैठकर जाने का सीता द्वारा अस्वीकार करना, अभिज्ञानस्वरूप काक-वृत्तान्त सुनाना और चूड़ामणि देना, विदा, अशोकवन और चैत्य का विध्वंसन, जम्बूमाली और अक्षयकुमार का वध, दण्डरूप में हनुमान् की पूंछ का जलाया जाना, लङ्का-दहन की चारणों की बात-चीत से हनुमान् को सीता-रक्षा का आश्वासन, हनुमान् का लौटना, समुद्र का लङ्घन, मधुवन में वानरों का उत्पात तथा राम को सुखद समाचार सुनाना । यहाँ भी बुल्के ने पाठभेद की चर्चा की है। सिद्धान्ततः पाठभेद मान्य ही हैं। ५३० वें अनु० में सुन्दरकाण्ड में भी प्रक्षेप कल्पना की गयी है । दाक्षिणात्य पाठ के प्रथम सर्ग का अन्य पाठों की अपेक्षा विस्तृत वर्णन, २-११ सर्गों में पुनरावृत्ति के अतिरिक्त दीर्घ छन्दों में कई अनावश्यक सर्ग मिलते हैं। पुष्पक-वर्णन अर्वाचीन है। सर्ग १४ अशोकवन का पहले विध्वंस, सर्ग २३-२६ भीषण राक्षसियों का वर्णन और उनकी धमकियाँ; सर्ग २८, २९ में पूर्वापरसम्बन्ध का अभाव तथा बहुत सी प्रतिलिपियों में इन ( २८, २९ ) दो सर्गों का अभाव है, परन्तु उक्त तर्क निःसार हैं। दाक्षिणात्य पाठ भी प्रामाणिक ही है। उसपर तिलक व्याख्या है । व्याख्याकार प्रक्षिप्त सर्गों एवं श्लोकों का पृथक् निर्देश कर देते हैं। उक्त श्लोकों के सम्बन्ध में कोई ऐसा निर्देश नहीं है। दीर्घ छन्द बुल्के की दृष्टि में भले अनावश्यक हों परन्तु टीकाकारों की दृष्टि में प्रत्येक श्लोक संगत ही है एवं काव्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। दीर्घ छन्दों का भी साहित्यिक महत्त्व है। स्थूल प्रयोजन तो अन्य काव्य ग्रन्थों के भी साहित्यिक छन्दों में भी नहीं उपलब्ध होते हैं। दूत के लिए लङ्का की आवश्यक जानकारी महत्त्वपूर्ण है। नगरवर्णन भी काव्य का एक अङ्ग है। वस्तुतः २-११ सर्ग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। उनका अपलाप करना अरसज्ञता ही है। सर्ग १४ को भी अनावश्यक कहना असंगत है। कवि साहित्यिक ढङ्ग से जिस वस्तु का विस्तृत वर्णन करता है वह संक्षेप में एक या दो श्लोकों में भी कही जा सकती है। सर्ग २३-२६ का वर्णन घटना का ही वर्णन है। कोई भी घटना बुद्धिसापेक्ष नहीं होती। भारत का विभाजन अभीष्ट नहीं था। फिर भी घटना घट गयी। उसका वर्णन करना पड़ता है। सर्ग २३-२६ का पूर्वापरसम्बन्ध भी अवश्य है। २७ वें सर्ग में त्रिजटा के स्वप्नवर्णन द्वारा प्रसन्न होकर सीता आश्वासन देती है कि यदि स्वप्न की बात सत्य हुई तो मैं अवश्य तुम सबका रक्षण करूँगी— "अवोचद् यदि तत्तथ्यं भवेयं शरणं हि वः ॥” ४७ ॥ पुनश्च दुःख का अन्त न देखकर जो सीता ने व्याकुलता में प्रलाप किया है, उसी का वर्णन २७ वें सर्ग में है । तिलककार ने कहा है—